ननूर नरसंहार – वामपंथियों द्वारा किया नरसंहार, जिसके बारे में कोई बात नहीं करता Reviewed by Momizat on . यदि आपसे पूछा जाए कि दुनिया में तानाशाह कितने हुए तो आपका जवाब सबसे पहले हिटलर होगा, फिर शायद मुसोलिनी, फिर शायद कुछ कहेंगे लेनिन या स्टालिन. लेकिन जैसे ही आप ल यदि आपसे पूछा जाए कि दुनिया में तानाशाह कितने हुए तो आपका जवाब सबसे पहले हिटलर होगा, फिर शायद मुसोलिनी, फिर शायद कुछ कहेंगे लेनिन या स्टालिन. लेकिन जैसे ही आप ल Rating: 0
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    ननूर नरसंहार – वामपंथियों द्वारा किया नरसंहार, जिसके बारे में कोई बात नहीं करता

    यदि आपसे पूछा जाए कि दुनिया में तानाशाह कितने हुए तो आपका जवाब सबसे पहले हिटलर होगा, फिर शायद मुसोलिनी, फिर शायद कुछ कहेंगे लेनिन या स्टालिन. लेकिन जैसे ही आप लेनिन, स्टालिन, फिदेल कास्त्रो, माओ ज़ेडोंग जैसे नाम लेंगे कुछ लोगों की भौहें तन जाएंगीं. वे आपसे इन नामों पर बहस भी करने लगेंगे. क्रांति के नाम पर अपनी ही जनता पर तानाशाही करने वाले लेनिन, स्टालिन, कास्त्रो, माओ को आज भी भारत के कुछ लोग अपना वैचारिक पुरुष मानते हैं.

    इसी तरह जब दुनिया और भारत में हुए नरसंहारों की बात की जाती है तो यहूदियों को मारे जाने की बात जरूर बताई जाती है. लेकिन कम्युनिस्ट क्रांति की आड़ में किए गए पैशाचिक कृत्य को भुला दिया जाता है. भारत की बात करें तो बुद्धिजीवियों का एक विशेष वर्ग आज मॉब लींचिंग की बातें कर रहा है, फासीवादी जैसे शब्दों का उपयोग कर रहा है, लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी हैं जिसका वह नाम भी नहीं लेना चाहता.

    ऐसी ही एक घटना है ननूर की. ननूर में हुए नरसंहार की. कश्मीर से लेकर बस्तर में जवानों की नक्सल- आतंक विरोधी कार्यवाही को भी नरसंहार कहने वालों ने इस नरसंहार को कभी बताने की कोशिश नहीं की.

    हम बताते हैं कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा किए गए एक नरसंहार की कहानी. सन् 2000, पश्चिम बंगाल का बीरभूम जिला जो सीपीएम (मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) का प्रमुख गढ़ माना जाता था. एक गांव ननूर थाने के अंतर्गत आता है. यहां मुख्यतः दलित, जनजाति और मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं. इन्हीं समुदायों के बीच से 11 लोगों की हत्या कर दी जाती है. दरअसल यह हत्या नहीं थी, यह वामपंथ का वह पैशाचिक कृत्य था जो उसके पुरोधाओं ने विरासत में उन्हें दिया था.

    इन 11 स्थानीय ग्रामीणों के नरसंहार की वजह थी “वैचारिक मतभिन्नता”. कम्युनिस्ट पार्टी के विचार से भिन्न राय रखने की वजह से निचली जातियों के 11 अत्यंत गरीब ग्रामीणों की कम्युनिस्ट पार्टी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मिलकर हत्या कर दी.

    सत्ता में होने का फायदा उठाकर तत्कालीन कम्युनिस्ट पार्टी सरकार ने इसे नरसंहार मानने से इंकार कर दिया, और तो और मृतक ग्रामीणों को डाकू होने का आरोप लगाया और जनता को दिग्भ्रमित करने की नाकाम कोशिश की.

    ननूर के सांसद सोमनाथ चटर्जी जो स्वयं कम्युनिस्ट पार्टी से थे, उन्होंने कहा था कि “मारे गए लोग खरीदे हुए गुंडे थे, वे डाकू और असामाजिक तत्व थे.”

    पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने भी इस नरसंहार के सामान्यीकरण करने की भरपूर कोशिश की. उन्होंने इस घटना के बाद कहा था कि “कम्युनिस्ट पार्टी के भी सैकड़ों कार्यकर्ताओं को मारा गया है. कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को आत्म-सुरक्षा का पूरा अधिकार है.” ऐसा कहकर वो कहीं ना कहीं कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा किए गए अत्याचार पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन इसके बाद कुछ रिपोर्ट्स आईं, जिसके बाद कम्युनिस्ट सरकार को यह मानना ही पड़ा कि वह भूमिहीन स्थानीय किसान थे और उनका नरसंहार किया गया.

    इस नरसंहार में शामिल वामपंथी अपराधियों को बचाने की जी-तोड़ कोशिश की गई. देश के स्वघोषित लिबरल और लोकतंत्र का लबादा ओढ़े बुद्धिजीवियों ने इस घटना को ऐसे अनदेखा किया, मानो वहां कुछ हुआ ही नहीं.

    घटना के मुख्य गवाह पर भी वामपंथी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने हमले किए. 12 मई 2005 को मुख्य गवाह अब्दुल ख़ालिक़ और उसके सुरक्षा गार्ड जहांगीर आलम पर सीपीएम के नेताओं ने जानलेवा हमला किया. इस हमले के आरोप में 4 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया.

    नरसंहार के गवाह पर हमले की खबर पर एक निजी समाचार पत्र  ने अपने संपादकीय में लिखा था कि “मुख्य गवाह पर हमले की असली वजह यही थी कि किसी भी तरह से जुलाई 2000 में हुए ननूर नरसंहार के आरोपियों को बचाया जा सके. यह विडंबना ही है कि नरसंहार के 5 साल बाद भी आरोपी कॉमरेड पर कोर्ट ट्रायल शुरू नहीं हुआ है.

    इस नरसंहार पर जब ट्रायल शुरू किया गया तो कुछ समय पहले से ही वामपंथी कार्यकर्ताओं और नेताओं ने ननूर में भय का माहौल बनाना शुरू कर दिया. गवाहों को प्रभावित करने से लेकर पूरे गांव को हिंसक तरीके से डराने का काम चलता रहा.

    इस नरसंहार में कुल 82 लोगों को चार्जशीट में आरोपी बनाया गया था. 10 साल तक चले ट्रायल में 10 आरोपियों की मौत हो गई, वहीं 5 वामपंथी आरोपियों को पुलिस पकड़ने में नाकाम रही. 2010 में आए फैसले में 44 वामपंथी अपराधियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.

    तथाकथित उदारवादी-सुधारवादी बुद्धिजीवियों का समूह समाज में यह विभ्रम फैलाता कि “फासीवादी” ताकतें आज सत्ता में हैं. लेकिन यही समूह आपको कभी नहीं बताता कि मात्र विचारों में मतभेद होने की वजह से कैसे एक विचाधारा के सिपहसालार नरसंहार तक कर देते हैं. इन लोगों को यह बात अब समझ आ ही नहीं रही कि जिन मीडिया-मुग़लों के साथ मिलकर वह अपना कारोबार चला रहे हैं, उसे जनता देख भी रही है और समझ भी रही है.

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