चीन की कठपुतली बन गया विश्व स्वास्थ्य संगठन…! Reviewed by Momizat on . डॉ. कुलदीप मेंहदीरत्ता संपूर्ण विश्व में कोरोना वायरस एक महामारी के रूप में उभर कर सामने आया है. समस्त विश्व जहां इस महामारी के कारण निरंतर आर्थिक और सामाजिक सं डॉ. कुलदीप मेंहदीरत्ता संपूर्ण विश्व में कोरोना वायरस एक महामारी के रूप में उभर कर सामने आया है. समस्त विश्व जहां इस महामारी के कारण निरंतर आर्थिक और सामाजिक सं Rating: 0
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    चीन की कठपुतली बन गया विश्व स्वास्थ्य संगठन…!

    डॉ. कुलदीप मेंहदीरत्ता

    संपूर्ण विश्व में कोरोना वायरस एक महामारी के रूप में उभर कर सामने आया है. समस्त विश्व जहां इस महामारी के कारण निरंतर आर्थिक और सामाजिक संकट में फंसता जा रहा है. वहीं इस संकट के मुख्य कारक के रूप में चीन को देखा जा रहा है. लोहे के आवरण में छिपे रहने वाले चीन पर धीरे-धीरे यह आरोप लगाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है कि वुहान वायरस या कोरोना वायरस कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह एक जैविक हथियार है. केवल यही नहीं, पिछले कुछ वर्षों में चीन से निकले विभिन्न वायरस जनित रोगों को लेकर भी चीन पर यह शक बढ़ता जा रहा है कि सार्स जैसी वायरस जनित बीमारियां भी प्राकृतिक ना होकर प्रयोगशाला जनित थीं.

    इस सारे प्रकरण में विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. तेद्रोस एधानम घेबरेयेसेस भी खलनायक बनकर उभरते प्रतीत हो रहे हैं. उन पर ये आरोप लगाया जा रहा है कि वे चीन से निकटता के चलते अपनी जिम्मेवारी निभाने में असफल रहे हैं. उन पर लगाए गए आरोप बिल्कुल निराधार हों, ऐसा भी नहीं है. अगर इन आरोपों को नकार भी दिया जाए तो भी इस महामारी के प्रसार को रोकने में जो लापरवाही विश्व स्वास्थ्य संगठन से हुई है. उसके आरोप से उसके मुखिया तेद्रोस को मुक्त नहीं किया जा सकता.

    अफ्रीकी देश इथोपिया के 2005 से 2012 तक स्वास्थ्य मंत्री रहे तेद्रोस को मलेरिया का विशेषज्ञ माना जाता है. यह बात अलग है कि उनकी विशेषज्ञता चिकित्सा क्षेत्र नहीं है, बल्कि उनकी पीएचडी जन स्वास्थ्य विषय में हैं. स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए भी उन पर आरोप लगे कि 2006, 2009 तथा 2011 में फैली हैजा की बीमारी को इन्होंने छुपाने का प्रयास किया. तेद्रोस  के नेतृत्व में इथोपिया का स्वास्थ्य मंत्रालय इसे डायरिया घोषित करता रहा, जबकि आसपास के सारे देश इसे महामारी के रूप में घोषित कर चुके थे. ऐसा प्रतीत होता है कि कोरोना वायरस के सन्दर्भ में भी तेद्रोस ने इसी नीति का पालन किया. 2012 से 2016 तक डॉक्टर तेद्रोस इथोपिया के विदेश मंत्री रहे. इस दौरान उन पर मानव अधिकारों के हनन के कई आरोप लगे.

    2017 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के जब  महानिदेशक का चुनाव किया जाना था. तभी ये सभी आरोप सामने आए तो डॉक्टर तेद्रोस ने विक्टिम कार्ड खेलते हुए अपने मुख्य प्रतिद्वंदी इंग्लैंड के डॉक्टर नेबारो  के समर्थकों पर आरोप लगाते हुए कहा कि ये सब लोग औपनिवेशिक मानसिकता वाले लोग हैं और  लोग किसी भी कीमत पर यह नहीं चाहते कि विकासशील देश का कोई प्रतिनिधि विश्व स्वास्थ्य संगठन का महानिदेशक बने. यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है, कि जिस व्यक्ति पर इतने आरोप लग चुके हों, वह कैसे संयुक्त राष्ट्र संघ के इतने बड़े प्राधिकरण का मुखिया बन सकता है. महानिदेशक के लिए हुए चुनाव में डॉ. तेद्रोस  को 185 में से 133 वोट मिले. उन्हें अफ़्रीकी विकासशील देश का नागरिक होने के साथ-साथ चीन का अभूतपूर्व समर्थन मिला. गौरतलब है कि डॉक्टर तेद्रोस पहले अफ्रीकी हैं जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्यक्ष बने. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक वास्तविकता हम सभी जानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ के किसी भी संगठन अथवा प्राधिकरण का अध्यक्ष बनना किसी बड़ी शक्ति के सहयोग के बिना संभव नहीं है. डॉक्टर तेद्रोस का वैचारिक इतिहास उन्हें अमेरिका, फ्रांस तथा ब्रिटेन जैसे देशों का समर्थन दिलवाने में असमर्थ था. रूस ने इस सारे प्रकरण में कोई खुली और महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाई. वैचारिक निकटता के कारण चीन ने तेद्रोस की दावेदारी का खुलकर समर्थन किया या यूँ कहें कि तेद्रोस को प्रयासपूर्वक विश्व स्वास्थ्य संगठन का महानिदेशक बनवाया.

