करंट टॉपिक्स

इबादत नहीं साजिश की पनाहगाह

रवि प्रकाश

मुंबई

भारत में स्वतन्त्रता के बाद परवर्ती कांग्रेसी सरकारों द्वारा धर्म-निरपेक्षता के नाम पर देश के एक विशाल वर्ग, और सच कहें तो विशाल बहुमत वर्ग के साथ अन्याय करते हुए वोट की राजनीति के वशीभूत कुछ कट्टर धार्मिक उन्मादियों को जिस प्रकार प्रश्रय दिया गया, उसके परिणाम आज देश के सामने प्रकट हो रहे हैं. दुःख की बात यह है कि ये परिणाम एक ऐसे वक्त में सामने आ रहे हैं, जब सारा देश केंद्रीय मंत्रिमंडल के संचालक, देश के सर्वप्रिय नेता प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में एक अभूतपूर्व गंभीर चुनौती का एकजुट होकर मुकाबला कर रहा है.

मुझे यह कहने का साहस करने दीजिये कि वे धार्मिक उन्मादी कौन हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. ये वही लोग हैं जो रहते तो भारत में हैं, सपने अरब के देखते हैं, जो पानी तो भारत का पीते हैं और चाह जमजम की रखते हैं, जो खाते तो भारत का हैं और गाते पाकिस्तान का हैं. ये वही लोग हैं जो माँ के नाम पर ग़जल लिखते हैं, लेकिन भारत माता के सामने सर झुकाने में अपनी तौहीन समझते हैं. ये वही लोग हैं जो बात तो अकीदत, इबादत और मुहब्बत की करते हैं, लेकिन काम अदावत, तिजारत और नफरत का करते हैं. नफरत इनकी किताबों में इतने मोटे हर्फों में लिखा है कि धरती पर हर वैसा आदमी जो सर पर गोल टोपी, चेहरे पर मूंछ रहित दाढ़ी, कंधे पर झूलता हुआ कुर्ता और कमर में टखने से ऊपर तक के पाजामा से अलग हटकर किसी धार्मिक बाने का अनुसरण करता है, वह काफिर हो जाता है और काफिरों की दुनिया को इस्लाम का चारागाह बनाने की राह पर खून बहाकर मरने वाले को जन्नतनशीं कहता है, आतंकी की मौत को शहादत कहता है. ये वही लोग हैं जो मौलाना साद जैसे इंसान के दुश्मन के बहकावे में कोरोना जैसी महामारी में पूरे देश को झोंकने में ज़रा भी शर्म महसूस नहीं करते.

नाम खोलकर कहूं तो मैं मुसलमानों में, जो भारतीय संस्कृति को स्वीकार करते हैं, अपनी धार्मिक आस्था में विश्वास रखते हुए अन्य धर्मों की इज्जत करते हैं, देश में अमन और भाईचारे के लिए काम करते हैं, विज्ञान और वैज्ञानिक तरक्की में यकीन रखते हैं, उनकी बात नहीं कर रहा. मैं बात कर रहा हूँ तबलीगी जमात की. उनकी एक कौम होती है, एक खिलाफत होती है, और खलीफा के कहने पर “काफिरों” की दुनिया पर कब्जा करने के अभियान में ये सारे देशों की सीमा को ध्वस्त कर देने में संकोच नहीं करते. सरजिल इमाम का नाम याद है न आपको, जो इस्लाम के नाम पर, मुसलमानों के हक़ में संविधान को गरियाते हुए पूर्वोत्तर भारत को शेष भारत से अलग करने की जहरीली विचारधारा का प्रचार कर रहा था. यही एक उदाहरण काफी है. यह साबित करने के लिए कि वह तभी तक देशभक्त रहता है, जब तक देश के बाकी सभी लोगों की कीमत पर उसे मुफ्त का माल मिलता रहे. और इसमें उसका सहयोगी बनता है धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा लगाए, प्रगतिशीलता का जामा पहने वामपंथी गिरोह. एक ओर मौलवियों, उलेमाओं के माफियातंत्र के नेतृत्व में देश को तोड़ने की बात करता है तो दूसरी ओर वामपंथी गिरोह के नेतृत्व में उसके गुर्गे ऐसे देशद्रोहियों के साथ मिलकर “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह” का नारा लगाते हैं. इन दोनों की समानता और साझा साजिशों को आज हर उस भारतीय को समझना होगा, जो अपनी मातृभूमि से प्यार करता है, जो मंगल पाण्डेय, भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, श्यामा प्रसाद मुख़र्जी आदि सपूतों की कुर्बानी को मौलवियों के माफियातंत्र की साजिशों से बचाना चाहता है.

