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नंदादेवी राजजात यात्रा के लिये व्यवस्थाओं पर असंतोष

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नई दिल्ली. राज्य सभा सांसद तरुण विजय ने राजजात यात्रा के लिये उत्तराखंड सरकार की व्यवस्थाओं पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा है कि राज्य सरकार का फिर से यह कहना हैरान करने वाला है कि इसमें कम से कम लोग शामिल हों.

सांसद ने कहा, “इस साल भी नंदा देवी राजजात यात्रा  के लिये आवश्यक व्यवस्थायें करने के बजाय पुन: सरकार यह कह रही है कि यात्रा तो हो जायेगी, लेकिन इसमें कम से कम लोग शामिल हों. शायद उत्तराखंड सरकार इस मामले में दुनिया में बेमिसाल है.”

सेक्युलर राजनीति का शिकंजा भारत की हिंदू धार्मिक यात्राओं और प्रतीकों पर भी कसा जाता है. उत्तराखंड में सेक्युलर राजनीति की उपेक्षा के कारण हिंदुओं की एक चौदह सौ वर्ष पुरानी धार्मिक यात्रा  छल और कपट का शिकार हो रही है. यह यात्रा  ‘मां नंदा देवी राजजात’ के नाम से प्रसिद्ध है. 120 किमी लंबी इस यात्रा में हिमालय की अत्यंत दुर्गम चोटियों को पार करते हुए रहस्यमय रूपकुंड के बाद हेमकुंड तक जाना होता है, जो 18 हजार फीट की ऊंचाई पर है. यात्रा 19 दिन में पूरी की जाती है. हर 12 साल बाद होने वाली यह यात्रा 2012 में निश्चित की गयी थी, लेकिन उस वर्ष सरकार की तैयारी नहीं थी. फलत: पंडों और पंडितों की इस घोषणा की आड़ में कि 2012 में मंद मास है, इसलिये यात्रा नहीं की जा सकती, सरकार ने यात्रा स्थगित कर दी.

उसके बाद 2013 में यात्रा का किया जाना तय हुआ, लेकिन 2012 में जिस यात्रा की तैयारी होनी चाहिये थी, सरकार 2013 में भी उसके लिये तैयार नहीं थी. इसलिये केदारनाथ आपदा का बहाना लेकर यात्रा स्थगित कर दी. इस साल भी सरकार ने यात्रा के लिये आवश्यक इंतजाम नहीं किये हैं, अत: पुन: प्राकृतिक कारणों की आड़ में सरकार कह रही है कि यात्रा तो हो जायेगी, लेकिन इसमें कम से कम लोग शामिल हों.

शायद दुनिया में उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार ही ऐसी है, जो अपने प्रदेश में उन लोगों को आने से मना कर रही है, जिनके आने से प्रदेश की अर्थव्यवस्था व गौरव को बल मिलता है. पिछले साल यह यात्रा अगस्त के अंत में होने वाली थी, लेकिन केदारनाथ आपदा के नाम पर पहले कहा गया कि यह यात्रा छोटे रूप में होगी और उसके बाद यात्रा स्थगित करवा दी गयी. इससे पहाड़ की सामान्य धार्मिक जनता को गहरा धक्का लगा. धर्मपुरुष जब सरकार के दरबारी हो जाते हैं, तो आम जनता क्या करे?

अद्भुत काम यह हुआ कि नंदा राजजात का लोकतांत्रीकरण हो गया और यात्रा स्थगन के फैसले को चुनौती देते हुए आम जनता ने नंदा राजजात यात्रा निकाली. पिछले तीन दिन से इस यात्रा  में हिमालय की गढ़वाली व साधारण जनता, जिनमें पहाड़ी स्त्री-पुरुष, वृद्ध-नौजवान अपने सभी परिजनों के साथ 20-20 और 25-25 किलोमीटर पैदल पहाड़ी रास्ते पार करते हुए यात्रा में शामिल हो रहे हैं. यात्रा में नंदा माता की बहुत ही सुंदर डोली सजायी जाती है, जिसे पंडित व ग्रामीण नौजवान कंधों पर उठा कर 125 किमी के लगभग पैदल लेकर चलते हैं. पूर्णाहुति लगभग 18 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित हेमकुंड में होती है. अब इस वर्ष यानी 2014 में नंदा राजजात यात्रा 18 अगस्त से शुरू करने की घोषणा की गई है.

यात्रा में ऐसा लगता है कि हिमालय साथ-साथ चल रहा है. रंग-बिरंगे वस्त्र पहने गढ़वाली और कुमाऊं गहनों से सजी मातायें तथा बहनें साक्षात नंदा देवी का स्वरूप लगती हैं. वे थाली में चावल, हल्दी, सिंदूर, नारियल, पहाड़ी मोटी ककड़ी और रेशमी वस्त्र नंदा देवी को चढ़ाने आती हैं. हजारों की संख्या में लोग लंबी पंक्ति में लग कर नंदा देवी की डोली के सामने अपनी भेंट अर्पित करने की प्रतीक्षा करते हैं. यह अद्भुत आयोजन है जिसका रोमांच यात्रा  में शामिल हुए बिना महसूस कर पाना कठिन है.

