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    ‘दिव्यांग’ राहुल देशमुख कर रहे ‘दिव्य कार्य’ – भय्याजी जोशी

    मुंबई (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने कहा कि ‘काम करते समय बीच में ही रुकने वाले बहुत दिखाई देते हैं, परंतु हार के पश्चात भी अपना कार्य निरंतर आगे ले जाने वाले राहुल देशमुख दृष्टीहीन होने के पश्चात भी समाज के लिए दिव्य कार्य कर रहे हैं. सरकार्यवाह ने राहुल देशमुख के कार्य की प्रशंसा की. वे दृष्टीहीन हैं, लेकिन उनका कार्य दिव्य है.

    केशवसृष्टी संस्था द्वारा समाज में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों व संस्थाओं को प्रत्येक वर्ष ‘केशवसृष्टी’ पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है. इस साल का पुरस्कार सोमवार, 11 नवंबर को आयोजित कार्यक्रम में ‘नेशनल एसोसिएशन फॉर वेल्फेअर ऑफ फिजिकल चैलेंज्ड’ संस्था के संस्थापक राहुल देशमुख को प्रदान किया गया. दादर, शिवाजी पार्क स्थित स्वातंत्र्यवीर सावरकर सभागृह में आयोजित कार्यक्रम में केशवसृष्टी के अध्यक्ष एस.एस. गुप्ता, केशवसृष्टी पुरस्कार चयन समिति की अध्यक्षा हेमाताई भाटवडेकर, चयन समिति सदस्य मंच पर उपस्थित थे.

    भय्याजी जोशी ने कहा कि किसी कार्य को करते समय आने वाली समस्याओं का हल न निकलने के कारण कार्य पूर्णत: बंद करने वालों की संख्या बहुत है. कठिन परिस्थिति में भी अपने कार्य को निष्ठापूर्वक आगे ले जाने वालों की संख्या बहुत कम है. उनमें से एक राहुल देशमुख हैं. राहुल जी को भला कौन दिव्यांग कह सकता है? उन्हें दृष्टी है. जिन दिव्यांग को हम दिव्यांग के रूप में नहीं देखते, उनके प्रतिनिधि हैं राहुल देशमुख. दिव्यांग होकर भी राहुल जी दिव्य कार्य कर रहे हैं. वह नेत्रहीन हैं, परंतु उन्हें दृष्टि नहीं है, ऐसा कदापि नहीं है. आज हम ऐसे श्रेष्ठ कार्य करने वाले व्यक्ति का सत्कार कर रहे हैं. कोई साथ रहे या ना रहे, इसकी चिंता न करते हुए निर्भयता से अपनी मंजिल तक जाना इतना आसान नहीं.’

    राहुल देशमुख ने कहा कि ‘हम ग्रामीण भाग के नेत्रहीन और दिव्यांग बच्चों के लिए काम करते हैं. उन्हें समाज के मुख्य प्रवाह में लाने के लिए हम प्रयत्नशील हैं. उन बच्चों का कार्य के प्रति लगाव देखकर, उन में आत्मविश्वास जागृत कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने के लिये जो काम कर रहा हूं, उस काम के कारण मुझे यह पुरस्कार मिला है. उन्होंने कहा कि स्वयं के अंधत्व से लड़ते समय घोर निराशा के अनेक प्रसंग आए, लेकिन कभी निराश न हुआ. अडिग रहते हुए उन कठिन परिस्थितियों को पार किया. कार्य के प्रति हमारे मन में तीव्र इच्छा है, तो कितने भी संकट क्यों न आएं, आप का कार्य कभी रुकता नहीं.

    राहुल देशमुख तीन वर्ष की आयु में ही दृष्टिहीन हो गए थे. लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई निरंतर जारी रखी. उन्होंने बीएड., एम.एस.डब्ल्यू. का अध्ययन पूर्ण कर अंध-दिव्यागों को संगणक का प्रशिक्षण देने का कार्य किया. उनका मानना था कि अगरबत्ती, मोमबत्ती तैयार करने का प्रशिक्षण लेकर अंध-व्यक्ति सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत नहीं कर सकता. इसलिए कुछ अलग करने का प्रयास किया. आज उनकी संस्था में 1250 दृष्टिहीन दिव्यांग छात्र शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं.

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