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अगली पीढ़ी तक अपनी संस्कृति पहुँचाने का मार्ग : नंदा देवी राजजात यात्रा

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n-1देहरादून (विसंके) 22 अगस्त.  नन्दा राजजात यात्रा हमारे इस उत्तराखण्ड प्रदेश के लिए आज तक के 1400 वर्षों में अति महत्वपूर्ण हैं और इस की सारी व्यवस्थाओं का आयोजन नव निर्मित उत्तराखण्ड प्रदेश कर रहा है और पहली बार अद्भुत दृश्य हमारे सामने हैं जिसमें सबसे ज्यादा जनसमुदाय, विशेषकर महिलाऐं इस यात्रा में भाग ले रही हैं, वहीं नवयुवक भी पीछे नहीं हैं. यह कहना है राज्य सभा के सांसद तरुण विजय का.

उन्होंने बताया कि 12 वर्षों में पहली बार इस नन्दा राजजात यात्रा का आयोजन उत्तराखण्ड राज्य कर रहा है. यह यात्रा 2000 में उत्तर प्रदेश सरकार के नेतृत्व में हुई थी. इस बार की यात्रा में अनोखी बात यह है कि कभी इस यात्रा में महिलाओं का चलना वर्जित था परन्तु इस बार 90 प्रतिशत महिलाऐं इस यात्रा में भाग ले रहीं है और अपनी लाड़ली नन्दा की आश्रुपूर्ण विदाई कर रही हैं. यात्रा में 15 से 30 वर्ष की आयु वाले युवा बढ़-चढ़ कर भाग ले रहें हैं. लगता है कि यह यात्रा अपनी संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में सौंपने का कार्य भी करती है. यात्रा का आयोजन 2012 में होना था जिसमें मूल-मास होने के कारण यह यात्रा नहीं हो पायी तथा 2013 में केदार घाटी आपदा के कारण भी यह यात्रा नहीं हो पायी थी.

n-2श्री विजय ने बताया कि उनके द्वारा अब तक ईड़ाबधानी, नौटी, कुरुड़, कांसवा, चांदपुर गढ़ी, सेम तक की यात्रा की गयी है. यह यात्रा संघर्ष, वेदना, पीड़ा, जय विजय का द्योतक है. पहाड़ की संस्कृति का संरक्षण इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य है. जिसमें प्रमुख रूप से हिमालय व प्रकृति संरक्षण का भी प्रतीक यह यात्रा है. यहां पर हिमालय राज की बेटी नन्दा को माँ के रूप में पूजा जाता है तथा अपने मायके आई हुई बेटी (माँ नन्दा) की विदाई में यह यात्रा होती है.

उन्होंने कहा कि यह यात्रा एक मात्र ऐसा पर्व है जिसमें उत्तराखण्ड के दोनों मण्डल गढ़वाल व कुमांऊ संयुक्त रूप से इस यात्रा का आयोजन करते हैं. यह यात्रा उत्तराखण्ड का पर्व भी है. यह यात्रा उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विरासत जिसमें लोक गीत, लोक संस्कृति, लोक नृत्य तथा लोक भावनाओं को समेटे हुए है. विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं की छंतोली इस यात्रा में समाहित होती है तथा माँ नन्दा की विदाई होती है.

n-3श्री विजय ने कहा कि इस यात्रा में सरकार की सारी व्यवस्थायें सफेद हाथी साबित हो रही हैं. बस माँ नन्दा सरकार के भरोसे से यह यात्रा चल रही है. वर्तमान की सारी व्यवस्थाओं से लगता है कि यह यात्रा 1720-1860 में हो रही है. जिसमें 500 लोगों के लिए पानी पीने के लिए एक टंकी और एक मग्गा है व वृद्धों के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं की गयी है तथा रास्तों में 4-4 घंटे का जाम लग रहा है. यही नहीं, प्रशासन के पास किस दिन यात्रा का पड़ाव कहां होगा, कैसे होगा कोई सूचना नहीं है और ना ही  आपदा प्रबन्धन का कोई व्यक्ति वहां मौजूद है. यह यात्रा केवल माँ नन्दा सरकार के भरोसे चल रही है.

उन्होंने केन्द्र सरकार की तारीफ करते हुए कहा कि नन्दा देवी एक्सप्रेस के नाम से चलने वाली रेलगाड़ी के चलने से यह यात्रा प्रत्येक दिन याद की जायेगी.

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