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तमिल-सिंहली विवाद गहराने को ली लेम्युरिया की मदद

कुछ देशों में दीर्घकालीन युद्घ के बीज बोना और उसमें से अपने हित साधना, यही यूरोपीय देशों का पांच सदी का इतिहास है. इस दौरान विश्व पर राज करने और उसमें बहुत बड़ी लूट करने का तरीका दुनिया ने देखा है. भारत सहित विश्व का कोई भी देश इसमें अपवाद नहीं है. एशिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका में कोई भी युद्घ हो और उसका संबंध यूरोपीय वर्चस्व एवं प्रचंड लूट के साथ न हो, ऐसा आमतौर पर नहीं होता. ये युद्घ अधिकतर तो हेमेटिक-सेमेटिक के बीच विवाद बढ़ाकर किए गये युद्घ रहे हैं. दुर्भाग्य यह है कि इस तरह के सदियों चलने वाले युद्धों में कुछ लाख लोग बली हो जाते है़ं, अरबों की संपत्ति बर्बाद हो जाती है. पीढि़यां खत्म हो जाती हैं, हर एक पर अन्याय होता है इसलिये कोई भी किसी की बात सुनने की मानसिकता में नहीं होता. सोलहवीं शताब्दी से बीसवीं शताब्दी तक के इस घटनाक्रम का बारीकी से विचार किया जाये, तो ध्यान में आता है कि हर जगह यूरोपीय देश किसी ना किसी से खिलवाड़ कर रहे हैं. इस मामले में भारत की तरह ही हमारा पड़ोसी श्रीलंका भी भुक्तभोगी है.

श्रीलंका के युद्घ में तमिल लोगों पर हुआ अन्याय किसी भी भारतीय के दिल को कचोटने वाला विषय है, क्योंकि उसमें लगभग 80 हजार से एक लाख भारतीयों की जानें गईं. लेकिन एक बात अब स्पष्ट हो चुकी है कि यह विषय तमिल और सिंहली के बीच न होकर यूरोपीय लोगों द्वारा अपनी लूट का मतलब पूरा करने के लिये चली गई चाल है. जिस तरह हमारे यहां आर्य-अनार्य विवाद फैलाया गया है, उसी तरह का विवाद इन यूरोपीय लोगों ने पूरी दुनिया में फैलाया है.

पिछले 200 वर्ष में हुईं आधे से ज्यादा लड़ाइयां उसी विवाद का वैश्विक रूपांतर हैं. इस विवाद से 20 वर्ष पूर्व अफ्रीका के रवांडा देश में केवल 100 दिनों में 10 लाख लोगों का संहार हुआ था. श्रीलंका का मामला यह था कि तमिल एवं सिंहली को विभाजित करने के लिये आर्य-अनार्य विवाद पर्याप्त नहीं पड़ रहा था, इसलिये उन्होंने अन्य प्रायोजित कथानक जोडे़. श्रीलंका में और एक घटक यह था कि वहां मुख्यत: बौद्घ मतावलंबी हैं. हिंदू धर्म से उसके अलग स्वभाव को अधिक मजबूती मिले, इसके लिये ‘थियोसॉफिकल सोसायटी’ नामक अंतरराष्ट्रीय संगठन को इसमें जुटाया गया. उसके माध्यम से सामने लाई गई एक कल्पना यह थी कि 1.75 करोड़ वर्ष पहले दक्षिण में ‘लेम्युरिया’ नामक संस्कृति थी जो दक्षिण की संस्कृति की मातृदेवता है. थियोसॉफिकल सोसायटी की संस्थापिका श्रीमती हेलेना ब्लव्हट्स्की ने यही बात आगे रखी. वे जोर देकर उसे आर्य संस्कृति से दूर, लेकिन विश्व की अन्य किसी भी संस्कृति से नजदीक बताती थीं. उनका कहना था कि मैडागास्कर एवं सुमात्रा टापुओं की व्यापक संस्कृति के जरिये श्रीलंका एवं तमिल संस्कृति का यूरोपीय हेमेटिक संस्कृति से संबंध था. विश्व की सभी संस्कृतियों का उद्गम यूरोप से होता है, यह दिखाना ही उनका स्वाभाविक उद्देश्य था, लेकिन इसमें महत्व की बात यह थी कि इस विषय को स्थापित करने के लिये यूरोपीय देशों ने 100 से 150 वर्ष तक लगातार प्रयास किये.

