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गीता पर संकीर्ण राजनीति

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि महान पवित्र ग्रंथ भगवद् गीता भी संकीर्ण राजनीति से बच नहीं पा रही है. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा भगवत गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की हिमायत करने के बाद विरोधी दलों ने उन पर हमले तेज कर दिये हैं. कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम में सुषमा स्वराज ने भगवदद् गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की बात कहते हुए दलील दी थी कि गीता में हर वर्ग और हर तरह की समस्याओं का समाधान है, लिहाजा इसे र ...

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यूरोपीय इतिहास के विरोध में विश्व संगठित हो

इक्कीसवीं सदी तक विज्ञान का विकास सूचना तकनीक, जैव विज्ञान और नैनोविज्ञान तक आ चुका है, लेकिन आज भी विश्व का इतिहास 'वंशवाद' नामक दकियानूसी सिद्धांत पर ही निर्भर है. विश्व का विभाजन आज भी 'वंश सिद्घांत’ पर ही आधारित है. यह सिद्धांत कहता है कि आज के विश्व का विस्तार नोहा की कहानी के आधार पर तुर्किस्तान के अरावत पर्वत से हुआ है़, यह कहानी जेनेसिस में है. उसी को आधार मानकर आज विश्व के 80 प्रतिशत देशों की पाठशा ...

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6 दिसम्बर/इतिहास-स्मृति; राष्ट्रीय कलंक का परिमार्जन

भारत में विधर्मी आक्रमणकारियों ने बड़ी संख्या में हिन्दू मन्दिरों का विध्वंस किया. स्वतन्त्रता के बाद सरकार ने मुस्लिम वोटों के लालच में ऐसी मस्जिदों, मजारों आदि को बना रहने दिया. इनमें से श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर (अयोध्या), श्रीकृष्ण जन्मभूमि (मथुरा) और काशी विश्वनाथ मन्दिर के सीने पर बनी मस्जिदें सदा से हिन्दुओं को उद्वेलित करती रही हैं. इनमें से श्रीराम मन्दिर के लिये विश्व हिन्दू परिषद् ने देशव्यापी आन्द ...

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गीता से बन सकती है सबको अपना मानने की प्रकृति : प.पू. सरसंघचालक

5 हजार 1 सौ 51 वर्ष भगवद्गीता के पूरे हुये और हमारे विदेशी दिनदर्शिका में प्रतिवर्ष गीता जयंती है. आज भी अपने देश में सर्वत्र ऐसे लोग हैं जिनको गीता के 18 अध्याय कंठस्थ हैं. पढ़ने वाले लोग हैं, देखने वाले लोग हैं, उस पर बोलने वाले लोग हैं, इतनी सुदीर्घ परम्परा में समय के अनेक फेरों में श्रीमदभगवद् गीता को लेकर अनेक टीकायें और अनेक भाष्य बने और आगे भी बनते रहेंगे. जब-जब कभी किसी समाज को संकट से उबारने की, सम ...

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सौहार्द से भरे विश्व की खोज

मैं हमेशा कहता रहा हूं कि दुनिया भर के सात अरब लोग हैसियत और ताकत में जैसे भी हों, मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से एक ही तरह के हैं. चाहे राजा हो या रानी, भिखारी या धर्मगुरु- सब एक ही तरह से जन्म लेते हैं. फर्क हम ही करते हैं. बड़े होकर भूलने लगते हैं कि हम सबका जन्म एक समान ही हुआ है. फर्ज कीजिये कि एक बड़ी प्राकृतिक आपदा आये और हम उसमें से बच निकलें तो उस वक्त तमाम अंतरों को भूल जायेंगे. यह बात बच्चों ...

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ईसाइयत की आंधी और पश्चिमी देशों की थानेदारी

पिछले कुछ समय से किसी भी महासत्ता की कसौटी इस बात पर निर्भर होती आ रही है कि विश्व के अन्य देशों पर उसका किस सीमा तक नियंत्रण है. व्यापार,औद्योगिक कारोबार, विज्ञान-तकनीक, खेती जैसे हर क्षेत्र में नियंत्रण का पैमाना मापा जाता है. उसी से उन महासत्ताओं की अन्य देशों पर थानेदारी की सीमा और क्षमता स्पष्ट हो जाती है. पिछले 100 वर्ष में ही जिन देशों के महासत्ता होने का आभास हो रहा था, वैसे तत्कालीन सोवियत संघ और आ ...

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भारत-तोड़ो जमात के प्यादे

बीसवीं और इक्कीसवीं सदी विकसित विज्ञान की सदी मानी जाती है. सूचना तकनीक, जैविक तकनीक और नैनो तकनीक का इतना विस्तार हुआ है कि आज तक के विज्ञान के पूरे विकास को पीछे धकेलते हुए विकास के नये आयाम हमारे सामने आये हैं. माना जाता था कि विज्ञान का विकास अथवा नये आयाम औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि, औषधि उत्पादन जैसे क्षेत्रों तक सीमित होंगे. लेकिन ऐसा नहीं है,यह प्रयोग तो कुछ मनुष्यों के दिमाग के साथ भी चल रहा है. नई ...

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हिन्दू दर्शन भारतीय है और वैश्विक भी : डॉ. कृष्ण गोपाल

हम जानते हैं कि सभी देश और हर एक समाज का एक विशिष्ट ‘स्वाभाविक-स्वभाव’ होता है. उस देश व समाज की वह एक विशिष्ट पहचान भी होती है. उस विशिष्ट पहचान और स्वभाव को लेकर के ही वह देश विश्व में जीता है. वही विशेष स्वभाव और उसकी वह परम्परा उस देश और समाज की आत्मा के रूप में और वही उसकी नियति के रूप में भी रहता है. एक तरह से कहा जाये तो उस समाज और राष्ट्र की विश्व के लिये देन भी वही हो सकती है. हमारे देश की भी हजारो ...

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परिपूर्ण मानव – श्री गुरुजी

भारतीय जीवन-सिद्धांतों के संबंध में आज फिर से विचार करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई है. इसका कारण बड़ा स्पष्ट और सरल है. हमें पता है कि जब तक देश में एक परकीय राज्य था, तब लोगों में अपना देश, अपना राष्ट्र, अपना स्वत्व-यह विचार प्रबल था. लोग यह भी समझते थे कि अपने राष्ट्र के स्वातंत्र्य के लिये, पुनर्निर्माण के लिये सद्गुणी जीवन, निर्दोष जीवन, स्वार्थरहित तथा त्याग-तपस्या से भरा हुआ जीवन आवश्यक है. उन दिनों प्र ...

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इतिहास बदलकर भारत को तोड़ने में लगी हैं चर्च-पोषित संस्थायें

लगभग चार वर्ष पूर्व 'ब्रेकिंग इंडिया' पुस्तक ने 'अफ्रो-दलित' विषय को पहली बार उजागर किया था. बाद में भी इस संदर्भ में कई घटनायें घटीं. देश के विकास के मोर्चे पर जिस तरह पूरी शक्ति के साथ मेहनत की जा रही है, उसी तरह इस मोर्चे पर भी भरपूर प्रयास होने चाहिये. इस पर चर्चा करने का कारण यह है कि इस वक्त 'अफ्रो दलित' संगठन के कुछ कार्यकर्ता भारत आये हुये हैं. दक्षिणी राज्यों, खासकर कर्नाटक, तमिलनाडु एवं महाराष्ट्र ...

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