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ईश्वरीय वाणी

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5 जून / राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के व्दितीय सरसंघचालक परम पूज्य श्री माधव सदाशिव राव गोलवलकर ‘श्री गुरू जी’ की पुण्य तिथि पर श्री सुदर्शन जी का संस्मरण

14 अगस्त 1972 को सौभाग्यवश श्री गुरुजी से एकान्त में वार्तालाप करने का सुअवसर मिला. मैंने उनसे कुछ जिज्ञासायें की थीं, जिनका स्पष्ट समाधान उन्होंने किया था. मैंने कहा – श्री लेलेजी ने श्री अरविन्द घोष को जब योग की दीक्षा दी थी, तब उन्हें बताया गया था कि वे

जब भाषण देने के लिये खड़े हों, तब अपने मस्तिष्क को सब प्रकार के विचारों से मुक्त कर दें. उसके बाद अंतःकरण में विचार उठें, उन्हें ही बोलना प्रारंभ कर दें. वही ईश्वरीय वाणी होगी.

श्री गुरुजी – मस्तिष्क को विचारों से शून्य कर लेने के पश्चात् जो कुछ शेष रहता है, वह परमात्मा ही है और इसीलिये उस अवस्था में जो विचार आयेंगे, वे उसकी ही प्रेरणा से होंगे.

मैं – कभी-कभी स्वयं मुझे ही ऐसा अनुभव में आया है कि जब बोलने के लिये खड़ा हुआ, तब मन में कुछ विषय ही नहीं सूझ रहा था. क्या बोला जाये यही समस्या थी. किन्तु अचानक तभी कोई ऐसा विचार मन में कौंध गया, जिसके बारे में पहले कभी सोचा भी नहीं था और वह विचार अपने मस्तिष्क की उपज है, ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता था. जब उस विचार की भाषण में अभिव्यक्ति हुई, तब सुनने वालों को भी बहुत अच्छा लगा, किन्तु स्वयं को यही लगता रहा कि यह विचार मेरा नहीं है. बाद में जब दूसरी बार उसी विचार को बोलने का प्रयत्न

किया तो मामला जमा नहीं.

श्री गुरुजी – इसीलिये कि दूसरी बार तुम सोचकर बोलने को खड़े हुये थे.

मैं-क्या श्री माँ योगिराज अरविन्द के पाण्डिचेरी पहुँचने के पूर्व वहाँ थीं?

श्री गुरुजी – नहीं, वे बाद में वहाँ गयी. जब प्रथम महायुद्ध प्रारंभ हुआ, तब वे कुछ समय के लिये वापस फ्रान्स चली गयीं थीं. फिर कुछ दिनों बाद वे भारत वापस आयीं. तब से अब तक वे वहीं पर हैं.

मैं – क्या श्री माँ को सिद्धि प्राप्त हो गयी है ?

श्री गुरुजी – हाँ, यदि महर्षि अरविंद पर विश्वास है तो उन्हें सिद्धि अवश्य प्राप्त है. महर्षि ने तो उनके बारे में बड़ी भावना प्रकट की है. अब श्री माँ की आयु 96 वर्ष की है. शरीर अत्यंत कृश हो गया है, किन्तु मुखमंडल पर अपूर्व तेज है. देख कर मन को बड़ी प्रसन्नता होती है. आश्रम की प्रत्येक गतिविधि पर उनका नियंत्रण है.

मैं – आपकी तो उनसे भेंट हुई थी?

श्री गुरुजी – हाँ, मैं उनसे मिलने गया था.

मैं – क्या बातचीत हुई?

श्री गुरुजी – प्रकट बातचीत कुछ नहीं हुई. मुझे ऐसा लगा कि बातचीत न करना

ही अधिक श्रेयस्कर होगा.

हम दोनों एक दूसरे की ओर देखते रहे. काफी देर तक देखते रहे.

मैं – आपको ऐसा क्यों लगा कि न बोलना ही कल्याणकारी है?

श्री गुरुजी – अंदर से ऐसा विचार अपने आप आया कि न बोलना ही अधिक ठीक रहेगा.

मैं – अधिक ठीक रहेगा इसका क्या अर्थ है?

श्री गुरुजी – अरे भाई, जब प्रत्यक्ष बातचीत होती है, तब अनेक व्यावहारिक बातें बीच में आ जाती हैं और ज्यादा बात नहीं हो पाती. वैसे हम दोनों ने काफी बातचीत कर ली.

मैं – ऐसा कहते हैं कि चलते समय उन्होंने आपको गुलाब का एक फूल दिया था?

श्री गुरुजी – हाँ, दिया था. एक लाल गुलाब का फूल था. वहाँ रखे फूलों में वह

अकेला ही वैसा फूल था.

मैं – क्या इसमें भी कोई संकेत है ?

श्री गुरुजी – होता है, ऐसा कहते हैं, पर मुझे नहीं मालूम.

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