इंदौर और मेरठ की घटनाओं पर मीडिया ने क्यों साधी चुप्पी Reviewed by Momizat on . मेरठ में मुसलमानों की भीड़ अतिक्रमण हटाने के विरोध में पुलिस पर फायरिंग करती है. बसें तोड़ दी जाती हैं. इंदौर में एक स्कूल बस के नीचे बकरी का बच्चा आने के बाद म मेरठ में मुसलमानों की भीड़ अतिक्रमण हटाने के विरोध में पुलिस पर फायरिंग करती है. बसें तोड़ दी जाती हैं. इंदौर में एक स्कूल बस के नीचे बकरी का बच्चा आने के बाद म Rating: 0
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    इंदौर और मेरठ की घटनाओं पर मीडिया ने क्यों साधी चुप्पी

    मेरठ में मुसलमानों की भीड़ अतिक्रमण हटाने के विरोध में पुलिस पर फायरिंग करती है. बसें तोड़ दी जाती हैं. इंदौर में एक स्कूल बस के नीचे बकरी का बच्चा आने के बाद मुसलमानों की भीड़ बच्चों की बस पर पथराव करती है. हाथ जोड़ते बच्चों पर भी उसे दया नहीं आती.

    वहीं सेकुलर मीडिया का एकांगी और पूर्वाग्रही रवैया बार बार सामने आने से आम लोगों में पनपती नाराजगी सोशल मीडिया पर दिखाई देती है. ड्राईफ्रूट बेचते हुए कुछ कश्मीरियों के साथ लखनऊ में मारपीट की घटना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसी घटनाओं का दोहराव अविलंब सख्ती से रोके जाने के लिए समाज को सतर्क रहने की आवश्यकता है. लेकिन, इसके साथ ही मीडिया को भी ये देखना होगा कि दुर्घटनावश एक बकरी के कुचल जाने पर यदि मुसलमानों की भीड़ स्कूल बस पर पथराव करके कई बच्चों को घायल कर देने जैसी अमानवीय आक्रामकता से ग्रस्त है तो ऐसी घटनाएं पत्रकारिता के किन मानदंडों के तहत हाईलाइट नहीं किए जाने के योग्य हो जाती हैं?

    मेरठ में अवैध निर्माण हटाए गए तो वहां भी समुदाय विशेष की भीड़ ने बवाल मचा दिया. पुलिसवालों की भीड़ द्वारा पिटाई, उन पर पथराव और आगजनी करके पूरे शहर को ही आराजकता में झोंकने की कोशिश हुई. इस तरह की घटनाएं अत्यंत गंभीर होते हुए भी कथित सेकुलर मीडिया इनकी महत्ता को नजरअंदाज करते हुए रिपोर्टिंग से कतराता है.

    मीडिया का ये पूर्वाग्रही रुख ही कई बार “फुंसी को फोड़ा और फिर कैंसर का रूप” देने में मददगार हो जाता है. अखिलेश यादव की सरकार के दौरान मुजफ्फरनगर की घटना रही हो या कैराना की, मीडिया का रुख शुरुआती दौर में अत्यंत पूर्वाग्रही होने के कारण ही मुजफरनगर की घटना ने विकराल रूप लिया. बाद में हजारों परिवार को लंबे समय तक उसके दुष्परिणाम से प्रभावित होना पड़ा.

    लखनऊ में ड्राईफ्रूट बेचने वाले कुछ कश्मीरी युवकों की पिटाई को मीडिया ने फौरन हाईलाइट किया तो न्यायपालिका ने भी उसे अविलंब संज्ञान में लिया. सुप्रीमकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिये और सरकार ने भी प्रशासन को ऐसी घटनाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशीलता के साथ सख्त होने का निर्देश दिया. किसी भी व्यवस्था के लिए ये आदर्श स्थिति हो सकती है, परंतु ऐसी सतर्कता पूरी तरह से कारगर तभी हो पाएगी जब जाति-बिरादरी, समुदाय या प्रांत विशेष के नागरिकों के लिए सीमित न होकर हर आम नागरिक के लिए शासन-प्रशासन एक-समान दृष्टिकोण रखें और सभी के लिए ऐसी ही सतर्कता और सक्रियता बरती जाए.

