क्या बला है – अनुच्छेद 35A? जिसकी चर्चा होते ही एक विशेष वर्ग भारत विरोधी राग शुरू कर देता है…??? Reviewed by Momizat on . जम्मू कश्मीर और अनुच्छेद 35A आज कल सुर्ख़ियों में हैं. दरसअल, सुरक्षाबलों की 100 अतिरिक्त कंपनी भेजने की घोषणा की गई है. 100 कंपनियों के तहत 10,000 अतिरिक्त सुर जम्मू कश्मीर और अनुच्छेद 35A आज कल सुर्ख़ियों में हैं. दरसअल, सुरक्षाबलों की 100 अतिरिक्त कंपनी भेजने की घोषणा की गई है. 100 कंपनियों के तहत 10,000 अतिरिक्त सुर Rating: 0
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    क्या बला है – अनुच्छेद 35A? जिसकी चर्चा होते ही एक विशेष वर्ग भारत विरोधी राग शुरू कर देता है…???

    जम्मू कश्मीर और अनुच्छेद 35A आज कल सुर्ख़ियों में हैं. दरसअल, सुरक्षाबलों की 100 अतिरिक्त कंपनी भेजने की घोषणा की गई है. 100 कंपनियों के तहत 10,000 अतिरिक्त सुरक्षा बल जवानों की राज्य में तैनाती की जाएगी. इस फैसले के बाद से ही देश में जम्मू-कश्मीर बहस का मुद्दा बना हुआ है.

    राज्य के नेताओं के साथ ही देशभर के नेताओं ने फैसले पर टिप्पणी की. इस फैसले को आगामी समय में राज्य में लिए जाने वाले कुछ फैसलों से जोड़कर देखा जा रहा है. सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया में अनुच्छेद 35A को हटाने की संभावनाओं पर विमर्श शुरू हो गया.

    इन सब के बीच जम्मू-कश्मीर राज्य के नेताओं के बयान में तिलमिलाहट नज़र आ रही है. एक तरफ जहां पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि “35A से छेड़छाड़ बारूद को हाथ लगाने के बराबर है” वहीं दशकों से राज्य में शासन कर रहे अब्दुल्ला परिवार के नेता उमर अब्दुल्ला ने कहा कि “35A में किसी भी तरह का छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए.”

    आखिर ऐसा क्या है अनुच्छेद 35A में, जिसकी वजह से वहां की राजनीतिक पार्टियां देशविरोधी बातें करने से भी नहीं हिचकिचातीं? इससे पहले भी 35A के मुद्दे पर महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि यदि इसमें बदलाव होता है तो कश्मीर में कोई तिरंगे को कंधा देने वाला नहीं होगा. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुख अब्दुल्ला ने तो एक कदम आगे बढ़ते हुए बड़े विद्रोह और हंगामे की धमकी तक दे डाली थी.

    35A क्या बला है? जिसका नाम लेते ही कथित देशविरोधी तत्वों में छटपटाहट शुरू हो जाती है? आखिर 35A है क्या? 35A एक ऐसा जहर है, जिसने जम्मू कश्मीर को नर्क बना रखा है.

    क्या है अनुच्छेद 35A?

    अनुच्छेद 35A जम्मू कश्मीर की विधानसभा को ‘स्थायी निवासी’ स्पष्ट करने का अधिकार देता है. चाहे 370 हो या 35A, इसमें जम्मू कश्मीर की नागरिकता का अधिकार जैसे नियम नहीं है क्योंकि हमारे देश में दोहरी नागरिकता जैसी कोई व्यवस्था नहीं है. जम्मू कश्मीर में केवल ‘स्थायी निवासी पात्रता’ (PRC) दी जाती है और उसका कारण है अनुच्छेद 35A.

    भारतीय संविधान के अनुसार देश का कोई भी नागरिक किसी भी जगह जमीन खरीद सकता है, व्यापार कर सकता है, निवेश कर सकता है. लेकिन जम्मू कश्मीर में 35A की वजह से दूसरे राज्यों के नागरिकों के अलावा जम्मू कश्मीर का एक बड़ा तबका भी इस अधिकार से वंचित है. यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19, 19(e), और 21 का हनन है.

    इसके आलावा स्थायी निवासी पात्रता नहीं होने की दशा में सरकारी योजना द्वारा चलित प्रोफेशनल कोर्सेस में भी हिस्सा नहीं लिया जा सकता. जम्मू कश्मीर से बाहर के व्यक्तियों के साथ-साथ 1947 के वक़्त भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर (POJK) से आकर बसे व्यक्तियों को भी मूल अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है.

    जिस तरह इस असंवैधानिक कृत्य का दुरुपयोग किया गया है, परिणाम स्वरूप यह एक ही देश के नागरिकों को आपस में बांट रहा है. अनुच्छेद 35A के कार्यान्वयन के फलस्वरूप राज्य के लाखों लोग राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से पक्षपात के शिकार हो रहे हैं, साथ ही उन्हें किसी भी तरह बराबरी का मौका नहीं मिल पा रहा है.

    कैसे असंवैधानिक है अनुच्छेद 35A?

    14 मई 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के आदेश से 35A को संविधान में जोड़ा गया था.

    संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए उसे संसदीय प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है, किन्तु 35A को बिना संसद में पेश किये संविधान में जोड़ा गया था.

    तत्कालीन राष्ट्रपति ने 35A को सारे संवैधानिक नियमों को दरकिनार करते हुए गैर संवैधानिक तरीके से संविधान में जोड़ा था.

    संविधान के नियम के अनुसार राष्ट्रपति आदेश को भी 6 माह के भीतर संसद में पेश करना अनिवार्य है, अन्यथा वह आदेश रद्द हो जाता है, किन्तु 35A आज 65 साल के बाद भी जम्मू कश्मीर में गैर संवैधानिक तरीके से लागू है. बिना संसद में पेश किये और संसद के अधिकार को छीनते हुए किसी अनुच्छेद को संविधान में जोड़ना स्पष्ट रूप से संवैधानिक अधिकारों का हनन है, साथ ही संविधान की अवमानना भी है.

    अनुच्छेद 35A के दुष्प्रभाव

    आज किसी राज्य का निवासी यदि मध्यप्रदेश, गुजरात, बिहार, बंगाल, उत्तरप्रदेश या दक्षिण के किसी राज्य में जाकर बसना या व्यापार करना चाहता है या निवेश करना चाहता है तो आसानी से कर सकता है, किन्तु जम्मू कश्मीर में नहीं.

    जम्मू कश्मीर के बाहर के व्यक्ति ही नहीं, बल्कि जम्मू कश्मीर का एक बड़ा तबका भी 35A की वजह से पीड़ित है. जम्मू कश्मीर की महिलाएं किसी ‘स्थायी निवासी पात्रता’ नहीं रखने वाले (Non PRC) से शादी कर लें तो उसके पति और बच्चों को पीआरसी नहीं मिलती, जिससे वो अपने संवैधानिक अधिकारों से पूरी तरह वंचित रहते हैं. पति के छोड़ने, मृत्यु, तलाक या अकस्मात कारणों की वजह से वापस लौटी महिला के बच्चों को राज्य के सभी सरकारी सुविधाएं (शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य) प्राप्त नहीं होती.

    विभाजन के समय पश्चिमी पाकिस्तान से आये लाखों लोग आज भी शरणार्थी की ज़िन्दगी जीने को मजबूर है. वाल्मीकि समुदाय जिसने जम्मू कश्मीर को आज भी साफ़ सुथरा रखा है, 35A की वजह से आज भी स्थायी निवासी पात्रता से वंचित है. राज्य के लिये जान देने वाला वीर देशभक्त गोरखा समुदाय भी 35A की वजह से दोयम दर्जे की जिंदगी जीने को मजबूर है.

    अब तक चर्चा का विषय क्यों नहीं बन पाया था अनुच्छेद 35A?

    अनुच्छेद 35A का मुद्दा हाल ही में सुर्ख़ियों में आया है. लेकिन सोचने वाली बात यह है कि जब यह इतना ही गंभीर मुद्दा है तो देश के आम लोगों की बातों से नदारद कैसे था? बुद्धिजीवियों और संविधान विशेषज्ञों की चर्चाओं में शामिल क्यों नहीं था?

    वास्तव में अनुच्छेद 35A जैसा विवादास्पद नियम सुभाष कश्यप और डी.डी. बसु जैसे देश के बड़े संविधान विशेषज्ञों की किताबों में भी नहीं मिलता. 35A एक संवैधानिक धोखे की तरह है, जिसे देश की आम जनता को दिया गया है.

    संविधान की किताब में 35A अनुच्छेद 35 और 36 के मध्य आपको खोजने से भी नहीं मिलेगा. इस संवैधानिक धोखे को इस तरह समझ सकते हैं कि कुछ वर्षों पहले अनुच्छेद 21 से जोड़कर अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) लाया गया था, जिसे संविधान में अनुच्छेद 21 एवं 22 के मध्य रखा गया है. किन्तु 35A को अनुच्छेद 35 एवं 36 के मध्य ना रखकर परिशिष्ट क्रमांक 2 में रखा गया है ताकि आम जन की पहुंच से यह दूर रहे तथा बुद्धिजीवियों की चर्चा का विषय ना बन सके.

    कुछ समय पहले राज्यसभा के पूर्व सांसद और वरिष्ठ वकील सत्यपाल जैन ने अपना अनुभव लोगों को बताया था कि जब उन्होंने हाइकोर्ट के अपने वकील दोस्तों से 35A के विषय पर चर्चा करनी चाही तो वो हैरान रह गए कि कानून और संविधान की जानकारी रखने वाले बड़े-बड़े वकील धारा 370 के बारे में तो जानते हैं, लेकिन 35A के बारे में पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं.

    यह माना जा सकता है कि सभी को सभी संवैधानिक धाराएं और क़ानून की जानकारी नहीं हो सकती. लेकिन ऐसे मुद्दे, जिससे राष्ट्र प्रभावित होता है और जो गंभीर हो उसकी जानकारी नहीं होना विचारणीय है. आज जम्मू कश्मीर में सभी वर्गों को समान अधिकार दिलाने से लेकर आपस में समानता लाने के लिए गैरसंवैधानिक तरीके से लागू 35A को हटाना आवश्यक है।

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