करंट टॉपिक्स

इच्छाओं को खबर बनाकर दिखाते मीडिया संस्थान

शिवा पंचकरण

धर्मशाला

“हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और”, ये कहावत “द प्रिंट” और उसके संपादक ‘शेखर गुप्ता’ पर पूरी तरह फिट बैठती है. अपनी सेक्युलर छवि बरकरार रखते हुए प्रिंट को 4 साल के करीब हो चुके है और इस दौर में असंख्य झूठ और भ्रामक लेख क्विंट के माध्यम से शेखर जी और उनकी रंगीन कलम के सिपाहियों ने फैलाए हैं. ट्विटर पर तो हर दूसरे दिन झूठ का सेहरा सजाये एक ट्वीट निकलता रहता है. खैर वह निजी राय हो सकती है. निजी जीवन में वह किसी भी पार्टी, पंथ और व्यक्ति के ख़ास हो सकते है. लेकिन संपादक के तौर पर जब बार-बार दुनिया को सच बोलने और लिखने की सलाह देने वाले शेखर जी झूठ लिखते हैं, तब समझ नहीं आता वह सच को झूठ लिखने की सलाह देते है या झूठ को झूठ बना कर ही फैलाने की. विडम्बना यह है कि झूठ फैला कर उसका फैक्ट चेक भी यही विभूतियाँ स्वयं करके उसे सच घोषित कर देती हैं. दुनिया में सबसे आसान काम क्या है? अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना. खुद को खुद ही ईमानदार  घोषित करके खुद ही रिश्वत लेने के बाद खुद ही न्याय करके रिश्वत को ही जायज़ ठहरा देना. लोकतंत्र, संविधान को बचाने में अग्रणी रहे शेखर गुप्ता जी झूठ को गढ़ने में काफी कुशल हैं.

मुगलों के दौर में सुल्तान को खुश रखने के लिए ख़ास दरबारी होते थे, जो उनका मनोरंजन करते थे. जब भी वह लिखने के लिए कलम उठाते तो सुलतान की तारीफ़ ही निकलती थी. लेकिन इससे हुआ क्या? इसी वजह से आज हम इतिहास की किताबों में अकबर महान, और महाराणा प्रताप का नाम भी नहीं सुन पाते है. कुछ समय तक का दौर भी वैसा ही था वही दिल्ली थी, वही जहाँपनाह और सुलतान थे, वैसे ही दरबारी थे. बदला था तो बस पता. जो लाल किले से 10 जनपथ का हो गया था. खैर दरबारियों की मुगलों के काल की तरह लोकतंत्र काल में भी मौज थी, सब बढ़िया चल रहा था. दरबार में ही मीडिया हाउस बनते थे, दरबार ही न्यूज़ बताता था, झूठ-सच सब अपने अनुसार ही बनाया जाता था. लेकिन रंग में भंग डाला सोशल मीडिया ने. सोशल मीडिया ने प्रत्येक व्यक्ति को आवाज़ दे दी, जिसके कारण आज तक दबी-कुचली प्रजा ने आवाज़ उठाने शुरू कर दी और 2014 का वो समय आया जब पहली बार पूर्ण बहुमत से नई सरकार बनी. आज तक दरबारी निर्णय लेते थे कि किस नेता को कौन सा मंत्री पद देना है, लेकिन अब दरबारियों से उनकी लाल बत्तियां और इम्पोर्टेड कागज़ जब्त कर लिए गये. बड़ी-बड़ी पार्टियों में लोग दरबारियों को दरकिनार करने लगे. दरबारियों को लगा कि वक़्त बदलेगा, इसलिए राफेल, नोटबंदी और जी.एस.टी का राग अलापते हुए 2019 का इंतज़ार करने लगे. लेकिन एक बार फिर जनता ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया. अब दरबारी परेशान होने लगे और इसीलिए अभी से ही दरबारियों ने 2024 का शंखनाद करना प्रारम्भ कर दिया है.

कांग्रेस के करीबी एडिटर गिल्ड के अध्यक्ष, द इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक और द प्रिंट के संपादक शेखर गुप्ता ने हाल ही में विपक्षी दलों को चुनाव जीतने के गुर सीखाए. उन्होंने साफ़ कर दिया है कि अगर वर्तमान सरकार को हराना है तो झूठ बोलो. झूठ बोल कर ही वर्तमान सरकार को हराया जा सकता है. बहुत से लोग आश्चर्यचकित हो कर सोच रहे हैं कि इसमें नया क्या है. झूठ तो यह हमेशा से ही फैलाते हैं, तो बताते चलें कि इससे पहले झूठ संभल कर और बड़ी बारीकी से फैलाया जाता था, लेकिन अब करो या मरो वाली स्थिति उत्पन्न हो चुकी है. इसीलिए अब सामने आ कर झूठ फैलाना होगा.

