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स्वदेशी आन्दोलन के प्रवर्तक विपिन चन्द्र पाल

20 मई/पुण्य-तिथि स्वतन्त्रता आन्दोलन में देश भर में प्रसिद्ध हुई लाल, बाल, पाल नामक त्रयी के एक स्तम्भ विपिनचन्द्र पाल का जन्म सात नवम्बर, 1858 को ग्राम पैल (जिला श्रीहट्ट, वर्तमान बांग्लादेश) में श्री रामचन्द्र पाल एवं श्रीमती नारायणी के घर में हुआ था. बचपन में ही इन्हें अपने धर्मप्रेमी पिताजी के मुख से सुनकर संस्कृत श्लोक एवं कृत्तिवास रामायण की कथाएँ याद हो गयी थीं. विपिनचन्द्र प्रारम्भ से ही खुले विचारो ...

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बैरिस्टर नरेन्द्रजीत सिंह

18 मई/जन्म-दिवस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में संघचालक की भूमिका परिवार के मुखिया की होती है. बैरिस्टर नरेन्द्रजीत सिंह ने उत्तर प्रदेश में इस भूमिका को जीवन भर निभाया. उनका जन्म 18 मई, 1911 को कानपुर के प्रख्यात समाजसेवी रायबहादुर श्री विक्रमाजीत सिंह के घर में हुआ था. शिक्षाप्रेमी होने के कारण इस परिवार की ओर से कानुपर में कई शिक्षा संस्थायें स्थापित की गयीं. बैरिस्टर साहब के पूर्वज पंजाब के मूल निवासी थे. व ...

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कर्मयोगी गोविन्दराव कात्रे

16 मई/पुण्य-तिथि कुष्ठ रोगियों को समाज में प्रायः घृणा की दृष्टि से देखा जाता है. कई लोग अज्ञानवश इस रोग को पूर्व जन्म के पापों का प्रतिफल मानते हैं. ऐसे लोगों की सेवा को अपने जीवन का ध्येय बनाने वाले सदाशिव गोविन्द कात्रे का जन्म देवोत्थान एकादशी (23 नवम्बर, 1901) को जिला गुना (मध्य प्रदेश) में हुआ था. धार्मिक परिवार होने के कारण उनके मन पर अच्छे संस्कार पड़े. आठ वर्ष की अवस्था में पिताजी के देहान्त के बाद ...

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वानप्रस्थी सेना के नायक जितेन्द्रवीर गुप्त

11 मई/जन्म-दिवस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य विस्तार में प्रचारकों का बड़ा योगदान है. साथ ही उस कार्य को टिकाने तथा समाज के विविध क्षेत्रों में पहुंचाने में वानप्रस्थी कार्यकर्ताओं की बहुत बड़ी भूमिका है. 11 मई, 1929 को नरवाना (हरियाणा) में संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता बाबू दिलीप चंद्र गुप्त के घर जन्मे श्री जितेन्द्रवीर गुप्त वानप्रस्थी कार्यकर्ताओं की मालिका के एक सुगंधित पुष्प थे. श्री जितेन्द्र जी को सं ...

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विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर

7 मई/जन्म-दिवस बंगला और अंग्रेजी साहित्य के माध्यम से भारत को विश्व रंगमंच पर अमिट स्थान दिलाने वाले रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 को कोलकाता में हुआ था. इनके पिता का नाम श्री देवेन्द्रनाथ तथा माता का नाम शारदादेवी था. बचपन से ही काव्य में रुचि रखने वाले इस प्रतिभाशाली बालक को देखकर कौन कह सकता था कि एक दिन विश्वविख्यात नोबेल पुरस्कार जीतकर यह कवि भारत का नाम दुनिया में उज्जवल करेगा. रवीन्द्रनाथ के प ...

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श्री रामानुजाचार्य

श्रीरामानुजाचार्य जयंती पर विशेष दक्षिण भारत के पाण्ड्य राज्य का महाप्रतिभुतिपुरी वह शक्ति स्थान है, जो आचार्य के आविर्भाव से धन्य हुआ. आसुरिकेशवाचार्य दीक्षित चन्द्र ग्रहण के समय कैरविणी सागर संगम पर अपनी पत्नी के साथ स्नान करने आये थे. उनकी पत्नी श्रीकान्तिमती जी श्रीयामुनाचार्य जी के शिष्य श्री शैलपूर्ण जी की बहिन थी. भगवदीय वरदान से जो तेजोमय पुत्र उन्हें यथासमय प्राप्त हुआ, उसका नाम लक्ष्मण रखा गया. यह ...

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आद्य शंकराचार्य

सहस्रों वर्ष की बात है. सर्वशास्त्र-निष्णात श्रीशिवगुरु नामक एक अत्यन्त पवित्र धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे. उनकी पत्नी का नाम सुभद्रा था. सुभद्र देवी धर्म की मूर्ति जैसी थीं. अधिक आयु व्यतीत होने के बाद भी उन्हें कोई संतान नहीं हुई. पुण्यमयी देवी ने भगवान आशुतोष शिव की आराधना आरम्भ की.शशांकशेखरसंतुष्ट हुये और वृद्धावस्था में उनकी कोख से एक अत्यंत तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ. कहा जाता है, भगवान शंकर ही उपासना से तुष् ...

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भीमबेटका गुफा चित्रों के अन्वेषक हरिभाऊ वाकणकर

4 मई/जन्म-दिवस भीमबेटका गुफा चित्रों के अन्वेषक हरिभाऊ वाकणकर भारतीय सभ्यता न केवल लाखों वर्ष प्राचीन है, अपितु वह अत्यन्त समृद्ध भी रही है. इसे विश्व के सम्मुख लाने में जिन लोगों का विशेष योगदान रहा, उनमें श्री विष्णु श्रीधर (हरिभाऊ) वाकणकर का नाम उल्लेखनीय है. हरिभाऊ का जन्म 4 मई, 1919 को नीमच (जिला मंदसौर, म.प्र.) में हुआ था. इतिहास, पुरातत्व एवं चित्रकला में विशेष रुचि होने के कारण अपनी प्राथमिक शिक्षा ...

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निष्ठावान स्वयंसेवक बंसीलाल सोनी

1 मई/जन्म-दिवस संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री बंसीलाल सोनी का जन्म एक मई, 1930 को वर्तमान झारखंड राज्य के सिंहभूम जिले में चाईबासा नामक स्थान पर अपने नाना जी के घर में हुआ था. इनके पिता श्री नारायण सोनी तथा माता श्रीमती मोहिनी देवी थीं. इनके पुरखे मूलतः राजस्थान के थे, जो व्यापार करने के लिये इधर आये और फिर यहीं बस गये. बाल्यावस्था में ही उन्होंने अपने बड़े भाई श्री अनंतलाल सोनी के साथ शाखा जाना प्रारम्भ किया. ...

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राष्ट्रसन्त तुकड़ो जी महाराज

30 अप्रैल / जन्म-दिवस 23 जुलाई, 1955 को जापान के विश्व धर्म सम्मेलन में एक संन्यासी जब बोलने के लिये खड़े हुये, तो भाषा न समझते हुए भी उनके चेहरे के भाव और कीर्तन के मधुर स्वर ने ऐसा समां बांधा कि श्रोता मन्त्रमुग्ध हो उठे. लोगों को भावरस में डुबोने वाले वे महानुभाव थे राष्ट्रसंत श्री तुकड़ो जी महाराज. तुकड़ो जी का जन्म 30 अप्रैल, 1909 को अमरावती (महाराष्ट्र) के ‘यावली’ गांव में हुआ था.  इनके पिता श्री बंडो ...

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