    अक्तूबर 2017 में प्रतिष्ठित अखबार संडे टाइम्स की प्रसिद्ध स्तम्भकार रेबेक्का मायेर्स ने लिखा कि चीनी कूटनीतिज्ञों ने तेद्रोस को महानिदेशक बनाने के लिए न केवल विशेष अभियान चलाए, बल्कि ढेर सारा धन खर्च किया. यहाँ उल्लेखनीय है कि तेद्रोस को बनाने में चीन की ऐसी क्या रुचि थी कि चीन ने कूटनीतिक अभियान चलाए या चीन को ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी थी कि ढेर सारा धन तेद्रोस को महानिदेशक बनाने के लिए खर्चे.

    विश्व में ऐसा मानने वालों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है कि चीन के इस उपकार का बदला कोरोना वायरस के इस प्रकरण में तेद्रोस  ने चुकाया है. वैचारिक रूप से चीनी विचारधारा के निकट माने जाने वाले तेद्रोस ने उस चीन की पारदर्शिता की तारीफ की, जिसे सूचना और स्वतंत्रता विरोधी माना जाता है. सबसे पहले तेद्रोस ने चीन की 14 जनवरी की उस घोषणा को सही माना, जिसमें चीन ने कहा था कि प्रारंभिक परीक्षणों के आधार पर हमने यह पाया है कि यह वायरस मानव से मानव को स्थानांतरित नहीं होता. यहाँ यह उल्लेखनीय है कि संडे टाइम्स ने दावा किया कि दिसंबर में ही इस वायरस फैलने के सभी प्रमाणों को चीन ने नष्ट करवा दिया था. यहाँ यह प्रश्न उठता है कि अगर संडे टाइम्स की बात सही है तो चीन कौन से प्रारम्भिक परीक्षणों की बात कर रहा था. गौरतलब यह भी है कि संडे टाइम्स के इस रहस्य-उद्घाटन का किसी के द्वारा भी खंडन नहीं किया गया. यही नहीं चीन ने वायरस संबंधित सूचनाओं को दबाने के लिए उन डॉक्टरों पर भी कठोर कार्यवाही की, जिन्होंने वायरस के दुष्प्रभावों को जगजाहिर किया था. रियल स्टेट के बहुत बड़े कारोबारी जिसने बीमारी को छुपाने और उससे निपटने के सरकार के रुख और तौर-तरीकों  की कड़ी आलोचना की थी, वह तब से आज तक गायब है.

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के इसी रुख का नतीजा था कि विश्व ने इसे उतनी गंभीरता से नहीं लिया, जितना गम्भीरता से उस समय लिए जाने की आवश्यकता थी. 15 जनवरी को एक अमेरिकी मरीज का औपचारिक रूप से पता लगा जो वुहान की यात्रा करके वापस अमेरिका पहुंचा था. जनवरी में वुहान से 70 लाख लोग चीन और दुनिया के अलग-अलग देशों में गए, जबकि दिसंबर से ही वहां कोरोना फ़ैल रहा था. यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि किस प्रकार यह बीमारी पूरे संसार में फैल गई और महामारी का रूप ले लिया. 28 जनवरी को तेद्रोस ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक के रूप में चीन की यात्रा की. इस यात्रा के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग से तेद्रोस की मुलाकात हुई और 30 जनवरी को तेद्रोस ने कहा कि चीन बीमारी को रोकने के लिए नए प्रतिमान स्थापित कर रहा है. इस प्रकार तेद्रोस ने चीन की गलती पर पर्दा डालने का जानबूझकर या अनजाने में प्रयास किया, जबकि यह बीमारी उस समय महामारी के रूप में बदल रही थी. चीन जैसा देश जहां लोगों को लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है. मीडिया को स्वतंत्रता नहीं है. इलेक्ट्रॉनिक तथा इंटरनेट की आजादी उपलब्ध नहीं है. उसके द्वारा किए गए दावों को विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा सच मान लेना, तेद्रोस और उनके पूरे संगठन पर प्रश्न चिन्ह लगा देता है.

    कोरोना वायरस के प्रभाव को बढ़ने से रोकने और देश की जनता को संक्रमित होने से रोकने के लिए अमेरिका तथा अन्य देशों ने चीन के लिए अपनी सीमाएं बंद कर दीं, क्योंकि अब तक कोरोना वायरस का दुष्प्रभाव विश्व में सबको दिखाई देने लगा था. अत: विश्व की यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी. परन्तु तीन  फरवरी को तेद्रोस ने अमेरिका तथा अन्य राष्ट्रों की यह कहकर आलोचना की कि उन्होंने अपनी सीमाओं को चीन के लिए क्यों बंद कर दिया? तेद्रोस ने यह भी कहा कि ‘अंतरराष्ट्रीय यात्राओं और व्यापार में अनावश्यक हस्तक्षेप करने वाले कदमों के उठाए जाने की आवश्यकता नहीं है. हम यह आह्वान करते हैं कि सभी देश प्रमाण-आधारित तथा एक समान निर्णय लागू करें’.

