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कोरोना के कहर में रामभरोसे दिल्ली

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सूर्य प्रकाश सेमवाल

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देश की राजधानी दिल्ली कोरोना संक्रमितों के मामले में महाराष्ट्र और तमिलनाडु के बाद तीसरे पायदान पर है. यहाँ स्थिति भयावह है, संक्रमितों की संख्या 29,000 के करीब पहुँच चुकी है तो मृतकों का सरकारी आंकड़ा (जिस पर सवाल उठ रहे हैं) भी 800 पार कर चुका है… मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल तो दूर उनका कोई मंत्री या विधायक तक कोरोना संकट के इन 2 महीनों में कहीं नजर नहींआया. हां, ये जरूर है कि सीएम केजरीवाल हर दिन वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से सभी खबरिया चैनलों पर बहुत एक्टिव दिखने की कोशिश में लगे रहे, जहाँ वैसे नहीं आ पाए वहां बड़े-बड़े विज्ञापनों में लाखों करोड़ों रुपये देकर दिल्ली की जनता को ये सन्देश दे रहे हैं कि – कोरोना हो कोई बात नहीं, अस्पताल मत आइये घर पर रहकर ही बचाव करें

यह राय वास्तविक सच है क्योंकि केजरीवाल सरकार के मोहल्ला क्लीनिक और मुफ्त इलाज के दावे तो कोरोना के प्राथमिक स्टेज पर ही ध्वस्त हो गए थे. लॉकडाउन के समय में अन्य राज्यों ने जैसे उपाय किये वो दिल्ली में कहीं दिखे ही नहीं… ऐसे में हर दिन नया शिगूफा छोड़ना ही उपाय था, अपनी नाकामी को छिपाने का, सो आरोप, पैंतरेबाजी और हवाई आदेश सब कुछ जारी है.

01 जून को देशभर में अनलॉक शुरू हुआ तो केजरीवाल ने दिल्ली की सारी सीमाएं सील करने के आदेश दे डाले, बकौल मुख्यमंत्री दिल्ली में इलाज मुफ़्त है, इस कारण से दिल्ली की सीमाएं खुलेंगी तो देशभर से लोग यहाँ आएंगे. ऐसे में 9,000 से अधिक बेड जो दिल्ली वालों के लिए रखे गए हैं वो जल्द भर जाएंगे. इस निर्णय पर हंसी उड़ ही रही थी कि दिल्ली कैबिनेट की बैठक में अपना मनमाना निर्णय लेना था तो डॉ. वर्मा समिति की संस्तुति और लाखों दिल्लीवासियों की राय की आड़ लेकर दिल्ली सरकार के सरकारी व निजी अस्पतालों में दिल्ली वालों के सिवा बाहरी लोगों के इलाज पर रोक का अटपटा आदेश जारी कर दिया.

दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने दिल्ली के अस्पताल में केवल राजधानी के लोगों के इलाज को लेकर केजरीवाल सरकार के फैसले को पलटकर यह आदेश जारी किया कि अब कोई भी व्यक्ति दिल्ली के अस्पतालों में इलाज करा सकता है. टेस्टिंग से जुड़े केजरीवाल सरकार के दूसरे आदेश के निरस्त होने से अब कोरोना के संदिग्ध मरीज भी 5 से 10 दिन के भीतर कोरोना टेस्ट करा सकते हैं.

इस पर केजरीवाल ने ट्वीट कर कहा, – LG साहब के आदेश ने दिल्ली के लोगों के लिए बहुत बड़ी समस्या और चुनौती पैदा कर दी है. देशभर से आने वाले लोगों के लिए कोरोना महामारी के दौरान इलाज का इंतज़ाम करना बड़ी चुनौती है. शायद भगवान की मर्ज़ी है कि हम पूरे देश के लोगों की सेवा करें. हम सबके इलाज का इंतज़ाम करने की कोशिश करेंगे.

07 जून को मुख्यमंत्री अपने निवास में बुखार और गले में दर्द की आशंका के बाद घर में क्वारेंटाइन हो गए, उनका कोरोना टेस्ट हुआ जिसकी रिपोर्ट नेगेटिव आई है.

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दिल्ली वाले स्वयं को दिल्ली दंगों के समय से ही ठगा महसूस कर रहे थे. कोरोना ने रही सही कसर पूरी कर दी. दिल्ली के संकटग्रस्त गरीब लोगों की पीड़ा और प्रवासी कामगारों की बदहाल स्थिति को आप सरकार ने मीडिया मैनेजमेंट द्वारा साधने की कोशिश की. लेकिन हकीकत दिल्ली की जनता को लॉकडाउन के दूसरे-तीसरे दिन लाखों प्रवासी कामगारों को उकसाकर, भ्रम फैलाकर, भय दिखाकर डीटीसी की बसों में उत्तरप्रदेश की सीमा पर छोड़ने और सारा ठीकरा यूपी की योगी सरकार पर फोड़ने से पता लग गयी थी.

325 स्कूलों में दोपहर और रात्रि का भोजन मुहैया कराने के इंतजाम का दावा. इन सभी स्कूलों में लगभग 500 लोगों को और कुल मिलाकर चार लाख लोगों को दोपहर और रात का भोजन मुहैया कराने की बात…224 रैन बसेरों में भी गरीब और बेघर लोगों को दोपहर और रात का भोजन देने की घोषणा. दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमओ) के माध्यम से 2,000 लोगों के भोजन की व्यवस्था, प्रत्येक जिला मजिस्ट्रेट को करने के आदेश के दावे.. कहा गया कि दिल्ली में 15 लाख लोगों ने राशन कार्ड के लिए आवेदन दिये हैं और दिल्ली सरकार प्रतिदिन 10 लाख लोगों को भोजन उपलब्ध करा रही है….ये आंकड़े भी कोरोना की मौत के छिपाए आंकड़ों का ही खेल बताते हैं. जब असलियत दिखी तो यहाँ वहां बड़े सरकारी अस्पतालों पर सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन के मार्फ़त आरोप लगवा दिए, किसी को धमका दिया, कहीं एफआईआर करवा दी.

केजरीवाल सरकार केंद्र सरकार की योजनाओं की आर्थिक सहायता और खाद्यान्न को भी नहीं बाँट पाई. जिस कारण दिल्ली उच्च न्यालय ने कड़ी लताड़ लगाई थी.

दिल्ली उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को करीब पांच लाख मजदूरों के पंजीकरण को नवीनीकृत करने के निर्देश दिए. ताकि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज या गरीब कल्याण अन्न या फिर ऐसी ही कोई और स्कीम के तहत दिल्ली में रह रहे उन लोगों तक दाल पहुंचाई जाए, जिन्हें फायदा दिलाने के लिए स्कीम शुरू हुई है.

असल में राजनीति के चतुर नहीं, परन्तु शातिर खिलाड़ी हैं. वे बिना कुछ ठोस प्रयास किये कोरोना संकट में मीडिया के माध्यम से केवल अपनी छवि को चमकाने में लगे रहे. अपनी ज़िम्मेदारी को भूलकर केंद्र सरकार के विरुद्ध दुष्प्रचार का मोर्चा खोले रखना चाहते हैं. उन्हें लगता है, जनता को यूँ ही बरगला देंगे, लेकिन कब तक……

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