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संस्कृति पर आघात – झूठे इतिहास के पैरोकार

विश्व पर राज करना हो तो विश्व का इतिहास खुद के इतिहास से शुरू होना चाहिये, यह मानकर यूरोपीय देशों, खासकर ब्रिटेन और पिछली पांच सदियों में रहे कैथोलिक चर्च प्रमुखों ने विश्व का इतिहास लिखवाया. इसलिये आज भी विश्व के तीन चौथाई हिस्सों में यूरोपीय लोगों द्वारा लिखा इतिहास पढ़ाया जाता था. यह इतिहास यानी एशिया से अफ्रीका तक, पूरा विश्व बाइबिल में उल्लिखित नोहा की कथा से यानी यूरोप और इजराइल आदि हिस्सों से बना एवं ...

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संस्कृति पर आघात – साजिश के केन्द्र में ‘येल’

अभी कुछ दिन पहले तक केंद्र में जो सरकार थी वह ऐसे लोगों के समर्थन पर टिकी थी जो आतंकवादियों का कई अवसरों पर समर्थन करते दिखते थे. इसलिये आतंकवादियों को नियंत्रित करने का मनोबल ही उस सरकार के पास नहीं था,लेकिन अब मोदी सरकार के आने के बाद सिर्फ सरकारी कामकाज में ही बदलाव नहीं आया है,बल्कि सरकार को अपना वोट देने वाले मतदाताओं को भी सत्ता पक्ष से आशायें जगी हैं. इस देश में जो आतंकवादी एकजुट होकर यहां युद्घ जैसी ...

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संघ का अब होगा रूपांतरणकारी शक्तियों पर ध्यान

केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनते ही यह प्रश्न पूछा जाने लगा कि अब संघ क्या करेगा. यह अस्वभाविक नहीं है. जैसी धारणा होती है, वैसी ही जिज्ञासा और प्रश्न उत्पन्न होते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के विमर्श में तथ्यों,वास्तविकता, असलियत से कम छवि, धारणा और अभिप्रायों से कहीं अधिक देखा जाता रहा है. धारणा यही है कि संघ पीछे से राजनीति करता है और छवि यही बनायी गयी है कि यह अल्पसंख्यकों के प्रति अस ...

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11 जून / शिवाजी राज्याभिषेक दिवस स्वराज्य और सुशासन की विरासत

ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक समारोह रायगढ़ किले पर संपन्न हुआ. तारिख थी 6 जून 1674. आज इस घटना को 340 साल हो रहे हैं. शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक एक युगपरिवर्तनकारी घटना थी. महाराजा पृथ्वीराज सिंह चौहान के बाद भारत से हिंदू शासन लगभग समाप्त हो चुका था. दिल्ली में मुगलों की सल्तनत थी, और दक्षिण में आदिलशाही, कुतुबशाही आदि मुस्लिम राजा राज्य कर रहे थे. सभी जगह इनके सरदार-सेनापति हिं ...

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यूरोप-अमेरिका के ईसाई खेमों में खलबली

पश्चिमी यूरोपीय देश एवं अमेरिका अपने यहां के लोकतंत्र एवं सामाजिक एकात्मता का जब उल्लेख करते हैं तब पंथनिरपेक्षता, पंथ के परे की भूमिका अथवा सेक्युलरिज्म का उल्लेख जरूर करते हैं. मुख्य रूप से इन देशों के नागरिक, मिशनरी, व्यावसायिक प्रतिनिधि, विदेश नीति क्षेत्र के कूटनीतिक और वास्तव में विदेशों के दौरे पर जाने वाले मंत्रिगण अपने सेक्युलरिज्म पर जोर देते हैं. इसका संदर्भ यह होता है कि ‘हमारे देश में हमारा पंथ ...

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हम करेंगे भारत का ईसाइकरण

पिछले अंक में हमने वेटिकन में पहले के दो पोप को संतई की उपाधि देने की चर्चा की थी. वेटिकन के अनुसार, उस कार्यक्रम में दस लाख लोग उपस्थित थे. किसी पंथ की शीर्ष गद्दी अपने यहां किसी पहले रहे पांथिक प्रमुख को संत या जो भी उपाधि दे, यह उस पंथ और उसके अनुयायिायों का अपना अंदरूनी मामला है, पर भारत जैसै सौ से अधिक छोटे-बड़े देशों का अगर कोई पोप शत-प्रतिशत 'ईसाईकरण' करने का विचार रखता था, जिससे उन देशों की संप्रभुत ...

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संघ और व्यक्ति पूजा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझना आसान नहीं है. इसका मुख्य कारण यह है कि संघ वर्तमान में प्रचलित किसी राजनीतिक पार्टी या सामाजिक संस्था या संगठन के ढांचे में नहीं बैठता. कुछ लोगों को लगता हैं कि संघ में तानाशाही पद्धति से काम चलता हैं तो कुछ अन्य लोग यह दावा करते हैं कि संघ में नेतृत्व की पूजा होती हैं. ये दोनों भी सत्य से बिल्कुल परे हैं. व्यक्ति पूजा नहीं संघ के संस्थापक ने ऐसी एक कार्यशैली का आविष्कार किय ...

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जनता ने चुना अपना उत्तराधिकारी

सोलहवीं लोकसभा चुनाव एक ही कारण से ऐतिहासिक माना जायेगा, वह कारण है कि यह पूरा चुनाव एक ही प्रश्न पर केंद्रित हो गया था कि जनता को नरेंद्र मोदी चाहिये या नहीं. अगर किसी राज्य में कोई समस्या आती है तो अपवाद स्वरूप इस समस्या पर सबसे मत लिये जाते हैं. गोवा का महाराष्ट्र में विलीनीकरण किया जाय या उसे स्वतंत्र रखा जाये? इस मुद्दे पर जब गोवा की जनता का मत पूछा गया तो उन्होंने गोवा को स्वतंत्र रखने का निर्णय दिया. ...

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‘संत’ के बाने का सच

विश्व के प्रसार माध्यमों तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में ईसाइयत के प्रमुख पोप भाईचारे से रहने की बात भले करते हों किंतु पहले के उन दो पोप को व्यावहारिकता में चर्च द्वारा उनकी शह पर विश्व के पचास देशों को पांच सदी तक लूटते रहने तथा अपने फैलाव के लिये नरसंहार तक की सीमा तक जाने के लिये ज्यादा जाना जाता है जिन्हें अप्रैल के अंतिम सप्ताह में वेटिकन में संतई की उपाधि दी गई. वैसे दुनिया में पोप की छवि शांत ...

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‘सेकुलर’ राजनीति का ‘लज्जा’ जनक सच

तस्लीमा नसरीन ने सेकुलरिज्म की आड़ में कट्टरपंथ का पोषण करने वाली राजनीति पर गंभीर सवाल उठाया है. यह सवाल लोकतंत्र की रक्षा का है, और नारी के सम्मान की रक्षा का भी. सवाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी है, और उदार भारतीय मूल्यों की उपासना का भी. सवाल यह भी है, कि घुसपैठिये और शरणार्थी में अंतर करना हम सीख पाये हैं क्या ? 51 वर्षीय बंगलादेशी लेखिका सुश्री तस्लीमा नसरीन का नाम दुनिया ने तब जाना, जब 1993 में उन ...

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