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धर्मांतरण पर चिंता

संगठित धर्मांतरण पर हिंदू संगठनों को कठघरे में खड़ा करना कथित हिंदू-आतंकवाद पर शोर-शराबा करने के समान है. यानी वास्तविक दोषियों और मूल गड़बड़ी पर चुप्पी साधने जैसी बात. वस्तुत: आतंकवाद और संगठित धर्मांतरण, इन दोनों ही समस्याओं के संदर्भ में हिंदू तो पीड़ित समुदाय है, उत्पीड़क नहीं. धर्मांतरण  संबंधी घटनाओं के सदियों के अनुभव, आंकड़े तथा उन पर भारतीय महापुरुषों के सुचिंतित वचन और शिक्षायें, सभी निरपवाद रूप से यही दिखाती हैं. सौ वर्ष पहले गांधीजी ने कहा था कि ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण  कराना ‘दुनिया में अनावश्यक अशांति फैलाना’ है. और अभी साल भर पहले कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने केंद्रीय मंत्री पद से कहा था कि ईसाई मिशनरियों को ‘लक्ष्मण-रेखा’ का ध्यान रख धर्मांतरण कराने वाली प्रवृत्ति छोड़नी चाहिये. यह उन्होंने बिशपों, पादरियों के सम्मलेन में ही कहा था. इनकी तुलना में कृपया विगत सौ साल में कोई ईसाई या मुस्लिम बयान ढूंढें, जिसमें किसी हिंदू द्वारा धर्मांतरण कराने पर चिंता व्यक्त की गई हो! तब स्पष्ट दिखेगा कि धर्मांतरण से पीड़ित समुदाय कौन है.

चूंकि वर्तमान विवाद मुस्लिम समुदाय से जुड़ा है, अत: आधुनिक मनीषी श्रीअरविंद के विचार अधिक प्रासंगिक हैं. उन्होंने वर्ष 1923 में कहा था कि निश्चय ही, हिंदू-मुस्लिम एकता इस आधार पर नहीं बन सकती कि मुसलमान तो हिंदुओं को धर्मांतरित कराते रहेंगे जबकि हिंदू किसी मुसलमान को धर्मांतरित नहीं करायेंगे. इस कथन पर विचार करें तो अभी चल रहा विवाद समझा जा सकता है. सर्वविदित है कि ईसाइयत और इस्लाम अपने सिद्धांत और व्यवहार में धर्मांतरणकारी मजहब हैं. दूसरों को अपने पंथ में जैसे भी हो लाना, उनकी एक बुनियादी टेक है. ऐसी कोई चाह हिंदू धर्म में नहीं है. इसमें तो ‘हम’ और ‘वे’, बिलीवर-अनबिलीवर, क्रिश्चियन-हीथेन, मोमिन-काफिर जैसे विरोध तो क्या, शब्दावली तक का अभिधान नहीं है. यहां तो ‘तत्वमसि’ का दर्शन है. इसीलिये हिंदू धर्म एक साथ कई विश्वासों, मान्यताओं को मानने की छूट देता है, क्योंकि यह कोई मतवादी धर्म-विश्वास है ही नहीं!

अत: यदि संगठित धर्मांतरण  पर चिंता करनी हो, तो सारा उपदेश और तदनुरूप कानूनी बंधन ईसाई और इस्लामी मिशनरियों पर लगेगा, लगना चाहिये. हिंदुओं को इसमें कोई समस्या नहीं. जैसा गांधीजी ने कहा भी था कि यदि उन्हें अधिकार मिल जाता तो वह कानून बनाकर सारा धर्मांतरण  बंद करा देते. क्या ईसाई और इस्लामी नेता भी यह कहने, मानने के लिये तैयार हैं? यदि नहीं, तो वर्तमान प्रसंग में श्रीअरविंद के उक्त कथन का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है. अर्थात् हिंदुओं द्वारा ‘घर वापसी’, यानी ईसाई या मुस्लिम बने हिंदुओं को पुन: हिंदू धर्म में वापस लाना एक जरूरी कार्य है. भारतीय मुस्लिम लगभग सभी के सभी पहले के हिंदू ही हैं, यह तो जिन्ना, गांधीजी से लेकर फारुख अब्दुल्ला तक सभी कहते रहे हैं. इसलिये घर-वापसी का विरोध करना सिद्धांतहीन ही नहीं, हानिकारक भी है.

