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    देश में विज्ञान की प्राचीन परंपरा – जयन्त सहस्रबुद्धे

    जयपुर (विसंके). विज्ञान भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री जयंत सहस्रबुद्धे जी ने कहा कि देश में ज्ञान की प्राचीन परम्परा और विशेषता से हम थोड़ा दूर चले गए. आज अपने देश से ज्यादा पश्चिम को श्रेष्ठ मानने लगे हैं. अपने विज्ञान में तंत्र ज्ञान, यंत्र ज्ञान के साथ-साथ विज्ञान का आधुनिक क्षेत्र में विकास के अध्ययन की आवश्यकता है. उन्होंने दिल्ली के कुतुबमीनार के पास लौह स्तम्भ का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में विज्ञान के अभाव में उसका निर्माण संभव नहीं था. जयंत जी पाथेय सभागार में 09 फरवरी को आयोजित रज्जु भैया स्मृति व्याख्यान माला में संबोधित कर रहे थे.

    उन्होंने कहा कि लौह स्तम्भ के बारे में डॉ. बाल सुब्रमण्यम ने रसायन विज्ञान का अध्ययन किया, उसके साथ ही मापन विज्ञान का अध्ययन किया, जिसे वर्तमान में मेट्रोलोजी विज्ञान कहते हैं. हमारे यहाँ एक हाथ था, चार उंगल इस प्रकार से मापन किया जाता था. जिसके प्रमाण को नकार दिया गया. भारत में मापन शास्त्र अचूक है, जिसका कौटिल्य अर्थशास्त्र में वर्णन किया गया है.

    उन्होंने कहा कि विश्व धर्म सभा में भी स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में 11 सितम्बर 1893 की सभा में विज्ञान में भौतिक विज्ञान के साथ-साथ अध्यात्म विज्ञान के बारे में भी विश्व के सामने अपने विचार रखे. आधुनिक विज्ञान का सिद्धान्त, सनातन विज्ञान का प्रतिबिम्ब मात्र है. भौतिक विज्ञान का विभाजन हुआ – विद्युत, चुम्बकीय, परमाणु तीव्र-मंद एवं गुरुत्वीय.

    उन्होंने कहा कि भगवान नटराज की मूर्ति चक्रीय ब्रह्माण्ड के बारे में बताती है. नटराज की मूर्ति से ताण्डव नृत्य उत्पन्न हुआ, अर्थात् नृत्य के राजा थे. कृष्ण को नटवर कहा है, और भगवान शंकर को नटराज कहा जाता है.

    मानव ऐसा विचार करने लगा है. यंत्र को मनुष्यत्व देना, जैसे शब्दों का भाव, भाषा का ज्ञान, चेतना आदि. मनुष्य स्वभाव से यंत्र बन रहा है. यंत्र के लिए उपर्युक्त भाषा संस्कृति है. विशिष्ट अतिथि इसरो के वैज्ञानिक डॉ. जगदीश चन्द्र व्यास ने कहा कि भारत में विज्ञान विषय में धर्म एवं विज्ञान का टकराव नहीं है. जबकि पश्चिम में कहा जाता है कि धर्म और विज्ञान का कभी साथ नहीं हो सकता. अध्यात्म एवं विज्ञान भारत की संस्कृति में आरम्भ से ही रहा है. अद्वैत रामायण में विज्ञान को परिभाषित किया गया है. हम स्वयं भी अपनी आंखों के सामने प्रमाणित होते हुए देख सकते हैं.

    कार्यक्रम के आरम्भ में पाथेय कण के सम्पादक कन्हैया लाल ने संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया के बारे में कहा कि उनका जीवन प्रेरणादायी था. आपातकाल के समय उन्होंने भूमिगत रहकर आन्दोलन का संचालन किया. कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे योगी रमणनाथ जी ने कहा कि भौतिकी के साथ अध्यात्म का संगम होने पर परिणाम सकारात्मक होंगे.

    इससे पूर्व दोपहर में प्राचीन भारत का विज्ञान विषय पर पोस्टर प्रदर्शनी लगायी गई, जिसमें विज्ञान विषय के विद्यार्थियों ने भाग लिया. सर्वश्रेष्ठ पोस्टर बनाने वाले विद्यार्थियों को पारितोषिक दिया गया. कार्यक्रम में प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ की भतीजी साधना सिंह भी उपस्थित रहीं. इस मौके पर प्राचीन भारत का विज्ञान विशेषांक एवं काव्य भौतिकी पुस्तक का अतिथियों द्वारा लोकार्पण किया गया.

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