पूर्व में मीडिया को खुश रखने के चक्कर में प्रत्येक व्यक्ति को थोक के भाव अवार्ड्स और कुर्सियां बांटी गईं. प्रेस की स्वतंत्रता की हत्या करने वाले भी लोह महिला जैसे उपनामों से शोभित किये गए और आज तो आलम ये है कि कोई मीडिया जगत का ही व्यक्ति किसी का असली नाम भी ले दे तो एफआईआर हो जाती है. लेकिन कोई प्रेस की स्वतंत्रता का हनन नहीं होता. लेकिन वहीं झूठ खबर छापने वालों के पक्ष में एक पूरी जमात खड़ी हो जाती है. मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है, जिसका काम जनता तक सच पहुंचाना है. लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए मीडिया की सबसे अहम् भूमिका होती है. लेकिन क्या भारतीय मीडिया का एक तबका ये सब भूल चूका है? इतिहास उठा कर देखें तो जान पड़ता है कि ये सब चीज़ें एकाएक शुरू नहीं हुई. अपितु बहुत समय से इसी प्रकार से सरकारों और मीडिया का गठजोड़ बनता रहा है.

शेखर गुप्ता जी ने गलती से या पहली बार झूठ कहा हो ऐसा भी नहीं है. अभी कुछ दिन पहले उन्हें वर्तमान सरकार से प्रेस की स्वतंत्रता पर चिंता होने लगी थी. ट्वीट करते हुए एक झूठी खबर चलाने का प्रयास किया, जिसमें उन्होंने कहा – मोदी सरकार पत्रकारों पर नज़र रखने के लिए RFID (radio frequency identification cards) कार्ड का इस्तेमाल करेगी. जैसे ही ये पोस्ट वायरल हुआ, उसके तुरंत बाद इस दावे का खंडन करते हुए प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो के प्रमुख संचालक ने दावे को गलत बताया और इसे शेखर गुप्ता की इमेजिनेशन बताया. खबर की सच्चाई पता लगने के बाद भी शेखर गुप्ता ने इसी बात को अगले दिन फिर चलाया. पिछले वर्ष शेखर जी और द प्रिंट को भारत में पोलियो की दवाई की कमी की झूठी जानकारी भी प्राप्त हुई, जिसे फैलाने के भरपूर प्रयास किये. यहां तक झूठ कह दिया कि भारतीय सरकार के पास वैक्सीन खरीदने तक के पैसे नहीं हैं. बाद में स्वास्थ्य मंत्रालय ने इन बातों को खारिज कर दिया. लेकिन आज तक द प्रिंट या इसके सम्पादक द्वारा माफ़ी नहीं मांगी गई.

2012 में सरकार की कमियां छिपाने के लिए शेखर गुप्ता और वैसे कई पत्रकारों ने आमजन के मन में पत्रकारिता के नाम पर भारतीय सेना के खिलाफ जहर भरने का एक प्रयास किया. उस समय अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन भी चरम पर था और सरकार भ्रष्टाचार के आरोप पर चारों तरफ घिर चुकी थी. सारी बातों से ध्यान हटाने के लिए शेखर जी और उनके सहयोगियों ने द इंडियन एक्सप्रेस में तख्तापलट तक की बात कह दी थी. उन्होंने कहा कि सेना की दो टुकड़ियाँ सरकार को पूर्व सूचना दिए बिना दिल्ली कूच कर दिया है. तत्कालीन गृहमंत्री ने ना इस झूठी खबर के लिए कार्यवाही की, न ही कोई प्रश्न पूछा. घटना के पीछे केवल कुछ मीडिया के लोग थे या इसमें सरकार का हाथ था ये आज भी चर्चा का विषय है. हाल ही में केंद्रीय मंत्री वी.के. सिंह ने वर्तमान प्रधानमंत्री से इस विषय पर उच्च स्तरीय जांच की मांग की है.

कोरोना के दौर में भी ये झूठी ख़बरें फैलाने से नहीं चूके और एन95 मास्क की कमी की एक झूठी खबर प्रचारित करने की कोशिश की, लेकिन जल्द ही वह घड़ा भी फूट गया. कुछ समय पहले जब कश्मीर से अनुछेद 370 हटाया गया, तब भी शेखर गुप्ता ने कहा कि ये फैसला लेने से पहले सरकार ने अमेरिका से सलाह की थी. अपने मन से मनगढ़ंत बातें सोच कर उन्हें खबर बना कर सच्चाई के रूप में पेश करने वाले इस हुनर में शेखर गुप्ता दिन प्रतिदिन निखार लाने की कोशिश में जुटे रहते हैं. इनमें से कई खबरों तथा शेखर गुप्ता के लेखों को पाकिस्तान में बड़े जोर-शोर से चलाया जाता है. ताकि भारत की छवि को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया जा सके.