अत: ‘घर वापसी’ का कार्य हिंदू समुदाय के लिये आत्मरक्षा का जरूरी कर्तव्य है. यह लोकतंत्र और समानता सिद्धांत के अनुरूप भी है. आखिर जो दूसरों का धर्मांतरण  कराना अपना अधिकार समझे, वह दूसरों द्वारा पुनर्धमांतरण  कराने का विरोध कैसे कर सकता है? यह तो विशेषाधिकार का दावा हुआ, जो लोकतंत्र और समानता के विरुद्ध है. हिंदुओं द्वारा ‘घर वापसी’ कराने की निंदा करने से पहले ईसाई और इस्लामी नेताओं को अपने धर्मांतरणकारी सिद्धांतों की खुली भ‌र्त्सना करनी होगी. नहीं तो वह उस घातक पाखंड के सिवा कुछ नहीं, जिसके विरुद्ध स्वामी विवेकानंद ने चेतावनी दी थी. क्योंकि तब उसका अर्थ होगा कि छल-बल-धन, जोर-जबर्दस्ती द्वारा भी हिंदुओं का धर्मांतरण तो होता रहे, पर हिंदू अपने समुदाय-रक्षा के लिये भी कुछ न करें! यह सीधा अन्याय है. सारी चर्चा के केंद्र में यही बात होनी चाहिये. यहां ध्यान रहे कि स्वामी दयानंद सरस्वती ने डेढ़ सौ वर्ष पहले ‘शुद्धि’ आंदोलन चलाया था. यह भय, दबाव आदि से पहले मुसलमान बने हिंदुओं को पुन: हिंदू बनाने का ही कार्यक्रम था. वह एक सफल आंदोलन था, जिसके औचित्य पर कोई सवाल नहीं उठा था. इसलिये यह दोहरे आश्चर्य की बात है कि जो सामाजिक अधिकार हिंदुओं को ब्रिटिश शासन-काल में हासिल था, वह स्वतंत्र भारत में न मिले! डॉ. अंबेडकर ने 1940 में कहा कि मुसलमानों की मांगें हनुमानजी की पूंछ की तरह बढ़ती जाती हैं. इतिहास की इन बड़ी-बड़ी सीखों को जान-बूझ कर, सस्ती राजनीति की मंशा से भुलाया गया है. ताकि गांधी-नेहरू की महानता देश पर थोपी जा सके. अन्यथा धर्मांतरण  के संपूर्ण विषय की सबसे कड़वी सच्चाई ठीक उलटी है. संगठित और छल-बल से धर्मांतरण  कराने के विरुद्ध तो कानून बनना ही चाहिये. यह तो स्वयं गांधीजी की इच्छा थी. उस कानून में जस्टिस नियोगी समिति की सिफारिशों को भी स्थान दिया जाना चाहिये, जिनकी उपयोगिता आज भी यथावत है. दूसरी ओर, हिंदू साधु-संतों द्वारा ‘घर वापसी’ का सहज कार्यक्रम चलाना उदात्त हिंदू दर्शन का लाभ बताकर भारत के गैर-हिंदुओं को स्वैच्छिक रूप से पुन: हिंदू समाज का अंग बनाना हमारे संतों का सबसे बड़ा कर्तव्य होना चाहिये! इसी में राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक एकता की दूरगामी कुंजी है, बल्कि जिहादी आतंकवाद से भी अंतिम मुक्ति का सूत्र इसी में है. जिस मतवाद से सारी दुनिया में आतंकी बन रहे हैं, उससे किसी को मुक्त कर आचरण-परक हिंदू धर्म में लाना शांति-सद्भाव को मजबूत करने का ही दूसरा नाम है.

किसी भी हाल में धर्मांतरण  मुद्दे पर हिंदुओं को घेरने की कोशिश घातक प्रवंचना है, जिससे सावधान रहना चाहिये. यह उलटा चोर कोतवाल को डांटे का ही वृहत रूप है. धर्मांतरण  पर खुली चर्चा जरूरी है. इसमें पोप से लेकर तबलीगी मौलानाओं, इस्लामी किताबों से लेकर हिंदू महापुरुषों की सारी चिंताओं को पूरी तरह सामने लाना चाहिये. इस पर राजनीतिक नहीं, राष्ट्रीय प्रश्न मानकर विचार होना चाहियेए. यह तभी होगा जब विचार का केंद्र हिंदू सगंठनों को नहीं, बल्कि धर्मांतरण मुद्दे को बनाया जाये. इससे कतराना वही बात है, जिसके विरुद्ध स्वामी विवेकानंद ने सावधान किया था.

(लेखक एस. शंकर, वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

 

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