अपना जीवन स्वार्थ के लिए नहीं, सबका भला करने के लिए है – डॉ. मोहन भागवत जी Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली. दिल्ली के अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने The RSS: Roadmaps for the 21st C नई दिल्ली. दिल्ली के अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने The RSS: Roadmaps for the 21st C Rating: 0
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    अपना जीवन स्वार्थ के लिए नहीं, सबका भला करने के लिए है – डॉ. मोहन भागवत जी

    नई दिल्ली. दिल्ली के अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने The RSS: Roadmaps for the 21st Century पुस्तक का विमोचन किया. कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि हमारा विविधताओं वाला देश है. देश एकता की विविधता को समझने वाला देश है. अपना जीवन स्वार्थ के लिए नहीं है, अपना जीवन सबका भला करने के लिए है.

    संघ का चिंतन है कि व्यवस्था बदलने से काम नहीं चलेगा. व्यक्ति का आचरण बदलना पड़ेगा. यदि समस्याएं हैं तो उसकी व्यवस्था है, चिंतन से समाधान निकल सकता है, मूल बात व्यक्ति को बदलने की है. समाज में विभिन्न प्रकार की समस्याएं हैं, उनका परिहार करना, समाज जीवन के विविध आयामों के अंगों का परिष्कार का प्रयास संघ के स्वयंसेवक करते हैं. संघ सब कुछ करता है ऐसा नहीं है, सब कुछ संघ ने किया ऐसा जब हो गया तो यह संघ की पराजय है. संघ चाहता है पूरा समाज संगठित हो.

    मनुष्य के विचारों को देश, काल परिस्थिति की मर्यादा रहती है. देश, काल परिस्थितियां जैसे बदलती हैं, इन विचारों के बहुत अंशों को बदलना पड़ता है, शाश्वत कुछ बातें रहती हैं. अपने विचारों को एक किला बनाकर अपने आप को उसके अंदर बंद कर लें तो यह संभव नहीं होगा.

    कभी-कभी लोगों को लगता है कि इस पर मतभेद है, मतभेद तो होता ही है, इसमें कौन सी बड़ी बात है. प्रत्येक व्यक्ति को अलग-अलग मस्तिष्क मिला है, अनुभव मिला है, हर व्यक्ति का प्रत्येक मामले में मत एक जैसा हो यह हो नहीं सकता, सामान्य व्यक्ति भी बुद्धि रखता है, कई बार वह बड़े तत्ववेत्ताओं से भी बड़ी बात करते हैं.

    संघ का विचार कोई आइडियोलॉजी नहीं है. संघ को अपने अलग आइडियोलॉग रखने की आवश्यकता नहीं है, देश और विदेश में कई ऐसे आइडियोलॉग हैं. संघ का हर स्वयंसेवक, संघ के बारे में सोचता है. संघ के बारे में वह क्या सोचे, इसके लिए वह स्वतंत्र है. अपनी स्वतंत्रता का वह पूर्ण प्रयोग करता है. समाज का स्वाभाव ऐसा है जो उसके मन में होता है, वह बोलता है. उनके सामने संघ का कार्यकर्ता होता है तो उनसे पूछेंगे ही, ऐसा बिना सोचे की संघ इस पर क्या विचार करेगा.

    शाश्वत परिवर्तन के लिए व्यवस्था बदलने से काम नहीं चलेगा, बल्कि व्यक्ति को आचरण सही करना होगा. विचारों की स्वतंत्रता हमें पूर्णत: माना है. संघ में दक्ष की आज्ञा का मतलब यह नहीं कि सब दक्ष ही रहें, लेकिन स्वयंसेवकों ने मान लिया. स्वयंसेवक बनने के बाद समाज की भी अपेक्षा होती है.

    उन्होंने कहा कि संघ समझना है तो डॉ. हेगवार जी का जीवन समझिए. हमारे यहां व्यक्ति आदर्श नहीं है, भगवाध्वज आदर्श है. संघ में आइए, संघ में 2-3 साल रहिए. संघ के बारे में गलतफहमियां जरूर दूर हो जाएंगी.

    संघ की सारी संकल्पना भारतीय होने के नाते उसकी कुछ बातों के लिए विदेशी भाषा में कोई शब्द नहीं है. हम सब लोगों को सरल लग सके, सुनील जी ने ऐसी भाषा में लिखा है. भागदौड़ के बावजूद सुनील जी ने लिखा, वह कौतुक और आनंद का विषय है.

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

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