पाकिस्तान की रिंकल कुमारी के आंसू क्यों नहीं दिखते…!!!!! Reviewed by Momizat on . पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भागकर भारत आने वाले हिन्दुओं, पारसी, सिक्खों आदि के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक की आवश्यकता क्यों है, इसे समझने के लिए ला पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भागकर भारत आने वाले हिन्दुओं, पारसी, सिक्खों आदि के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक की आवश्यकता क्यों है, इसे समझने के लिए ला Rating: 0
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    पाकिस्तान की रिंकल कुमारी के आंसू क्यों नहीं दिखते…!!!!!

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    पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भागकर भारत आने वाले हिन्दुओं, पारसी, सिक्खों आदि के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक की आवश्यकता क्यों है, इसे समझने के लिए लाखों पीड़ितों की व्यथित करने वाली आपबीतियां हैं. इनमें से एक कहानी है – इस्लामी रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान की नागरिक, एक हिन्दू युवती रिंकल कुमारी की. रिंकल की कहानी पाकिस्तान के इस्लामी शासन में सात दशकों से पीसे जा रहे हिन्दुओं की बेबसी की कहानी है. इस कहानी के खलनायकों में मज़हबी नेता, सियासतदान, पुलिस, प्रशासन और पाकिस्तान की अदालतें शामिल हैं.

    पाकिस्तान के सिंध प्रांत के मीरपुर मठेलो की रिंकल कुमारी, एक मासूम लड़की. प्राइमरी विद्यालय के अध्यापक नंदलाल की ये 17 वर्षीय बेटी 24 मार्च 2012 को अगवा कर ली गई. मां-बाप बदहवास होकर उसे ढूंढते रहे. जब कुछ समझ नहीं आया तो थाने पहुंचे. हिन्दुओं की पाकिस्तान में कोई सुनवाई नहीं है, ये वहां की पुलिस भी बखूबी समझती है, इसलिए उन्हें वहां से भगा दिया गया. आखिरकार शहर के हिन्दुओं ने मिलकर आन्दोलन किया, और दुनियाभर में खबर बनने लगी, तब जाकर पुलिस ने लड़की के गुमशुदा होने की रिपोर्ट दर्ज की.

    उसके बाद रिंकल के पिता के पास एक फोन आया. फोन था, बरचंदी दरगाह के पीर, अब्दुल हक़ उर्फ़ मियां मिठ्ठू के बेटे का. जिसने नंदलाल को बताया कि रिंकल ने दरगाह में आकर इस्लाम क़ुबूल कर लिया है, और जावेद नामक मुस्लिम से विवाह कर लिया है. रिंकल का नया नाम बीबी फरयाल बताया गया. मियां मिठ्ठू मज़हबी नेता, पाकिस्तान पीपल्स पार्टी का सांसद और सैकड़ों हिन्दू बच्चियों को गायब करवाने के लिए कुख्यात है. नाबालिग रिंकल को जबरदस्ती दरगाह में बंधक बनाकर रखा गया. माता-पिता बेटी को वापस सौंपने की मिन्नतें करते रहे. हिन्दू पंचायत और जिए सिंध के नेता रियाज़ चान्दियो के लगातार आन्दोलन के बाद मामला अदालत तक पहुंचा. 12वीं की छात्रा रिंकल को अदालत में लाकर उसके निकाह के कागज़ प्रस्तुत किये गए, लेकिन रिंकल ने अदालत में रोते हुए कहा कि उसे अगवा करके उसका जबरदस्ती निकाह करवाया गया है, और वो अपने माता-पिता के पास, अपने घर जाना चाहती है. तब उसके जबरन बनाए गए पति जावेद शाह ने बेहोश होने का नाटक किया, और अदालत ने, जो मियां मिठ्ठू के कहने पर चल रही थी, सुनवाई को स्थगित कर दिया. रोती हुई रिंकल को उसके माता-पिता को सौंपने के स्थान पर पुलिस को सौंप दिया.

    पुलिस के संरक्षण में रिंकल को धमकी दी गई कि यदि उसने जावेद के साथ रहने से इनकार किया तो उसके माता-पिता और आस-पास के दूसरे हिन्दू परिवारों को मारकर दफना दिया जाएगा. रिंकल जानती थी कि ये कोरी धमकी नहीं थी. पाकिस्तान में हिन्दुओं की हत्या होना, अगवा होना, उन्हें गुलाम बनाकर बंधुआ मजदूरी करवाना, ये सब आम बात है. कुछ ही महीनों पहले चार हिन्दू डॉक्टरों की हत्या कर दी गई थी, और पुलिस ने चालान भी प्रस्तुत नहीं किया था क्योंकि हत्यारा पाकिस्तान पीपल्स पार्टी शिकारपुर का अध्यक्ष था.

    अगले दिन रिंकल को फिर अदालत में प्रस्तुत किया गया. पुलिस ने अदालत को जाने वाली सड़कों को बंद कर दिया, और अदालत तक जाने वाले हिन्दू समुदाय को क़ानून व्यवस्था के नाम पर अदालत जाने से रोक दिया गया, लेकिन मियां मिठ्ठू के लोगों को दर्जनों खुली जीपों में बंदूकें और दूसरे हथियार लहराते जाने दिया गया. अदालत में रिंकल का मामला चल रहा था, लेकिन वहां उसके एक भी रिश्तेदार को उपस्थित रहने की अनुमति नहीं थी, लेकिन अदालत में और उसके बाहर जावेद और मियां मिठ्ठू के लोग उपस्थित थे. हवाई फायर किये जा रहे थे. लाउडस्पीकर पर आयतें और तकरीरें सुनाई जा रही थीं. अदालत का समय 9 बजे था, लेकिन 7:45 पर ही बयान दर्ज किये जाने लगे. इस माहौल में, प्रारम्भिक विरोध के बाद रिंकल आखिरकार टूट गई. तब अदालत ने फैसला सुनाते हुए रिंकल उर्फ़ फरयाल को अपने पति जावेद शाह के साथ जाने की “इजाज़त” दे दी.

