आयुर्वेद में शोध, चुनौतियां व भविष्य की संभावनाएं विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला Reviewed by Momizat on . चित्रकूट (विसंकें). पं. दीनदयाल उपाध्याय जी एवं राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दीनदयाल शोध संस्थान, चित्रकूट के स्वास्थ्य प्रकल्प आरो चित्रकूट (विसंकें). पं. दीनदयाल उपाध्याय जी एवं राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दीनदयाल शोध संस्थान, चित्रकूट के स्वास्थ्य प्रकल्प आरो Rating: 0
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    आयुर्वेद में शोध, चुनौतियां व भविष्य की संभावनाएं विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला

    भोपाल (2)चित्रकूट (विसंकें). पं. दीनदयाल उपाध्याय जी एवं राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दीनदयाल शोध संस्थान, चित्रकूट के स्वास्थ्य प्रकल्प आरोग्यधाम के आयुर्वेद सदन के तत्वाधान में भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के सहयोग से आयुर्वेद के क्षेत्र में शोध, चुनौती एवं भविष्य की सम्भावनाओं विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया. कार्यशाला के द्वितीय दिन डॉ. एमबी शंकर पीएलआईएम गाजियाबाद, डॉ. आरसी अग्रवाल प्रियम्बदा बिरला कैंसर रिसर्च हॉस्पिटल सतना, डॉ. शरद श्रीवास्तव, डॉ. अनिल मंगल आयुष, ग्वालियर का मार्गदर्शन प्रशिक्षणार्थियों को मिला.

    आयुर्वेदिक औषधियों से रोगी का उपचार करने वाले डॉ. अनिल मंगल ने कहा कि फिटकिरी चूर्ण को शहद के साथ मुंह के छालों में लगाने पर दो-तीन दिन में ही लाभ मिल जाता है. हम कोई भी छोटा या बड़ा प्रयोग करें, उसका पूरा डाटा हमारे पास रहना चाहिये. इसी क्रम में अन्य वैज्ञानिकों ने बताया कि नीम हल्दी पर चर्चा हम खूब करते हैं, यदि हमें विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा करनी है तो आधुनिक तकनीकी को भी साथ लेना होगा. यदि आपको आयुर्वेदिक पद्धति से ही किसी समस्या का समाधान करना है तो सर्वप्रथम आपको अपने आप पर विश्वास विकसित करना होगा, तभी आपको पूर्णतः लाभ मिलेगा.

    भोपाल (1)समापन सत्र के पूर्व दो दिवसीय कार्यशाला में भाग ले रहे प्रशिक्षणार्थियों ने भी अपने-अपने विचार रखे. इस दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला के समापन सत्र की अध्यक्षता सद्गुरु सेवा संघ ट्रस्ट के निदेशक डॉ. बीके जैन ने की एवं मुख्य अतिथि प्रो. योगेश दुबे कुलपति, रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय रहे. दीनदयाल शोध संस्थान के संगठन सचिव अभय महाजन जी भी पूरे समापन सत्र में उपस्थित रहे. डॉ. विजय प्रताप सिंह ने दो दिवसीय कार्यशाला की संक्षिप्त जानकारी सबके समक्ष रखी. प्रो. योगेश दुबे ने कहा कि आयुर्वेद में शोध की बात है, जब यह राष्ट्र विश्वगुरु था, उस समय संस्कृत एवं आयुर्वेद हमारे पास थे, जब इन दोनों का ह्रास हुआ तो हम धीरे-धीरे नीचे आने लगे, यह हमारी धरोहर थी. आज यदि हमें अपने आयुर्वेद एवं संस्कृति को पुनः विश्व पटल पर लाना है तो संस्कृत भाषा का गहन अध्ययन एवं ज्ञान आवश्यक है. इस देश में आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा के लिये एक उचित दिशा देने के लिये दीनदयाल शोध संस्थान के परिसर से कोई अच्छा परिसर नहीं है. अतः हम सबको एक ऐसा आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय विकसित कर पूरे देश को एक दिशा देने का प्रयास करना चाहिये.

    डॉ. बीके जैन ने कहा कि जिस दीनदयाल शोध संस्थान परिसर में यह दो दिवसीय प्रशिक्षण लिया, राष्ट्रऋषि नानाजी ने कितने वर्ष पूर्व इस पौधे को रोपित किया था जो आज वट वृक्ष बनकर आप सबके सामने है. यदि हमको वास्तव में आयुर्वेद के क्षेत्र में  राष्ट्र की कुछ सेवा करनी है तो हम सबको यह विचार करना चाहिये कि हमारी क्षमता क्या है, हमारी कमजोरी क्या है. अगर इस क्रम से हमने व्यवहारिक धरातल पर प्रयास किया तो सुविधायें अपने आप बनेगी एवं हमारी सोच शोध की होगी.

    डॉ. शंकर ने अपने उद्बोधन में एक शब्द सहिष्णुता लिया था यानि योग प्राकृतिक चिकित्सा आयुर्वेदा यूनानी सब पैथियों में जो-जो अच्छा है, उसे हमने अपने व्यवहारिक जीवन में लिया. हमारे वेद पुराणों एवं लोक परम्पराओं में जो-जो चीजे बताई गई हैं, वे सब एक प्रकार का शोध ही है, यानि हमारे पूर्वजों ने अपने प्रत्यक्ष जीवन में जिस चीज को अनुभव किया, वही प्रमाणिक व्यवहार बन गया. जैसे-प्रातः के समय जो मूली सेवन औषधी का काम करता है, वही मूली यदि हमने रात्रि में खाई तो नुकसान करेगी. नानाजी कहा करते थे कि हमारा हर एक कार्य अनुकरणीय होना चाहिये, अपने अहं को छोड़कर चर-अचर हम सबका कुटुम्ब है, जो मुझमें है वह सब में है, इससे हमारी सोच की दिशा ही बदल जायेगी. कार्यक्रम का समापन पर डॉ. मनोज त्रिपाठी ने सभी प्रतिभागियों का आभार प्रदर्शन कर किया.

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