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चंद्रकांत जी की हत्या राजनीतिक नहीं, हिंदुओं में डर पैदा करने की योजना की कड़ी है

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09 अप्रैल, 2019 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जम्मू कश्मीर के प्रांत सह सेवा प्रमुख चंद्रकांत शर्मा की हत्या किश्तवाड़ में हिंदुओं के बीच दहशत पैदा करने की ताजा कड़ी भर है. यह उन क्षेत्रों में आता है, जहां से पाकिस्तान हिंदुओं को भगाना चाहता है. यह आतंकवाद की कोई अलग-थलग घटना नहीं है जैसी कि मारे गए व्यक्ति की राजनीतिक विचारधारा के कारण लग सकती है. यह क्षेत्र में पहले हुई हत्याओं और किश्तवाड़ में परिहार बंधुओं जैसे अल्पसंख्यक हिंदुओं को चुन-चुन कर मारे जाने से जुड़ी हुई है.

चंद्रकांत शर्मा और उनके निजी सुरक्षा अधिकारी की किश्तवाड़ में हुई हत्या स्थानीय आतंकियों को रणनीतिक सम्पत्तियों के रूप में इस्तेमाल करने की सुविचारित नीति और पाकिस्तान द्वारा संरक्षित आतंकवादी तंत्र के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने की योजना के अनुरूप है.

आतंकवादियों ने 2000-2001 में किश्तवाड़ में हिंदू डोगरों के जातीय और धार्मिक सफाये की योजना बनाई थी. एक महीने से भी कम समय में, उन्होंने तीन नरसंहारों को अंजाम दिया – एक तागुड में (05 लोगों की हत्या), दूसरा पटियामहल में (8 की हत्या) और तीसरा गुलाबगढ़ में- (13 मौतें).

इन नरसंहारों के परिणामस्वरूप हिंदुओं ने पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश की ओर सामूहिक पलायन करना शुरू कर दिया था. उसी समय चंद्रकांत ने ब्रिगेडियर जीडी बख्शी के नेतृत्व में वहां तैनात सेना के साथ मिलकर काम करना शुरू किया था. उन्होंने सेना को उन सामूहिक हत्याओं को अंजाम देने वाले लश्कर समूह की पहचान कर उसे मार गिराने में मदद की थी.

चंद्रकांत ने हिमाचल भाग गए हिंदुओं की वापसी कराने में भी सेना की मदद की थी. ऐसा न हुआ होता तो किश्तवाड़ के डोगरों का भी वही हाल होता जो कश्मीरी पंडितों का कश्मीर में हुआ था. ठोस प्रयासों और नागरिक-सैन्य समन्वय के कारण हिंदुओं की हत्याओं का दौर रुक गया और जो लोग भाग गए थे, वे वापस आ गए.

सेना ने उस दौर में स्थानीय ग्राम रक्षा समितियों के साथ मिल कर जो कुछ भी किया था, उसे बाद के वर्षों में उलटने के प्रयास होने लगे थे. ऐसी स्थिति के पीछे मूल कारण कुछ लोगों द्वारा आतंकवादियों के प्रति नरमी दिखाने का प्रयास करना था.

चंद्रकांत बहुत साहसी थे और उन्होंने आतंकवादियों तथा उन्हें फलने-फूलने का मौका देने वाले पारिस्थितिक तंत्र के खिलाफ अथक लड़ाई लड़ी थी. वह निःसंदेह नायक थे, उनका बलिदान बेकार नहीं जाना चाहिए. किश्तवाड़ क्षेत्र में तैनात बलों को उन लोगों को ढूंढ निकालने और मार गिराने की कोशिश करनी चाहिए, जिन्होंने ऐसा किया है. किश्तवाड़ में 09 अगस्त 2013 को ईद के दिन एक सांप्रदायिक संघर्ष हुआ था. आतंकवाद का मुकाबला करने में सेना के साथ काम करने वाले एक अन्य नेता सुनील शर्मा के निजी सुरक्षाकर्मी को उस दिन निशाना बनाया गया था. बार-बार हो रहे ऐसे प्रयास स्पष्टतः क्षेत्र के हिंदुओं को अपना घर-बार छोड़ने के लिए मजबूर करने के इरादे से किए जा रहे हैं.

संत राम शर्मा

साभार – पाञ्चजन्य

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