चारों ओर हिमालय के कुछ बर्फ और कुछ हरियाली से ढके ऊंचे पर्वत शिखर, उनके ऊपर नंदा देवी का आशीर्वाद बन कर मंडरा रहे सफेद बादलों की छत, पहाड़ों की गोद में बसे पत्थर की स्लेटों की छत वाले सुंदर गढ़वाली मकान और फूलों की डोली से जंगलों के बीच पगडंडियों से गुजरती नंदा देवी की यात्रा, इसके पीछे चल रहे सैकड़ों लोग. बार-बार राज राजेश्वरी नंदा देवी के  जयकारों से वातावरण गुंजायमान हो जाता है. यह दृश्य देखनेवाले जड़-चेतन, पत्थर भी भाव-विभोर हो उठते हैं. इस यात्रा  की तैयारी में लोग एक वर्ष से अधिक समय से से जुटे हैं.

नंदा जब मायके से विदा होती हैं, तो उनके करुणा भरे शब्द हृदय को बींध डालते हैं. भगवती नंदा अपने ससुराल जाते समय पितृ-गृह छोड़ने के असीम कारुण्य में शाप भरे वरदान सौंप रही हैं कि उनके मायके वालों की गोठ में केवल बछड़े ही जन्म लें, भाइयों को केवल पुत्र ही प्राप्त हों, क्योंकि सृष्टि की संपूर्ण नारियों को इसी तरह विछोह का यह असह्य दुख उठाना पड़ता है. नंदा अपने श्वसुर-घर के कष्ट बताती हैं कि वहां तो हमेशा बर्फ का ही ओढ़ना-बिछौना रहता है. यहां कितना सुख है और वहां कितना दुख है.

श्री तरुण विजय के अनुसार राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी मानते हैं कि वे नंदा देवी यात्रा  के आशीर्वाद से ही राष्ट्रपति बने. जब वे वित्त मंत्री थे, तब से इस यात्रा  के सिलसिले में श्री तरुण विजय उनसे संपर्क में थे. उनके प्रयासों से पहली बार यात्रा  के उपलक्ष्य में भारतीय डाक विभाग ने विशेष डाक टिकट और प्रथम दिवस आवरण जारी किया, जिसके लोकार्पण हेतु मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भी आये थे.

श्री तरुण विजय ने क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि इस यात्रा के लिये न तो राज्य के पर्यटन मंत्री ने कुछ किया न राजजात यात्रा की धार्मिक समिति इस महान परंपरा, विरासत तथा हिमालय की देवभूमि की भक्ति प्रधान जनता के साथ न्याय कर पायी. इसके जवाब में जनता ने यहां नंदा देवी राजजात में अखंड यात्रा का इतिहास रचा है. इस यात्रा में कुमाऊं और गढ़वाल से विशेष छंतोलिया (छत्र) तो आयी ही, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की ओर से भी जवान छंतोली लेकर चल रहे थे.

हिमालय के शुभ्र भाल पर जगमगाते दूर का तिलक जैसी यह नंदा देवी राजजात हमारी विविधतापूर्ण संस्कृति, उसके वास्तविक रक्षक भक्ति प्रधान, श्रद्धावान लोगों की जय और विजय का प्रतीक है. वेदनी-बुग्याल में नंदा देवी की स्वयंभू प्रतिमायुक्त प्राचीन मंदिर और नंदा देवी शिखर को देखता सुंदर नंदा सरोवर है. यहां राजजात नंदा देवी की पूजा के बाद जो वातावरण बनता है, उसे देख कर ही महाकवि श्रीधर पाठक ने ये पंक्तियां रची होंगी- ‘यहीं स्वर्ग, सुरलोक, यहीं सुरकानन सुंदर/यहीं अमरन को ओक, यहीं कहूं बसत पुरंदर.’

नंदा गढ़वाल-कुमायूं की इष्ट देवी हैं. गढ़वाल के राजाओं की तो कुलदेवी हैं ही, परंतु कत्यूरी राजाओं ने भी नंदा को अपनी इष्ट देवी माना है. ललित सुर के ताम्रलेख से स्पष्ट होता है कि कत्यूरी राजा नंदा का परम सेवक कहलाने का गौरव अनुभव करते थे. इसीलिये नंदा राजराजेश्वरी के रूप में समस्त गढ़वाल -कुमायूं के हर गांव में पूजी जाती हैं. नंदा, हमारे उत्तराखंड की बेटी, इस यात्रा द्वारा अपने ससुराल यानी कैलाश पर्वत जाती हैं. नंदा की बेटियां गीत गाते हुए कामना करती हैं- सब ओर खुशहाली और सुख फैले. उत्तराखंड में नंदा का आशीर्वाद फले-फूले, इससे ज्यादा और कुछ मांगें भी तो क्या? नंदा देवी हिमालय की स्त्री-शक्ति के संघर्ष, उसके जीवन के सुख-दुख, उसकी सफलता के आनंद और उसकी उदासी में आंसू पोंछने वाली वत्सला मां भी हैं. नंदा का स्वरूप भारत में एक अद्वितीय शक्ति का परिचय देता है.

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