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नरसंहार का भय और लूट का साम्राज्य

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पूरा विश्व इस समय बीस वर्ष पूर्व हुए दस लाख लोगों के नरसंहार की दुखद स्मृति में डूबा है. रवांडा में वह नरसंहार 7 अप्रैल 1994 से शुरू होकर 17 जुलाई तक चला था. दुनिया का इससे जितना संबंध है, भारत का उससे अधिक है, क्योंकि अंग्रेजों द्वारा उस देश में घुसपैठ से लेकर भारत में आर्य-अनार्य विवाद, मोहनजोदड़ो, पाकिस्तान निर्माण एवं उस देश में लगातार अशांति फैलाना, इनमें से हर एक मामले में भारत एवं रवांडा का इतिहास एक समान ही है.

‘ब्रेकिंग इंडिया’ पुस्तक के एपेंडिक्स खण्ड में यह विषय लिया गया है. समानता एक और बात में थी. भारत की स्वतंत्रता के चालीस वर्ष के बाद इस क्षेत्र में सिंहली-तमिल समुदायों के लगभग दो लाख लोगों का नरसंहार कराया गया और उधर रवांडा में उसकी स्वतंत्रता के 32 वर्ष बाद दस लाख लोगों का नरसंहार कराया गया. नरसंहार की दृष्टि से यह बहुत बड़ा आंकड़ा है अर्थात् यह मामला संयोग से घटने वाली घटनाओं जैसा नहीं है. बल्कि दुनियाभर के करीब सौ देशों में जिस तरह पिछले 500 वर्ष तक बायबिल के आधार पर आर्य-अनार्य विवाद तथा विवादों के अन्य विषय उभारकर यूरोपीय लोगों ने लूट मचाई, वही माजरा आज नहीं तो कल, कुछ सदियों तक के लिये फिर से शुरू किया जा सके, ऐसी साजिश रची जा रही है. जहां यूरोप की सत्ता रही वहां के सत्ताधारियों एवं चर्च वालों के आक्रामक कामों में केवल विवरणों को छोड़ दें तो बाकी सभी मुद्दे समान हैं. इसलिये भारत की दृष्टि से रवांडा की घटना गंभीर है.

यद्यपि रवांडा के संदर्भ में आरोप की दिशा अंग्रेजों और चर्च की ओर है, लेकिन हर देश की कथा अलग ही होती है. आमतौर पर पश्चिमी विश्वविद्यालयों की सहायता से उन उन देशों में सामाजिक, सांस्कृतिक, नस्लीय तथा भाषायी स्तरों पर खाई पैदा करना इसमें पहला चरण माना जाता है. इसलिये साजिश रचने वालों द्वारा पहले स्थानीय संस्कृति का बारीकी से अध्ययन किया जाता है. चर्च और उस देश पर राज करने वाला देश संयुक्त रूप से इसकी संरचना तय करते हैं एवं उसके अनुसार अमल किया जाता है. सभी जगह समान दिखने वाली बात यानी उस संबंधित स्थान पर आर्य-अनार्य विवाद होता है. संदेश दिया जाता है कि पूरी दुनिया का इतिहास यूरोप से शुरू होता है एवं उसी के आधार पर उन्हें दुनिया को जीतने तथा लूटने का अधिकार है. यूरोप में इस विवाद को ‘सेमेटिक – हेमेटिक वाद’ कहते हैं. उसकी मूल कथा पर सार्वजनिक चर्चा नहीं की जाती.

बाइबिल में इस विवाद के संबंध में जो कथा है, वह संक्षिप्त में कुछ इस प्रकार है कि ‘ईसा मसीह से कुछ हजार वर्ष पूर्व ‘नोहा’ नामक एक व्यक्ति पूरी दुनिया को लील लेने वाली प्रलय से बच गया. बाद में कहते हैं, उसी ने पूरी पृथ्वी की रचना की. एक बार जब वह शराब पीकर घर से बाहर निर्वस्त्र हालत में निकला तब उसके बेटे हेम ने उसे देखकर उसकी हंसी उड़ाई. तभी उसके दूसरे बेटों सेम और जेफेथ ने अपने कपड़े अपने पिता को पहनने को दिये. इस पर नोहा ने हेम को श्राप दिया, ‘वह दक्षिण की ओर जायेगा और उसकी संतानें अश्वेत होंगीं, जिन्हें सेम तथा जेफेथ की संतानों की सेवा करनी पड़ेगी.’ यूरोपीय इसी के आधार पर अफ्रीका के लोगों का नरसंहार करना एवं उनको गुलाम बनाना अपना हक मानते हैं.