    यही नहीं जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने कोरोना वायरस को फॉरेन वायरस और चीनी वायरस कहा तो डब्ल्यूएचओ की तरफ से आधिकारिक बयान दिया गया कि वायरस की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती और जब यह वायरस सारे विश्व में फैल गया तो डब्ल्यूएचओ के आपदा कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक माइक रयान का बयान था ‘कि अब यह एकता का समय है. अब समय है कि हम सब मिलकर आगे आएं और मिलजुल कर इस वायरस का सामना करें, इससे लड़ें.

    टेक्सास विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हेनरी थायेर तथा सिटीजन पावर इनीशिएटिव फॉर चाइना के उपाध्यक्ष लियान चाऊ हान ने 17 मार्च को द हिल नामक अखबार में लिखे लेख में आरोप लगाया कि ‘शुरू से ही तेद्रोस ने चीन का बचाव किया, जबकि इस खतरनाक और संक्रामक बीमारी से निपटने के लिए चीन ने पूरी तरह से कुव्यवस्था का परिचय दिया’. इसके अतिरिक्त तेद्रोस के नेतृत्व में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड-19 को महामारी घोषित करने में बहुत देर कर दी. महामारी घोषित करने के संबंध में तीन मुख्य मापदंड माने जाते हैं, पहला रोग का मानव से मानव तक स्थानांतरण, दूसरा रोग के कारण उच्च मृत्यु दर और तीसरा रोग का तीव्र वैश्विक प्रसार. विश्व स्वास्थ्य संगठन पर यह आरोप है कि इन तीनों मापदंडों के कोविड-19 पर लागू होने के बावजूद इसे वैश्विक महामारी घोषित करने में देरी की, जिसके कारण समूचा विश्व अभूतपूर्व रूप से वर्तमान संकट का सामना कर रहा है, और दिनोंदिन मृतकों की संख्या बढ़ती जा रही है.

    डॉक्टर तेद्रोस के नेतृत्व में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रिपोर्टों में ताइवान को चीन का भाग बताया, जिसमें चीन में फैले वायरस के आंकड़े प्रस्तुत किए गए थे. चीन में संक्रमण अधिक था, इसमें ताइवान को शामिल करने से ताइवान भी विश्व की दृष्टि में संदेह के घेरे में आ गया. जिस कारण विश्व के कई देशों ने चीन के साथ साथ ताइवान पर यात्रा आदि प्रतिबंध लगा दिए. जबकि ताइवान के यहां कोविड-19 का प्रसार और संक्रमण कम था. ताइवान के पास इनका सामना करने संबंधित तैयारी, संसाधन तथा प्रयास, चीन और शेष उसकी तुलना में बेहतर थे. इस विषय पर फरवरी के दूसरे हफ्ते में यूरोपीय संघ की संसद के कुछ सदस्यों ने एतराज जताते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन को पत्र भी लिखा था. इस सारे प्रकरण में यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि ताइवान को चीन का भाग दर्शाने से विश्व का कौन सा देश प्रसन्न होता या किस देश के कहने पर ताइवान को चीन का भाग दर्शाया गया होगा.

    इस प्रकार विभिन्न आधारों पर जैसे चीन के प्रारंभिक परीक्षण संबंधित सूचनाओं को सच माना जाना, मानव से मानव तक वायरस के स्थानांतरण को चीन के कहने पर न स्वीकारना, चीन के राष्ट्रपति से मिलने के बाद चीन के उपायों की तारीफ करना, विभिन्न देशों के आग्रह किए जाने पर भी कोरोना वायरस को महामारी न स्वीकारना, चीन पर वायरस के फैलाने संबंधी आरोपों का तेद्रोस के द्वारा बार-बार बचाव किया जाना, रॉबर्ट मुगाबे को गुडविल अम्बेसडर बनाने का प्रयास करना, वायरस को महामारी घोषित करने में देर करना आदि ऐसे कारण हैं, जिनके कारण तेद्रोस पर उंगलियां उठनी स्वाभाविक हैं. दुनिया इस बात को समझ रही है कि संभवतः अगर तेद्रोस के नेतृत्व वाला डब्ल्यूएचओ समय रहते इसे महामारी घोषित कर देता तो दुनिया में उसी अनुरूप इस बीमारी का सामना करने के लिए विभिन्न देश कदम उठा सकते थे और इस वायरस के कारण हो रही हजारों-लाखों मौतों को रोका जा सकता था. विश्व में तेद्रोस के इस्तीफे और उनकी भूमिका की जाँच की मांग कई स्तरों से उठनी प्रारंभ हो गई है. आने वाले समय में कोई आश्चर्य नहीं होगा कि तेद्रोस और चीन को इस महामारी के खलनायक के रूप में जाना जाए.

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