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    देश की सीमाएं माँ के आंचल की तरह पवित्र – डॉ. कृष्णगोपाल जी

    नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल जी ने कहा कि सेना के साथ देशवासियों को भी देश की रक्षा में सहभागी होना चाहिए. जागरूक देश वह है जो अपनी सीमाओं के प्रति जागरूक रहता है. सीमाओं का जानकार और उसको पवित्र मानने वाला ही देश का जागरूक नागरिक है. देश की सीमाएं माँ के आंचल की तरह पवित्र होती हैं, जिसे अपना देश कालांतर में भूल गया. चन्द्रगुप्त मौर्य सैल्यूकस के भारत पर आक्रमण के समय मगध से झेलम नदी के तट पर पौने दो हजार कि.मी. दूर उसे रोकने आया और उसे पराजित कर वहां से खदेड़ दिया. क्योंकि उसे अपने राष्ट्र की सीमा का भान था, जिसके लिए उसने सब राजाओं को इकट्ठा किया.

    डॉ. कृष्णगोपाल जी ने सीमा जागरण मंच की पत्रिका ‘सीमा संघोष’ के वार्षिक विशेषांक ‘सीमा सुरक्षा’ का विमोचन करते हुए नेहरू मेमोरियल पुस्तकालय के सभागार में संबोधित किया.

    उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने सीमाओं की महत्ता को ध्यान में रखकर हजारों साल पहले सीमाओं के निकट पवित्र तीर्थ चाहे वह उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वम-कन्याकुमारी, पश्चिम में द्वारका, पूर्व में जगन्नाथ धाम, गंगासागर, परशुराम कुंड आदि तीर्थों की स्थापना करके देश की सीमाओं को आस्था के सूत्र से चिन्हित कर दिया था.

    उन्होंने कहा कि सीमा के प्रति यह जागरण का कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक विद्याभारती आदि संस्थाओं के माध्यम से कर रहे हैं. बद्रीनाथ के निकट माणा गांव जैसे दुर्गम सीमांत क्षेत्रों के बच्चों को पढ़ाना, सुदूर क्षेत्रों में चिकित्सा सेवा उपलब्ध करवाना देश को सुरक्षित रखने का कार्य है. सीमाओं की सुरक्षा केवल सेना नहीं कर सकती, इसके लिए वहां के निवासियों में राष्ट्रीयता का भाव होना आवश्यक है, जिसे जागृत करने का कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व सीमा जागरण मंच कर रहा है.

    सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि देश में 12 हजार गांव सीमाओं पर स्थित हैं, वहां शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा सुनिश्चित केवल सरकार नहीं कर सकती, दिल्ली जैसे महानगरों में बैठे प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वे सीमा पर जाकर वहां अभाव में रह रहे लोगों की सहायता करें. पर्यटन के लिए विदेशों में जाने वालों को देश की सीमाएं भी देखनी चाहिए. कश्मीर घाटी में मुस्लिम महिलाओं को घर पर शाल निर्माण का प्रशिक्षण व रोजगार दिया गया है, जिससे उन्हें लग रहा है दिल्ली भी ऐसे लोग है जो उनकी चिंता करते हैं. यह भावना देश के प्रत्येक नागरिक की होनी चाहिए. देश के दूरस्थ क्षेत्र में बैठे हुए हर नागरिक की कठिनाई हमको मालूम होनी चाहिए. हम अगर उनके कष्ट कठिनाइयों को दूर करने के लिए हर सम्भव कोशिश करेंगे तो वह नागरिक सैनिकों के साथ देश की सीमा की रक्षा के लिए अधिक ताकत से लड़ेगा और सीमा सुरक्षित होगी.

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