पिछले 150 वर्ष में यूरोप वालों ने पूरे विश्व का इतिहास इस कहानी पर आधारित कराया है. इसी से भारत में यह झूठ प्रचारित कराया गया कि ‘आर्य यूरोप से आये’. लंबे समय तक पूरी दुनिया पर यूरोपीय लोगों की सत्ता रहने के कारण सब जगह ऐसा ही इतिहास पेश किया गया. विश्व में अंग्रेजों की मुख्य सत्ता के साथ साथ जहां-जहां यूरोप वालों की सत्ता थी, वहां-वहां यही इतिहास पाठ्यक्रमों में भी जोड़ा गया. यूरोप वालों के चले जाने के बाद भी अंग्रेजों के वर्चस्व के कारण विभिन्न देशों में यही इतिहास कायम रहा. कुछ जगहों पर स्थानीय आवश्यकता के अनुसार उसमें मामूली बदलाव किया गया. भारत में उसका स्वरूप आर्य-अनार्य विवाद बना, वहीं श्रीलंका में उसका स्वरूप तमिल-लेम्युरिया विवाद है.

यूरोपीय युवाओं द्वारा दुनिया में लूट मचाने की शुरुआत कोलंबस ने सन् 1492 में की थी. भारत में उसकी शुरुआत सन् 1498 में हुई. धीरे-धीरे शक्तिशाली यूरोपीय देशों ने उसमें अपना दबदबा बढ़ाया. इस लूट में समन्वय रहे और संबंधित देशों में प्रशासन भी चलाया जा सके- इसके लिये इन देशों की आवश्यकता के अनुसार कंपनियां स्थापित की गईं. भारत में यह काम ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया. अफ्रीका के लिये इसी तरह की कुछ व्यवस्था की गई एवं बाद में उसे ब्रिटिश-साउथ अफ्रीका कंपनी बनाया गया. स्वाभाविक रूप से कुछ समय बाद उन देशों की सत्ता वहां स्थापित हुई. इस सबका मकसद लूट करना ही था, फिर भी दुनिया को दिखाने के लिये कुछ आड़ लेनी पड़ती है.

यह सारा घटनाक्रम 19वीं सदी के मध्य में आरंभ हुआ. मैक्सम्युलर ने वेदों और उपनिषदों के अध्ययन से एक बात स्पष्ट की कि यूरोप में जो संस्कृति नामक चीज है, वह वैदिक संस्कृति से आई है, लेकिन 200-300 वर्ष तक विश्व की लूट के चलते संपन्नता के आदी हो चुके यूरोपीय लोगों को यह इतिहास रास नहीं आया. मैक्सम्युलर ने भी बाद में आर्य संस्कृति को ‘आर्यवंश’ का नाम देकर अपने ही विधान को झुठला दिया. इस बारे में अफ्रीका की कहानी कुछ इस प्रकार है- नेपोलियन द्वारा 1798 में मिस्र पर आक्रमण करने के बाद ‘वहां के मूल लोग कौन थे’ इस पर शोधकार्य शुरू हुआ. मिस्र निवासी यूरोपीय लोगों की तुलना में काले थे, लेकिन दक्षिण के लोगों से उनका रंग थोड़ा साफ था. इसलिये उनके शारीरिक रंग के अनुसार उनका ‘हेमेटिकपन’ निश्चित किया गया. उन्हें ‘निग्रोइड’ कहकर चिढ़ाया जाने लगा. उस दौरान अफ्रीका में यूरोपीय लोगों का साम्राज्य स्थिर हो चुका था.1867 में रोडेशिया यानी आज के जिंबाब्वे में एक पुरातन शहर मिला था. उस के आधार पर, यह सोचकर शोधकार्य शुरू किया गया कि उसका निर्माण उत्तर की ओर के लोगों ने ही किया था. वहां शहर मिलने की घटना के बाद वहां की ब्रिटिश सरकार अधिक चौकन्नी हो गई. उस समय के मीडिया पर पाबंदी लगाई गई. स्कूली पुस्तकों एवं अन्य सरकारी दफ्तरों में भी इस शहर का निर्माण यूरोपीय लोगों द्वारा किया बताया गया. इस शहर की देखभाल करने वाले एक पुरातत्वविद पॉल सिंच्लेर का कहना था कि इस बारे में कुछ भी बोलने पर बाहर निकाल देने की धमकी दी जाती थी.

