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जवाहरलाल नेहरू ने सावरकर का कभी तिरस्कार नहीं किया

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देवेश खंडेलवाल

नई दिल्ली. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सुबनसर हॉस्टल के नजदीक एक सड़क का नाम बदलकर वीर सावरकर मार्ग किया गया है. विश्वविद्यालय के वामपंथी व कांग्रेसी छात्रों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. जेएनयूसू की अध्यक्ष आइशी घोष ने अपने ट्विटर हैंडल से इसकी एक तस्वीर शेयर की. इस तस्वीर में साफ दिखा कि सुबनसर हॉस्टल को जाने वाली सड़क को वीडी सावरकर मार्ग नाम दिया गया है. आइशी घोष ने इसी पर अपना गुस्सा जाहिर करते हुए लिखा, “ये जेएनयू की विरासत के लिए शर्म की बात है कि इस आदमी का नाम इस विश्वविद्यालय में रखा गया है. सावरकर और उनके लोगों के लिए विश्वविद्यालय के पास न कभी जगह थी और न ही कभी होगी.”

जेएनयू के वामपंथी छात्र स्टालिन, लेनिन और कार्ल मार्क्स को अपनी प्रेरणा मानते हैं. ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं है कि उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के किसी क्रांतिकारी का सम्मान किया हो. जबकि ये वामपंथी छात्र उन लोगों को जेएनयू की दीवारों पर जगह देते हैं जो हज़ारों लोगों का नरसंहार के दोषी हैं. गौरतलब है कि इन छात्रों के मन में भारत विरोधी विचारों के लिए पूरी जगह है. पिछले कुछ सालों से वहां पाकिस्तान और आतंकियों के समर्थन में नारे लगाए जाते रहे हैं. हाल ही में जेएनयू के छात्र शारजील इमाम को भड़काऊ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. इमाम जेएनयू के पीएचडी का छात्र है, जिसने असम सहित पूरे उत्तर भारत के विभाजन के लिए लोगों को उकसाया था.

जेएनयू से पहले भी ऐसा ही कुछ दिल्ली यूनिवर्सिटी में हुआ था. उस समय सावरकर की मूर्ति लगाए जाने को लेकर मामले ने तूल पकड़ा था. कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI ने सावरकर की मूर्ति पर काली स्याही लगाकर उन्हें जूतों का हार पहनाया था. इस हंगामे के बाद और एनएसयूआई की ऐसी हरकतों को देखते हुए आखिरकार मूर्तियों को वहाँ से हटाना पड़ा था.

दरअसल, जिस विश्वविद्यालय में सावरकर के नाम पर वामपंथी नाराज़ हो रहे हैं और NSUI से जुड़े छात्र उनकी मूर्तियों का विरोध कर रहे हैं, दोनों जगह एक नाम जवाहरलाल नेहरू का सामने आता है. इन वामपंथी और NSUI के छात्रों को एक बार इतिहास पढ़ना चाहिए. महात्मा गांधी के प्रिय शिष्य और भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सावरकर का कभी तिरस्कार नहीं किया. हालांकि, उनमें वैचारिक मतभेद जरूर थे. इसका एक उदाहरण नेहरू के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान मिलता है.

कांग्रेस ने राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था, जिसमें पट्टाभिसीतारमैय्या, डॉ. राधाकृष्णन और विजयलक्ष्मी पंडित जैसे बड़े नाम शामिल थे. इस समिति ने एक किताब का प्रकाशन किया, जिसमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित कई लेख थे. पुस्तक का मुख्य संपादन पट्टाभि सीतारमैय्या ने किया था. पट्टाभि ने ही कांग्रेस का दो खंडों में इतिहास लिखा जो सबसे लोकप्रिय एवं सटीक माना जाता है. उक्त पुस्तक की खास बात यह थी कि उसमें सावरकर के दो लेख प्रकाशित किये गए थे. इससे भी महत्वपूर्ण था कि पुस्तक की प्रस्तावना जवाहरलाल नेहरू ने लिखी थी.

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