कोरोना के खिलाफ जंग – संवेदनशीलता : भारतीय समाज की विशेषता Reviewed by Momizat on . नीतू वर्मा नई दिल्ली. भारतवर्ष विविधताओं का देश होने के साथ- साथ अनेकानेक ऐसी विशेषताओं से सम्पन्न देश है, जहां विपत्ति के समय में लोग जाति, धर्म, पंथ, समुदाय इ नीतू वर्मा नई दिल्ली. भारतवर्ष विविधताओं का देश होने के साथ- साथ अनेकानेक ऐसी विशेषताओं से सम्पन्न देश है, जहां विपत्ति के समय में लोग जाति, धर्म, पंथ, समुदाय इ Rating: 0
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    कोरोना के खिलाफ जंग – संवेदनशीलता : भारतीय समाज की विशेषता

    नीतू वर्मा

    नई दिल्ली. भारतवर्ष विविधताओं का देश होने के साथ- साथ अनेकानेक ऐसी विशेषताओं से सम्पन्न देश है, जहां विपत्ति के समय में लोग जाति, धर्म, पंथ, समुदाय इत्यादि के संकीर्ण बाड़ों से ऊपर उठकर एक ऐसे आचरण तथा संवेदनशीलता का उदाहरण  प्रस्तुत करते हैं जो विश्व के किसी अन्य देश में देखने को नहीं मिलता. इसका जीवंत प्रमाण वर्तमान में भारत के समक्ष उत्पन्न वैश्विक कोरोना प्रकोप की स्थिति में देखने को मिल रहा है.

    प्रधानमंत्री द्वारा कोरोना संक्रमण के विरुद्ध अभियान को सफल बनाने के उद्देश्य से लॉकडाउन की घोषणा की गयी, उसे भारत जैसे विशाल देश में एक साथ लागू करना निश्चित ही एक बड़ी चुनौती थी. कोरोना महामारी से बचाव के एकमात्र उपाय 21 दिवसीय लॉकडाउन के फलस्वरूप देश की एक बड़ी जनसंख्या जो अपने घरों से दूर शहरों तथा विभिन्न प्रान्तों में परिश्रम से अपनी रोज़ी रोटी का वहन कर रही थी, उसके समक्ष कोरोना वायरस से प्राण बचाने के साथ ही अस्तित्व को बचाए रखने के लिए मूलभूत सुविधाओं का संकट आ खड़ा हुआ. लेकिन इस संकटकाल में देश की विभिन्न सामाजिक संस्थाओं, धार्मिक सगठनों तथा जिम्मेदार नागरिकों ने आगे आकर प्रशासन का सहयोग किया. औऱ यह संभव हुआ भारतीय समाज की संवेदनशीलता व हमारी संस्कृति में प्रवाहित निःस्वार्थ सेवा भावना के कारण.

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ ही आपदा के समय देश के अन्य अनेकों धार्मिक, सामाजिक, व्यापारिक संगठन तथा निजी संस्थाएं, व्यक्ति भी यथाशक्ति जरूरतमंद गरीब परिवारों की सहायता कर रहे हैं. सिक्ख संस्थाओं द्वारा गुरुद्वारों में लगाए जा रहे लंगर, कम्युनिटी किचन, व अन्य अनेक उदाहरण भारतीय समाज में विद्यमान संवेदनशीलता का परिचायक हैं.

    अनेक ऐसे उदाहरण हैं, जिसमें लोगों ने अपनी क्षमता से अधिक, जाति-धर्म से ऊपर उठकर जरूरतमंदों की मदद के लिए हाथ बढ़ाया है. जम्मू-कश्मीर की 87 वर्षीय ख़ालिदा बेगम ने हज के लिए राशि जमा की थी, लेकिन विकट परिस्थिति में जरूरतमंदों की सेवा के लिए पांच लाख रुपए की राशि दान कर दी. खालिदा बेगम ने सेवा भारती के कार्यों से प्रभावित होकर यह राशि उन्हें दान दी.

    उत्तर प्रदेश के लालगंज के शिक्षक एवं समाजसेवी डॉ. राकेश सिंह ने 6 लाख रुपए की राशि प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री राहत कोष में दान दी. ऐसे सैकड़ों उदाहरण देश के हर हिस्से में हैं. एक अन्य उदाहरण हिमाचल प्रदेश का है, यहां भोरंज क्षेत्र में मास्क की कमी हुई तो विधायक कमलेश कुमारी ने स्वयं मशीन लेकर मास्क बनाना शुरू कर दिया. तमिलनाडु के Thiyagadurgam में रहने वाले प्रकाश दर्जी का काम करते हैं, क्षेत्र में मास्क की कमी हुई तो अपने खर्च पर 500 मास्क बनाकर प्रतिदिन जरूरतमंदों को वितरित कर रहे हैं.

    गुजरात के अहमदाबाद तथा उत्तराखंड के हरिद्वार में किन्नर समाज भी स्वयं प्रेरणा से जरूरतमंदों की सेवा में जुटा है. सेवा बस्तियों में रहने वाले जरूरतमंद परिवारों को राशन वितरित किया जा रहा है. हिमाचल, राजस्थान, महाराष्ट्र में विभिन्न स्थानों पर सामाजिक संस्थाओं के आह्वान पर आयोजित रक्तदान अभियान में लोग स्वतः भाग ले रहे हैं.

    पूरे देश में लॉकडाउन घोषित होने के पश्चात गुरुग्राम के एक आवासीय परिसर के लोगों द्वारा शुरू की गई जनता रसोई आज तीन हजार से अधिक लोगों को भोजन उपलब्ध करवा रही है.

    इसी प्रकार तमिलनाडु के Kolathur के रहने वाले छात्र प्रेम ने आइसोलेशन में रखे गए कोरोना रोगियों व उनका उपचार कर रहे चिकित्सकों की सहायता के लिए रोबोट तैयार किया है. मोबाइल एप से संचालित यह रोबोट मरीज का बुखार चैक कर सकता है, उसे सेनेटाइज़र, भोजन व दवाइयां दे सकता है. यहां तक कि चिकित्सक रोगी के साथ वीडियो कॉल पर बात भी कर सकते हैं, यह रोबोट कोरोना संक्रमण की चेन को तोड़ने में उपयोगी होगा.

    यह पहली बार नहीं है कि समाज सहयोगी के रूप में खड़ा है, बल्कि हर बार जब-जब भी संकट आता है भारतीय समाज का यही स्वभाव रहता है. यह समाज में व्याप्त सेवा के संस्कार ही हैं कि कोटा की 4 बच्चियों न कानपुर की सात साल की बच्ची ने अपनी गुल्लक तोड़कर जमा राशि जरूरतमंदों की सहायता के लिए दान कर दी.

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