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कैसे कुछ कहें घटना सेक्युलर जो ठहरी…!

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शिव पंचकरन

धर्मशाला

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के पास पालघर में 16 अप्रैल को ऐसी घटना घटी जिसने सबको झकझोर कर रख दिया. महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं सहित तीन लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. पालघर के कासा पुलिस स्टेशन के गडचिंचले गाँव में लोगों ने साधुओं और उनके साथ ड्राईवर को बुरी तरह पीटा और सबसे हैरान करने बाली बात यह थी की पुलिस मूकदर्शक बन कर तमाशा देखती रही.

महाराष्ट्र में 2 साधुओं की मॉब लिंचिंग से पूरा देश गुस्से में है. साधू सन्यासियों के साथ ऐसी बर्बरता देख कर आज डर लग रहा है. किन्तु हमारे डर के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि हम जाएं तो जाएं कहां?

हमारे पास ना तो लिबरल्स की तरह पाकिस्तान जैसा कोई देश है जो हमारे लिए ट्वीट करे, ना ही हमारे पास कोई बड़ा बंगला है, जहाँ पर डर के एहसास का दीदार हो और देश से जाने का मन करे, न ही हम विशेष धर्म से हैं जो हम पर 4-5 दिन प्राइम टाइम चलाया जाये, न हम किसी पार्टी विशेष का वोट बैंक हैं और न ही हमारे लिए कोई अवार्ड वापसी गैंग सक्रिय होगी जो अवार्ड लौटाएगी. हमारे लिए सहारा हम ही हैं और न्याय के लिए लड़ना भी हमें स्वयं ही पड़ेगा.

इस दिल देहला देने वाली घटना के बाद जब सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूटने लगा, तो महाराष्ट्र पुलिस ने 110 लोगों को गिरफ्तार किया और 2 पुलिस वालों को सस्पेंड कर दिया गया. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने घटना को लेकर उच्च स्तरीय जांच की मांग की. कुमार विश्वाश ने भी घटना की कड़ी निंदा की.

संतों की नृशंस हत्या पर कोई ट्वीट नहीं है

सोशल साइट्स पर लगातार आ रही प्रतिक्रिया से ये समझा जा सकता है कि लोगों के मन में अपार गुस्सा है, परन्तु हर मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखने बाले हमारे तथाकथित लाल झंडे बाले सेक्युलर और पढ़े लिखे अनपढ़ सेक्युलर लोगों की जमात कहीं नहीं दिख रही है. शायद ये घटना उनके मन को उस प्रकार विचलित नहीं कर पायी, जिस प्रकार बबिता फोगाट के ट्वीट से उनके दिल को आघात लगा था. कहाँ ट्वीट करना है, कहाँ रोना है, कहाँ हल्ला मचाना है? ये सब इनके द्वारा व्यक्ति का धर्म देख कर तय किया जाता है. कुछ दिन पहले सारी मायानगरी उद्धव ठाकरे को दुनिया का सबसे बेहतरीन सीएम बताती फिर रही थी, लेकिन इस घटना पर सबने एक साथ चुप्पी साध ली है.

इस सारे मामले में सबसे बड़ा प्रश्नचिंह पुलिस की हरकत पर लग रहा है. सबको बचाने बाली पुलिस आखिर क्यों और किस कारण वहां मूक दर्शक बन कर खड़ी रही? जिस किसी ने भी साधुओं का वह वायरल वीडियो देखा उसके मन से वह रोंगटे खड़े करने वाला दृश्य शायद ही जा पाए. 70 साल के साधु कल्पवृक्षगिरी महाराज जिस प्रकार पुलिस वाले का हाथ पकड़ कर अंत समय तक खाकी का भरोसा करते रहे, उस दीन दृश्य को देख किसी का भी ह्रदय व्यथित हो जाएगा.

इस घटना के बीच दूसरा सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि लॉकडाउन के समय में इस प्रकार इतनी भीड़ एक जगह कैसे इकट्ठी हुई? चोरी की अफवाह फैलाई भी गयी तो इतनी भीड़ घरों से बहर कैसे निकल आई? पुलिस क्यों भीड़ का साथ दे रही थी? ऐसे कई प्रश्न हैं, जिस कारण इस घटना से साजिश की बू आ रही है.

जहां ये घटना हुई, ये आदिवासी क्षेत्र वैसे भी वामपंथी और इसाई मिशनरियों का इलाका है. सीपीएम के विनोद निकोले इसी इलाके से विधायक हैं.

रात दिन चिल्ला चिल्ला कर धर्म बताने वाले बड़े बड़े मीडिया हाउस इस घटना को एक सामान्य घटना की तरह बताने में लगे है. इतने दिन तक ख़ामोशी पसरने का ये पहला मौका नहीं है, जब धर्म देख कर प्रतिक्रिया दी गयी हो. चोरी करते हुए तबरेज़ अंसारी पर पूरा भारत शर्मिंदा हो जाता है, सयुंक्त राष्ट्र तक बात पहुंचा दी जाती है. इतने ट्वीट किये जाते हैं कि जैसे भारत में समुदाय विशेष के लोग सुरक्षित नहीं हैं. पर, जब कोई भरत यादव या अंकित शर्मा को उसी प्रकार विशेष धर्म के लोगों की भीड़ द्वारा मारा जाता है तो खबर भी नहीं बन पाती.

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई, सागरिका घोष, अरफा, स्वरा, आदि…आदि….आदि….अनेक नाम हैं, इनके ट्विटर हैंडल देख लें, एक भी ट्वीट मिल जाए तो और तबरेज की मौत पर कैसे हल्ला मचाया था.

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