कुछ समय पहले आई.आई.टी कानपुर के प्रोफेसर वंशी शर्मा ने फैज़ की नज़्म ‘हम देखेंगे’ गाने वाले छात्रों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी, उन्हें द प्रिंट ने एक लेख में ‘लव जिहाद’ और “मुस्लिम विरोधी” बताते हुए कहा कि वह दलितों के उत्थान के भी पक्षधर नहीं हैं. शेखर गुप्ता को अपनी इस हरकत के लिए बाद में माफ़ी तक मांगनी पड़ी थी.

तेलंगाना एनकाउंटर को तो शेखर गुप्ता ने सीधे-सीधे तालिबान से ही जोड़ दिया था. अजित डोवाल का एन.एस.ए. बनना भी रास नहीं आया और अपनी फ़रिश्ता से ली हुई कलम से उन्होंने इस पर भी तंज़ कसा था, जिसका जवाब आई.पी.एस. एसोसिएशन से मिलने के बाद दोबारा उनके मन में डर का माहौल तैयार हो चुका होगा. 2016 में जब आतंकवाद के बढ़ने पर गौतम गंभीर ने कहा था कि खेल से ज्यादा भारतीयों की जिंदगी प्यारी है, इसीलिए मैं पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने की सोच भी नहीं सकता. जैसे ही गंभीर ने ये बात कही, हमारे शेखर जी को याद आ गया जिन्नाह का वो चेहरा जो आखिरी बार भारत के टुकड़े करते समय उन्होंने अक्सर किताबों में देखा था और तुरंत खिलाड़ी को खेल पर ध्यान देने की सलाह दे डाली.

दरअसल, एक गिरोह द्वारा खबरें कम और इच्छाएं ज्यादा छापी जाती हैं. असली खबर, असली तस्वीर को दबा दिया जाता है? ये सब चीज़ें यूँ ही नहीं होती, अपितु इसके पीछे एक पूरी फौज एक एजेंडे के तहत काम करती है. जिस मीडिया को स्वतंत्र होना चाहिए था, वह राजनैतिक दलों के प्रसाद पर चलता है और ये सिलसिला आज से नहीं 70 सालों से इसी प्रकार चलता रहा है. आज जब सबके हाथ में कलम है तो वह नेरेटिव आसानी से ध्वस्त हो जाते हैं और व्यक्ति की मंशा साफ़ नज़र आती है.

एक बार अपने एक भाषण के दौरान भारतीय मीडिया पर पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जी ने कहा था – मुझे बताइए, यहाँ का मीडिया इतना नकारात्मक क्यों है? भारत में हम अपनी अच्छाइयों, अपनी उपलब्धियों को दर्शाने में इतना शर्मिंदा क्यूँ होते हैं? हम एक महान राष्ट्र हैं. हमारे पास ढेरों सफलता की गाथाएं हैं, लेकिन हम उन्हें नहीं स्वीकारते! क्यूँ?

सत्ता को खुश रखने के चक्कर में इतिहास बनाने वाले मीडिया ने झूठ को बार-बार परोस कर सच बनाया. भारत को अपनी ही संस्कृति और आदर्शों से दूर रखने का मकसद क्या हो सकता है? आज सोशल मीडिया के आने के बाद लोग अचंभित हैं कि ये सारे झूठ आज तक चुप-चाप नहीं, अपितु गाजे-बाजे के साथ लिखे गये थे. मीडिया का एक वर्ग आम जन-मानस के मन में दुविधा की स्थिति क्यों बनाये रखना चाहता है? क्यों लोगों के मन में सेना, संविधान और संवैधानिक पदों पर भ्रम फैलाने का प्रयत्न करता है. इसके पीछे एक शक्तिशाली वर्ग लगा हुआ है, लेकिन भारत में रह कर भारत को ही नुक्सान पहुँचाने का मकसद क्या हो सकता है? मकसद जो भी हो, आज प्रत्येक भारतीय नागरिक अपने अपने स्तर पर इन झूठे प्रोपेगंडा और नेरेटिवों को ध्वस्त कर रहा है. आज इच्छाएं खबर तो बन रही हैं, किन्तु उन्हें फैलाने की मुश्किल दरबारी महसूस कर रहे हैं.

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