स्थिति यह है कि आज 21वीं सदी में इस देश की आम जनता श्रीलंका से मित्रता की बात नहीं कर सकती. अनेक कारणों से उस देश से संबंध तनावपूर्ण हैं. अगर उन कारणों की परंपरा देखी जाये तो मित्रता के कारण संभव है, अनेक भारतीयों की भावनायें आहत हो जायें. जहां तक अपने देशबांधवों की भावनायें आहत होने का मामला है तो उससे खेलना ठीक नहीं. लेकिन इस विभाजन को बढ़ावा देने के लिये महासत्ताओं द्वारा किए गये प्रयासों की ओर हमें नजर डालनी चाहिये.

यूरोपीय लोगों का इसमें उद्देश्य समझने के लिये हमें कुछ सीमा तक सिंहली लोगों की मानसिकता समझनी होगी. 40 वर्ष पूर्व उस देश ने ब्रिटिशों द्वारा दिया गया ‘सीलोन’ नाम बदलकर ‘श्रीलंका’ नाम धारण किया. अपने देश की हर चीज अपने अधिकार में हो, इसके लिये उन्होंने जो कीमत चुकाई थी वह असाधारण थी. किसी भी व्यक्ति अथवा चीज के नाम के साथ ‘श्री’ लगाना उन्होंने जीवनमूल्य के रूप में स्वीकार किया था. साठ वर्ष पहले हर वाहन क्रमांक ‘श्री’ अक्षर से शुरू होता था. यह बात उत्तर श्रीलंका के तमिल लोगों को भी अमान्य नहीं थी. लेकिन वह क्रमांक तमिल में हो अथवा सिंहली भाषा में, यह विवाद का मुद्दा बन गया और यही सिंहली और तमिल के बीच विवाद के संघर्ष में बदल जाने का कारण बना.

वास्तव में श्रीलंका में हर कदम पर भारतीयता की छाप है. आयुर्वेद उनकी राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति है. इतना ही नहीं, श्रीलंका के ‘रावण’ नामक विशेषज्ञ ने आयुर्वेद के लिए ‘दूतनाड़ी’ विषय पर एक ग्रंथ भी लिखा है, जो मनुष्य के स्वास्थ्य के बारे में अब तक अपरिचित रहे अनेक रहस्य खोलता है. दूतनाड़ी यानी रोगी का संदेश लेकर आये व्यक्ति की नाड़ी अथवा आवाज के सहारे उस रोगी की बीमारी का अचूक निदान करना, यह पद्धति देश में अनेक स्थानों पर प्रयोग की जाती है एवं उसमें अनेक युवा वैद्य भी हैं. इस विषय पर मुंबई आईआईटी एवं पुणे की राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला में प्रयोग के बाद एक संयुक्त पीएचडी भी की गई है. लेकिन इसमें मजे की बात यह है कि दूतनाड़ी ग्रंथ के कुछ आरंभिक श्लोक गायब हैं और उसका रचयिता रावण है. लेकिन क्या यह रामायण का रावण है, यह इतिहास नहीं जानता. रामायण में रावण के कुछ वाक्यों से इस तरह का आभास होता है. लेकिन वह ग्रंथ पूरी तरह आयुर्वेद शास्त्र की कसौटी पर खरा उतरने वाला है. यहां आयुर्वेद का उदाहरण देने का कारण यह है कि आयुर्वेद समझने की जो परिभाषा है वह त्रिदोष सिद्घांत, पंचमहाभूत सिद्घांत एवं सप्तधातु सिद्घांत हैं और वह शास्त्रीय परिभाषा केवल आयुर्वेद ही नहीं बल्कि हर भारतीय शास्त्र के लिये है. मुगलकाल में यद्यपि अनेक सदियों तक भारतीय ग्रंथ जलाये जाते रहे थे, फिर भी आज उपरोक्त शास्त्रीय सिद्घांतों पर अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं. ऐसे कई ग्रंथ जो भारत में नहीं मिलते, वे आज भी म्यांमार अथवा ब्रह्मदेश और तिब्बत में मिलते हैं. ये सभी ग्रंथ एकत्र कर उपलब्ध साधनों की सहायता से उनकी पुनर्रचना की जाये तो अनेक विषय सामने आ सकते हैं, लेकिन पिछले 200 वर्ष में पश्चिमी लोगों ने हमेशा यही फैलाया है कि भारतीय जीवनशैली एक समान नहीं है. उस दूतनाड़ी की पूरक अनेक परंपरायें तमिलनाडु और अन्य प्रांतों में आज भी हैं, लेकिन थियोसॉफिकल सोसायटी अथवा लेम्युरिया विषय के विशेषज्ञ इसे अफ्रीका के उत्खनन से जोड़ना चाहते हैं. भारतीय संस्कृति एकात्म नहीं है, यह दिखाने के लिये पश्चिमी लोगों द्वारा किया गया प्रयास, उस पर हमारी गंभीर दृष्टि की मांग करता है.

