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कैलाश और मानसरोवर जाना होगा अब आसान

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Kailash aur Mansarovar jana hoga ab aasaanनई दिल्ली. देश के करोड़ों शिव भक्तों के लिये बड़ी खुशखबरी है. शिव के चरणों तक अब उसकी पहुंच सीधी और आसान हो जायेगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा पर बेहद अहम समझौता हुआ है. सालों से इसकी मांग भारत करता आ रहा था. कई बार दोनों देशों की सरकारों के बीच इस मसले पर बातचीत हुई, लेकिन आखिरकार मोदी राज में ये सपना पूरा हुआ. अब कैलाश मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्रियों को नया रास्ता मिलेगा. चीन नये रास्ते के लिये तैयार हो गया है. अब भक्त सिक्किम के नाथुला दर्रे के आसान रास्ते से कैलाश मानसरोवर जा सकते हैं.

भारत और चीन के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक समझौतों के अलावा धार्मिक यात्रा पर भी सहमति बनी. लंबे समय से भारत मांग कर रहा है कि कैलाश मानसरोवर की धार्मिक यात्रा को आसान बनाने के लिये चीन तिब्बत के रास्ते भारतीय श्रद्धालुओं को कैलाश जाने दे. मई 2013 में चीन ने इस पर हामी भी भरी थी. अब प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात और बातचीत के बाद चीन अपने वादे पर अमल करने के लिये तैयार हो गया है.

इसके तहत अब भारतीय श्रद्धालु तिब्बत में नाथुला दर्रे के रास्ते कैलाश पर्वत जा सकेंगे. अब तक यात्री उत्तराखंड के रास्ते से जाते थे जो कि काफी मुश्किल है. इससे खासकर बूढ़े तीर्थयात्रियों को फायदा होगा. यही नहीं यह रास्ता खुलने से अब ज्यादा श्रद्धालु कैलाश मानसरोवर की यात्रा कर सकेंगे. अच्छी बात यह है कि बारिश के मौसम में भी यह रास्ता खुला रहेगा. इससे पहले जुलाई में ब्राजील के फोर्तलेजा में भी मोदी ने जिनपिंग से मुलाकात के दौरान यह मुद्दा उठाया था.

अभी कैलाश मानसरोवर का जो रास्ता है, वह उत्तराखंड और नेपाल होकर जाता है. इस मौजूदा रास्ते में श्रद्धालुओं को काफी दिक्कतें आती हैं. बूढ़े लोग तो जा ही नहीं सकते. पुराने रास्ते के लिये दिल्ली से आप उत्तराखंड के काठगोदाम पहुंचते हैं. फिर अल्मोड़ा होते हुए बागेश्वर, दिदिहाट, धारचुला होते हुए गुंजी तक जाते हैं. यहां से पैदल रास्ता शुरू हो जाता है जो श्रद्धालु पैदल और टट्टू से पूरा करते हैं. गुंजी से कालापानी के रास्ते नवीदांग पहुंचते हैं. फिर वहां से लिपुलेख पास होते हुए ताकलाकोट, ताकलाकोट से मानसरोवर. और फिर वहां से पारखा होते हुए दारचेन और फिर कैलाश पर्वत.

मौजूदा रास्ते में 19,500 फुट की चढ़ाई शामिल है. 22 से 27 दिन की यह यात्रा दुनिया की सबसे मुश्किल धार्मिक यात्रा मानी जाती है. इस यात्रा में हर साल 18 बैच में एक हजार से ज्यादा तीर्थयात्री शामिल होते हैं. यह यात्रा लिपू दर्रा, हिमालयन दर्रा और उत्तराखंड के कुमाऊं से होकर तिब्बत के टकलाकोट से गुजरती है.

पिछले साल जून में उत्तराखंड की बाढ़ में यह रास्ता बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था. अब चीन सिक्किम में नाथू ला दर्रे को खोल देता है तो इससे भारतीय तीर्थयात्री बसों और गाड़ियों से सीधे कैलाश और मानसरोवर जा सकेंगे. नया रास्ता बनने पर सिक्किम के नाथुला दर्रे से होते हुए आप चीन में आते हैं और फिर शानदार सड़क आपको सीधे पहुंचा देगी सागा होते हुए दारचेन तक. यानी मानसरोवर और कैलाश पर्वत जहां पहुंचने में पहले आपको नाको चने चबाने पड़ते थे. करीब एक महीने की यात्रा होती थी. वह महज हफ्ते भर में खत्म हो जायेगी. पैदल चढ़ाई से भी आप बच जायेंगे.

मानसरोवर को शिव का धाम माना जाता है और पौराणिक कथाओं के अनुसार मानसरोवर के पास मौजूद कैलाश पर्वत पर शिव-शंभु का धाम है. यही वह पावन जगह है, जहां शिव-शंभु विराजते हैं. कैलाश पर्वत 22,028 फीट ऊंचा एक पत्थर का पिरामिड है जिस पर सालभर बर्फ की सफेद चादर लिपटी रहती है. यह तिब्बती, बौद्ध, जैन और हिन्दुओं का आध्यात्मिक केंद्र है. कैलाश पर्वत की चारों दिशाओं से चार नदियां ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलुज और करनाली निकलती हैं.

मान्यता है कि कैलाश पर्वत मेरु पर्वत है जो ब्रह्माण्ड की धुरी है. मानसरोवर पहाड़ों से घिरी झील है जो पुराणों में ‘क्षीर सागर’ के नाम से वर्णित है. हिंदू आस्था के मुताबिक क्षीर सागर में शेष शय्या पर विष्णु और लक्ष्मी विराजित हो कर पूरे संसार को संचालित कर रहे हैं. यह पर्वत स्वयंभू है. कैलाश-मानसरोवर उतना ही प्राचीन है, जितनी प्राचीन हमारी सृष्टि है.

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