इस पूरे अफ्रीका कांड में ब्रिटिश मानव-विज्ञानशास्त्री सी. जी. सेलिग्मन की भूमिका महत्वपूर्ण है. मिस्र से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक विभिन्न अश्वेत अफ्रीकी लोगों में से ‘कौन कितना हेमेटिक है’ इस पर उसने शोधकार्य किया. उसका लाभ स्वाभाविक रूप से ब्रिटेन को हो रहा था. सेलिग्मन की दूसरी विशेषता यह थी कि श्रीलंका में भी उसने ही काम किया था और यह फैलाया कि तमिल-सिंहली का संबंध लेम्युरिया से है. इस काम के लिये ब्रिटेन में उसका बड़ा सम्मान हुआ़, उसके इस काम के बारे में अफ्रीका के एक विचारक पीटर रिग्बी का कहना था कि इसके कारण पूरे अफ्रीका में एक दूसरे को संदेह से देखना शुरू हुआ, पूरा अफ्रीका अलग-अलग जातियों में बंट गया.

रवांडा मामले की बात करें तो अनेक देशों एवं करोड़ों लोगों के संदर्भ में चर्च की भूमिका पर दृष्टि जाती है, उन देशों यानी ब्रिटेन, पुर्तगाल आदि पर नजर जाती है. इससे एक असमंजस पैदा होता है. रवांडा की घटनाओं का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है, क्योंकि वहां अंग्रेजों की सत्ता थी और वे वेटिकन की मदद लेते समय कई बार सोचते हैं. तुलनात्मक रूप से एंग्लिकन चर्च की मदद उनके आदेश के अनुसार ही मिलती है. लेकिन रवांडा की व्यापकता काफी है, वहां वेटिकन चर्च ने जो भूमिका अदा की, वह ब्रिटिशों की हमेशा की नीति-बांटो और राज करो-से अलग नहीं थी. रवांडा में मौलिक विभाजन कराने के बाद वहां स्विस बिशप आंद्रे पेरुदिन की नियुक्ति की गई. वास्तव में यह व्यक्ति सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में मान्यता प्राप्त था.’कबगायी’ नामक महत्वपूर्ण प्रदेश में बिशप के तौर पर उसकी नियुक्ति होने के बाद चर्च का दृष्टिकोण पहले वाला नहीं रहा. एक तरफ लोगों को लगता रहा कि अब सबकी समझ में आने वाला कोई मार्ग सामने आयेगा, लेकिन उसी समय चर्च ने आक्रामक रुख दिखाना शुरू कर दिया था.

दस लाख लोगों का संहार कोई छोटा मुद्दा नहीं है, लेकिन आज बीस वर्ष गुजर जाने के बाद भी इस पर ज्यादा नहीं लिखा गया. कहने के लिये केंब्रिज विश्वविद्यालय प्रेस द्वारा प्रकाशित बोस्टन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर टिमोथी लोंगमैन की पुस्तक ‘क्रिश्चियेनिटी एण्ड जीनोसाइड ऑफ रवांडा’ प्रकाशित हुई है. इसमें लेखक का स्पष्ट मत है कि ईसाई चर्च ने उपनिवेश के लिये प्रसार की जो नीति अपनाई है, वही इस नरसंहार का मूल कारण है. चर्च ने ही दूसरी विचारधारा के लोगों के शोषण की सोच का प्रसार करना शुरू किया.

स्वयं के इस सभी से दूर रहने का दिखावा करने का सतत प्रयास किया, लेकिन रवांडा नरसंहार के दौरान उसकी असली भूमिका छिपी नहीं रही. इस नरसंहार के लिये आवश्यक सारी सामग्री की आपूर्ति चर्च ने ही की. अब दुनिया पर यूरोपीय लोगों का वर्चस्व समाप्त हो चुका है, तब भी पिछली चार-पांच सदियों में दुनिया को गुलाम बनाने एवं भारी लूट मचाने की उसकी लत छूटी नहीं है. इसीलिये नरसंहारों के द्वारा लोगों में डर पैदा करने के प्रयास अब भी जारी है.

-मोरेश्वर जोशी

 

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