कोरोना वायरस के प्रकोप के इस संकटकाल में जब देश को, सरकार को सहयोग देने की ज़रुरत थी, तब तबलीगी जमात के मुखिया मौलाना साद के इशारे पर हज़ारों तबलीगियों ने देश के कोने-कोने में कोरोना का संक्रमण फैलाने का काम किया. मस्जिदें खुदा की इबादत और इंसान से मुहब्बत के बदले इस साजिश का पनाहगाह बन गयीं. इलाहाबाद में प्रोफेसर तक ने गैरकानूनी ढंग से देश में घुसे विदेशी तबलीगियों को छिपाने का देशद्रोही, जन-विरोधी कुकर्म किया. इन तबलीगियों ने डॉक्टरों पर, नर्सों पर, पुलिस पर, जन सेवकों पर हमले किये, भारत विरोधी विदेशी ताकतों से मिलकर देश को अस्थिर करने का कुत्सित प्रयास किया. शाहीन बाग़ को खाली करने को तैयार नहीं हुए. भारत विरोधी ताकतों की एजेंट अरुंधती रॉय मुसलमानों को ललकारती रही कि नाम पूछे तो “रंगा-बिल्ला” बताना, घर पूछे तो “7, रेस कोर्स” बताना. लेकिन कोरोना के सवाल पर जब तबलीगियों की जांच का वक्त आया तो अरुंधती रॉय का कहीं पता नहीं था. इस बुद्धिजीवी को यह फर्ज याद नहीं आया कि वह इन सिरफिरे धार्मिक उन्मादियों से कहे कि वे अपना यात्रा वृत्तान्त प्रशासन को बताएं और अपनी जांच करायें. इन बुद्धिजीवियों को यह फर्ज याद नहीं आया कि शाहीन बाग़ से निठल्लों से कहते कि इस भीड़ से तुम खुद भी मारे जाओगे, एक तबलीगी घुस गया शाहीन बाग़ की भीड़ में तो कोई नहीं बचेगा, उठ जाओ “दादियों, फूफियों, खालाओं और पागल मर्दों, लड़कों, उठ जाओ!” यह कहना रास नहीं आया, सबसे मजे की बात तो यह रही कि 100 से अधिक दिनों तक सड़क पर बेमतलब कब्जा करवाने में हर रोज जाकर भाषण झाड़ने वाले वीर-बहादुरों में से एक भी माई का लाल इन निठल्लों के पक्ष में शाहीन बाग़ नहीं पहुंचा, उस वक्त जब पुलिस राष्ट्रहित और जनहित में इन सिरफिरों को सड़क से हटा रही थी. यह इनके दोगलेपन और क्रांतिकारी वीरता का असली चेहरा है.

अब बड़ा शोर किया जा रहा है, सरकार के साथ असहयोग करने, डॉक्टरों-नर्सों के साथ बदतमीजी और मारपीट करने के बावजूद सरकार के प्रयास और खर्चे तथा डॉक्टरों-नर्सों की दिन-रात की मेहनत से ठीक होने के बाद अब तबलीगी खून दान करेंगे, उनके प्लाज्मा से कोरोना-संक्रमित रोगियों का इलाज होगा. वही लोग, जो कल तक पूरे देश को कोरोना के दंश का शिकार बनाने के लिए इन तबलीगियों की खुराफातों का बचाव कर रहे थे, आज कहीं एक-दो तबलीगियों द्वारा खून दान करने की बात को इस प्रकार प्रचारित कर रहे हैं, मानो इन तबलीगियों के सिवाय इस देश में आज तक न किसी ने खून दान किया है और न अभी इनके सिवाय कोई और खून दान कर रहा है. ये ऐसा भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं जैसे कि ये तबलीगी ही हैं, जिनके कारण कोरोना वायरस से पीड़ित लोगों का इलाज हो पा रहा है.

संयोग देखिये. उधर साद की क्वारेंटाइन अवधि समाप्त होती है. उसका वकील उसकी ओर से बातें रखने की बात करता है. और इधर एकाध तबलीगी खून दान करने की बात करने लगते हैं. खून दान करना चाहते हैं, करें, कोई हर्ज नहीं है. लेकिन इनकी असली मंशा और मंसूबों को समझने की ज़रुरत है. यह अपने कुकर्मों पर पर्दा डालने और देश के लाखों लोगों के सामने संकट पैदा करने के जघन्य अपराध के सन्दर्भ में सहानुभूति बटोरने के सिवाय और कुछ नहीं है. किसी की ह्त्या करने के बाद उसके बच्चों को भोजन देने से ह्त्या का अपराध समाप्त नहीं हो जाता. इसलिए ज़रूरी है कि तबलीगी मरकज के जलसे में शामिल एक-एक तबलीगी की खोज की जाए, उसका इतिहास खंगाला जाए और कोरोना फैलाने के उनके अपराध के लिए हर हाल में उन्हें क़ानून के सामने पेश किया जाए.

(लेखक भारत विकास परिषद मुंबई प्रांत कार्यकारिणी के सदस्‍य हैं.)

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