    मध्य प्रदेश में ऐसी घटनाएं सुनने में नहीं आती थीं, पिछले दिनों सरकार बदलने के बाद वहां का महौल पहली बार कुछ-कुछ महाराष्ट्र जैसा नजर आने लगा है. समुदाय विशेष अर्थात् अल्पसंख्यकों में आश्चर्यजनक आक्रामकता देखने में आ रही है. मीडिया ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज करने का आदी है. परंतु कुछ घटनाएं तो मानवता के लिए कलंक जैसी कही जा सकती हैं.

    इंदौर में पिछले दिनों घटी घटना को इस आलोक में देखना बहुत जरूरी हो जाता है. वहां सोनी इंटरनेशनल स्कूल की बस नेमावर रोड पर बच्चों को लेकर जा रही थी. बस में नर्सरी से आठवीं कक्षा के करीब 50 बच्चे थे. काजी पलासिया गांव के पास अचानक बकरी का बच्चा बस के सामने आ गया. बस-चालक ने पूरी कोशिश की उसे बचाने की, लेकिन उसकी कोशिश नाकामयाब रही. आपातकालीन ब्रेक लगाने से बस का ब्रेक-सिस्टम भी जाम हो गया. बकरी के बच्चे की मौत की खबर सुनते ही आक्रोशित ग्रामीणों की भीड़ बस की ओर पथराव करते हुए आने लगी तो बस के अटेंडेंट और टीचर ने बच्चों को नीचे फर्श पर लेटने के लिए कहा. घबराए ड्राइवर ने बच्चों की सलामती के लिए बस वहां से निकालने की कोशिश की. इसी दौरान एक महिला दौड़ते हुए बस में चढ़ गई और रेंगती हुई बस के ड्राइवर की गर्दन दबोच ली. इससे ड्राइवर का बस पर नियंत्रण नहीं रहा और बस पास के एक खेत में जा घुसी. इस दौरान भीड़ ने बस पर पथराव जारी रखा. चारों तरफ बस की खिड़कियों के कांच के टुकड़े उड़ते रहे. भयभीत बच्चों की चीख-पुकार से भी आक्रामक भीड़ पर कोई असर नहीं हुआ. चालक, कंडक्टर और टीचर ग्रामीणों से हाथ जोड़कर मासूम बच्चों की दुहाई देते रहे, लेकिन उन लोगों को मासूम बच्चों पर भी रहम नहीं आया. किसी तरह टीचर ने स्कूल प्रबंधन को फोन किया. तब स्कूल से 100 नम्बर पर डॉयल कर पुलिस की मदद मांगी गई. पथराव से नौ बच्चों को गंभीर चोटें आईं, जिन्हें उपचार के बाद उनके परिवार को सौंपा गया.

    इंदौर प्रशासन की सख्ती और स्कूल प्रबंधन की समझदारी के चलते बस में सीसीटीवी कैमरे लगे थे. उसके फुटेज की मदद से ग्रामीणों की पहचान हो गयी. जाहिर है कि इतना सब होने के बाद गिरफ्तारी करना भी प्रशासन की मजबूरी हो गयी. यदि फुटेज न होती तो किसकी मजाल थी गिरफ्तारी की. बिना इस तरह के ठोस प्रमाण के पुलिस कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती, क्योंकि बच्चों पर पथराव करने वाले जिन लोगों की पहचान हुई, उन आरोपियों के नाम आरिफ, रफीक, शकील, रशीद, नासिर शाबिर, नईम, जावेद, नौशाद ,मेहमूद और रिजवाना है. इन सभी पर फिलहाल बलवा, मारपीट और पथराव का केस दर्ज किया गया है.

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