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कृति का प्रदर्शन समय की मांग-राज राजेश्वराश्रम

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नव सृजन शिविर में पहले दिन प्रदर्शनी का उद्घाटन

हरिद्वार (विसंके). सनातन धर्म प्रदर्शन का निषेध किया गया है. इसका कारण है वह मान्यता जिसके अनुसार अपने आत्मकथ्य की बजाय ऐसा कृत्य करना है जो प्रेरणादायी हो. सनातन धर्म का जोर सदैव कृतित्व दर्शन के प्रस्तुतिकरण पर रहा है. लेकिन आज समय की मांग है कि अच्छे कार्य का प्रदर्शन भी किया जाए जिससे समाज प्रेरणा ले सके और आगे बढ़ सके. यह कहना है प्रख्यात धर्मगुरू और शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम जी का. श्री शंकराचार्य गुरूवार को पतंजलि योगपीठ फेज टू में 27 नवम्बर को राष्टीय स्वयंसेवक संघ के तीन दिवसीय नवसृजन शिविर की पूर्वसंध्या पर परिसर में आयोजित प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि संघ समाज के हित में निःस्वार्थ भाव से सतत काम करने वाला संगठन है. इसके स्वयंसेवक बिना किसी स्वार्थ के निरन्तर कार्य में विश्वास करते हैं. इनकी प्रवृत्ति रही है कि बिना प्रचार और प्रदर्शन के समाज हित में लगे रहना. पर आज इस बात की जरूरत है कि इस संगठन द्वारा किये जा रहे कार्यो से समाज को परिचित कराना जिससे समाज के लोग भी ऐसे कार्यो की ओर आकर्षित हो और आगे बढ़े. स्वामी जी ने तीन दिवसीय नवसृजन शिविर की सफलता की कामना की और आयोजकों को बधाई दी.

संघ के प्रान्त संघचालक चंद्रपाल सिंह नेगी ने स्वामी जी को स्मृति चिन्ह् भेंट कर उनका आभार जताया. जबकि धन्यवाद ज्ञापन शिविर के शिविराधिकारी बहादुर सिंह बिष्ट ने किया. इस अवसर पर संयुक्त क्षेत्र प्रचार प्रमुख कृपाशंकर, क्षेत्र प्रचार प्रमुख प्रान्त प्रचारक डा.हरीश, प्रान्तकार्यवाह लक्ष्मी प्रसाद जायसवाल आदि मौजूद थे.

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