आतंकवाद के गढ़ में हर-हर महादेव Reviewed by Momizat on . जिस तरह वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण और महाभारत इत्यादि संस्कृत ग्रंथ भारत के गौरवशाली अतीत को संजोए हुए हैं, उसी तरह हमारे तीर्थ स्थल, मेले, पर्व, त्यौहार और धार जिस तरह वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण और महाभारत इत्यादि संस्कृत ग्रंथ भारत के गौरवशाली अतीत को संजोए हुए हैं, उसी तरह हमारे तीर्थ स्थल, मेले, पर्व, त्यौहार और धार Rating: 0
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    आतंकवाद के गढ़ में हर-हर महादेव

    जिस तरह वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण और महाभारत इत्यादि संस्कृत ग्रंथ भारत के गौरवशाली अतीत को संजोए हुए हैं, उसी तरह हमारे तीर्थ स्थल, मेले, पर्व, त्यौहार और धार्मिक यात्राएं हिमालय से कन्याकुमारी तक फैले हमारे विशाल देश को एक सूत्र में बांधे हुए है. विश्व के सबसे ऊंचे हिमालय पर्वत की हिमाच्छादित चोटियों पर 15 हजार फीट की ऊंचाई पर श्री अमरनाथ धाम की पवित्र गुफा में पिछले 05 हजार वर्षों से चली आ रही हिमलिंग की पूजा, 350 वर्षों से चली आ रही छड़ी मुबारक यात्रा और 150 वर्षों से चल रही यह वर्तमान अमरनाथ यात्रा निःसंदेह भारत और हिन्दू समाज की एकता और आस्था की प्रतीक है.

    भारत भर में फैले सभी तीर्थों में अमरनाथ धाम की यात्रा को बहुत कठिन माना जाता है. सारा मार्ग बर्फ से आच्छादित और कठिनाइयों से भरा है, फिर भी दुनिया भर के हिन्दू यहां गुरु पूर्णिमा से श्रावण पूर्णिमा के बीच बड़ी श्रद्धा भक्तिभाव से इसकी पूजा करने आते हैं. हर वर्ष इस यात्रा पर जाने वालों की संख्या निरंतर बढ़ रही है. प्रारम्भ में इस यात्रा की अवधि एक मास की थी, परन्तु तत्कालीन राज्यपाल से.नि. जनरल एस.के. सिन्हा ने इसे दो मास की कर दिया. इस पर तब के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कड़ा विरोध किया था, परन्तु जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने यात्रा को दो मास तक जाने करने की अनुमति दे दी.

    अनेक प्रकार के प्राकृतिक, सामाजिक एवं आतंकी खतरों को चुनौती देते हुए प्रत्येक वर्ष अमरनाथ धाम में बर्फानी बाबा के दर्शनों के लिए निकलने वाली अमरनाथ यात्रा निरंतर प्रगति करती हुई चली आ रही है. पिछले लगभग 30 वर्षों से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के शिकार जम्मू-कश्मीर प्रांत में राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सौहार्द का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत कर रही है यह पवित्र यात्रा. आतंक के गढ़ में हर-हर महादेव के गगनभेदी उद्घोषों का गूंजना इस तथ्य को उजागर करता है कि भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने आध्यात्मिक अमृतपान कर रखा है, इसे कोई मिटा नहीं सकता.

    याद करें अमरनाथ श्राइन बोर्ड को प्रदेश की सरकार ने जब सन् 2008 में बालटाल (कश्मीर) में 800 कनाल जमीन दी थी तो अलगाववादियों और कट्टरपंथियों ने इसे ‘इस्लाम पर खतरा’ बताकर बवंडर खड़ा कर दिया था. यह जमीन अमरनाथ यात्रियों के लिए एक अस्थाई विश्रामगृह बनाने के लिए किराये पर दी थी. तब फारुख अब्दुल्ला, मुफ्ती मोहम्मद सईद और अली शाह गिलानी ने इस कदम को ‘कश्मीरी राष्ट्रीयता’ पर अघात कहकर इसका विरोध किया था. जबकि वास्तव में तो यह हिन्दुओं की आस्था पर आघात था.

    पूरे भारत विशेषतया जम्मू के हिन्दू समाज ने संगठित होकर दो माह तक प्रचंड जनांदोलन चलाकर हिन्दुत्व विरोधी सरकार और नेताओं को चुनौती दी थी. सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा. शिवभक्त हिन्दू यात्रियों की इस विजय ने एक इतिहास रच डाला और यह संकेत भी दिया कि यदि समस्त हिन्दू समाज संगठित और शक्तिशाली होकर अपने धर्म की रक्षा के लिए कटिबद्ध हो जाए तो इतिहास को बदला भी जा सकता है.