किसी हिस्से में जब पश्चिमी विद्वान आकर आर्य-अनार्य विषय पर कुछ मूलभूत बातें बताने की चेष्टा करते हैं,तब उनका संबंध हेमेटिक-सेमेटिक विवाद से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से होता ही है. श्रीलंका की घटना इन दोनों संदर्भों का उदाहरण है. पूरे भारत में उठने वाले मुद्दे वहां पर लागू नहीं होते, क्योंकि वहां पर बौद्घ धर्म मुख्य घटक है. इसका भारत जैसा ही प्रतिरोध वहां बौद्घों ने किया था, लेकिन उनके प्रतिरोध को कुचलने में थियोसॉफिकल सोसायटी द्वारा अपनाई गई भूमिका ध्यान देने योग्य है. थियोसॉफिकल सोसायटी की अध्यक्षा श्रीमती हेलेना ब्लव्हट्स्की ने कहा था कि श्रीलंका की संस्कृति भारत की आर्य संस्कृति से संबंधित होने की बजाय एक से डेढ़ करोड़ वर्ष पूर्व हिंद महासागर, अभी जहां सागर ही है, में व्याप्त लेम्युरी संस्कृति से संबंधित है. इस झूठ का ब्रिटिशों और चर्च संगठनों ने आर्य-द्रविड़ विवाद गहराने में खूब उपयोग किया. ब्रिटिश सेवा में कार्यरत फिलिप स्क्लेटर ने सबसे पहले लेम्युरिया प्रदेश की कल्पना सामने रखी.

विश्व के विशेषज्ञों द्वारा इस विषय को थोड़ी बहुत मान्यता मिलने के बाद 19 वीं सदी के आखिरी 20-25 वर्षों में तत्कालीन ब्रिटिश अफसर और बिशप सभा ने यह विषय अपने हिसाब से चलाना शुरू किया. चार्ल्स मॅक्लीन नामक ब्रिटिश अधिकारी ने लेम्युरिया प्रदेश का विषय तमिलनाडु की पाठ्यपुस्तकों में दिया. काल्डवेल ब्रिटिश इंडिया में बड़ा अधिकारी था. उसने जोर दिया कि इतिहास से लेकर सामान्य घटकों तक यह विषय प्रयुक्त हो.19 वीं सदी के आखिरी दौर में यह विषय श्रीलंका तक पहुंच चुका था. श्रीलंका में उसका दूसरा पहलू था इस सबके बारे में बौद्घ मतावलंबियों की सोच. ईसाई तथा ब्रिटिश आक्रामकों का उद्देश्य वे जानते थे इसलिये धर्मपाल जैसे विद्वानों ने इसके लिये बहुत परिश्रम किया.

ईसाई प्रसारकों लसेन एवं जेम्स टेनंट ने तमिल तथा सिंहली भाषा के एक ही भाषा गुट में होने का विचार व्यक्त किया, लेकिन तमिल अध्येता एम. एस. पूर्णलिंगम ने बिशप काल्डवेल के पक्ष का ही समर्थन किया. सौ-सवासौ वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में विभाजन के जो बीज बोये गये, उसके चलते वहां समुदायों में संघर्ष शुरू होने में 100 वर्ष का समय लगा. पिछले 25-30 वर्षों से जारी इस संघर्ष में दोनों तरफ के लगभग एक लाख लोग मारे गये हैं. भारत में अनेक स्थानों पर ऐसे कितने ही विषय उनके एजेंडे पर हैं. पिछले 500 वर्षों से जारी इस गुप्त आक्रमण को परास्त करने हेतु हर भारतीय का आगे आना समय की मांग है. – मोरेश्वर जोशी

साभार: www.panchjanya.com

 

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