    पूर्व में अमरनाथ यात्रियों पर तीन बार हुए आतंकी हमलों के बावजूद भी बर्फानी बाबा के भक्तों के सीने तने रहे और यात्रा अबाध रूप से चलती रही. दो दशक पहले अमरनाथ यात्रा मार्ग पर हुए भारी हिमस्खलन की चपेट में आकर 300 से ज्यादा शिवभक्तों ने अपने प्राण गंवा दिए थे. इस प्रकार की भयावह परिस्थितियों में भी अमरनाथ यात्रियों के पांव डगमगाए नहीं.

    इन दिनों चल रही अमरनाथ यात्रा को भी अनेकविध राजनीतिक, धार्मिक तथा आतंकवादी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. केन्द्र में स्थापित भाजपा सरकार विशेषतया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के निर्देशानुसार जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के मार्गदर्शन में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था ने आतंकवादियों और अलगाववादियों के जेहादी इरादों को दफन कर दिया है. सुरक्षाबलों की मुस्तैदी के कारण यात्रियों का उत्साह भी सातवें आसमान पर है. हिन्दू यात्री बैखौफ होकर अपने आद्य देव शिव के दर्शनों के लिए उमड़ रहे हैं. लाखों देशभक्तों के मन में कहीं कोई भय, घबराहट और थकावट का नामोनिशान तक दिखाई नहीं पड़ता. वातावरण ऐसा है कि मानों प्रचंड आस्था के आगे निरंकुश अनास्था ने घुटने टेक दिए हों.

    हिन्दू समाज की इस एकता, आध्यात्मिक आस्था और अपने धार्मिक प्रतीकों के प्रति समर्पण की भावना से घबराकर जम्मू-कश्मीर में सक्रिय अलगाववादियों, पाकिस्तान समर्थकों और कट्टरपंथी कश्मीरी नेताओं के चेहरों की हवाइयां उड़ गई हैं. यात्रियों की सुरक्षा के लिए मात्र तीन घंटे के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग को बंद करने पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. ‘इससे कश्मीरियों को असुविधा हो रही है’ जैसे दुष्प्रचार किए जा रहे हैं. अर्थात् लाखों हिन्दुओं की जान की रक्षा के लिए यदि थोड़ी देर के लिए कुछ लोगों को असुविधा होती भी है तो यह भी इन्हें बर्दाश्त नहीं है.

    वैसे यह कट्टरपंथी और अलगाववादी लोग इस यात्रा के प्रति हमदर्दी दिखाने का मगरमच्छी नाटक भी करते हैं. जब भारी वर्षा एवं बर्फबारी से यही राजमार्ग कई-कई दिनों तक बंद रहता है, तब इन कट्टरपंथी कश्मीरी नेताओं को असुविधा नहीं होती क्या? जब प्रधानमंत्री अथवा किसी अन्य केन्द्रीय मंत्री के कश्मीर दौरे पर सारे कश्मीर को बंद कर दिया जाता है, तब भी इन्हें आम जनता की असुविधा नजर नहीं आती क्या? असुविधा का यह सारा नाटक भाजपा, हिन्दुत्व और देशविरोधी राजनीति का परिचायक है.

    इन मुट्ठीभर हिन्दू विरोधी तत्वों को यह जानकारी तो होगी ही कि यह अमरनाथ यात्रा प्रत्येक वर्ष हजारों कश्मीरियों को रोजगार देकर उनकी कमाई का साधन भी बनती है. होटल वालों, शिकारे वालों, घोड़े वालों, पालकी वालों, जलपान वालों तथा मजदूरों को बहुत बड़ा व्यवसायिक लाभ होता है. कट्टरपंथी नेताओं को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि अमरनाथ यात्रा और माँ वैष्णो देवी की यात्राएं सारे जम्मू-कश्मीर के पर्यटन उद्योग का आधार हैं.

    यह ठीक है कि इन व्यापारी कश्मीरियों के सहयोग से यात्रा सफल होती है, परन्तु यह सहयोग भी सेवाभाव अथवा भाईचारे का न होकर नोट कमाने का साधन ज्यादा होता है. यात्रियों को दी जाने वाली इन सुविधाओं के रेट भी आसमान छू जाते हैं. तो भी हिन्दू यात्रियों की आस्था, हौंसले और आध्यात्मिक निष्ठा का बाल भी बांका नहीं होता.

    हिन्दुत्व विरोधी अलगाववाद, जेहादी आतंकवाद और भयंकर बर्फानी तूफान भी इस यात्रा को रोक नहीं सकते. हिन्दुओं की संगठित शक्ति और आस्था का परिचय देने वाली सदियों पहले शुरु हुई यह यात्रा सदियों पर्यन्त चलती रहेगी. सनातन शैव मत के उद्गम स्थल कश्मीर की हिमाच्छादित वादियों में हर-हर महादेव के उद्घोष गूंजते रहेंगे.

    नरेंद्र सहगल

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