    रिंकल के मामले को लेकर पूरे पाकिस्तान में हिन्दू समाज सड़कों पर उतर आया. धरने प्रदर्शन किए गए. तब मामला सिंध हाईकोर्ट में आया. उसी समय दो अन्य हिन्दू लड़कियों, आशा कुमारी और डॉ. लता का मामला भी साथ में पेश हुआ. आशा कुमारी उस समय तक बरामद नहीं हुई थी. लता और रिंकल ने अपने साथ हुए अन्याय के बारे में बयान दिए. रिंकल ने बताया कि उसे जबरन इस्लाम क़ुबूल करवाया गया, और जब उसने विरोध किया तो उसे बुरी तरह मारा-पीटा गया और उसके साथ दुष्कर्म किया गया. अदालत में भी उसे मियां मिठ्ठू के महिला समूह ने घेर रखा था. उसके कान में जबरदस्ती ब्लूटूथ डिवाइस लगाई गई थी, जिस पर उसे लगातार धमकाया जा रहा था.

    हाईकोर्ट ने रिंकल और डॉ. लता को सर्वोच्च न्यायालय में पेश करने का निर्देश दिया. इस बीच उसे महिला शरणार्थी गृह में रहना था. बाहर मुस्लिम संगठनों ने हिन्दुओं को खुलेआम धमकाना शुरू कर दिया कि ‘यदि रिंकल को जावेद के पास वापस नहीं भेजा गया तो चार और हिन्दू लड़कियों को अगवा करके उनका निकाह करवा दिया जाएगा….’ ये धमकी वहां के प्रमुख समाचार पत्र आवामी लीग में छपवाई भी गई. नहीं मानने पर रिंकल को भी मौत के घाट उतारने की धमकी दी गई क्योंकि चाहे जैसे भी हो “एक बार जिसने इस्लाम क़ुबूल कर लिया वो इस्लाम नहीं छोड़ सकता…..” और “इस्लाम छोड़ने वाले की सजा मौत है…..” 26 मार्च को रिंकल कुमारी और लता को सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी के सामने पेश किया गया. दोनों लड़कियों ने कहा कि वो अपने माता-पिता के साथ जाना चाहती हैं, लेकिन न्यायाधीश ने कहा कि “दोनों लड़कियों को अपने भविष्य के बारे में सोचने के लिए और समय चाहिए” और एक बार फिर उन्हें उनके परिवार के पास न भेजकर महिला शरण गृह भेज दिया. रिंकल ने अदालत से कहा कि वो शरण गृह नहीं जाना चाहती, क्योंकि वहां उसे धमकाया और उत्पीड़ित किया जाता है. हिन्दू समाज ने भी इसका विरोध किया, लेकिन भारी सशस्त्र बल के साथ दोनों लड़कियों को कराची के महिला शरण गृह भेज दिया गया. बाहर निकलते हुए रिंकल ने मीडिया से कहा कि अदालत से लेकर पुलिस तक सब मिले हुए हैं, और पाकिस्तान में हिन्दुओं को न्याय मिलना संभव नहीं है.

    रिंकल की बात सही साबित हुई. पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने न तो दोनों लड़कियों के बयान दर्ज किये और न ही उनके वकीलों को बोलने का मौक़ा दिया. उनके अपहरणकर्ताओं द्वारा अदालत में पेश किये गए इस्लाम क़ुबूल करने और निकाह के कागजों को सही साक्ष्य मानते हुए रजिस्ट्रार के पास भेज दिया. वहां रिंकल से जबरदस्ती हताक्षर करवा लिए गए कि वह जावेद के साथ रहना चाहती है. बाद में तीसरी लड़की आशा कुमारी को भी पुलिस ने बरामद कर लिया और घोषणा की कि तीनों लड़कियों ने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूला है और निकाह किया है.

    ऐसी एक-दो नहीं, हजारों रिंकल खून के आंसू बहाती अपनी जिंदगी के बोझ को ढो रही हैं. इन लोगों का भारत के अलावा और कहीं भविष्य नहीं है. ये लोग आज तक भारत विभाजन की त्रासदी झेल रहे हैं. पाकिस्तान और बांग्लादेश के ये सताए गए लोग, मुस्लिम न होने की सजा भोग रहे हैं. इनके लिए ही आवश्यक है – नागरिकता संशोधन बिल. इस बिल को मुस्लिम विरोधी बताकर जो तमाशा छद्म सेकुलर नेताओं ने खड़ा किया है, वो लोगों की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास है. विधेयक में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, ईसाई और पारसी शरणार्थियों को नागरिकता देने संबंधी प्रावधान किए गए हैं, क्योंकि इन देशों के इस्लामी कट्टरपंथियों और शासन- प्रशासन- पुलिस द्वारा इन लोगों पर अमानवीय अत्याचार किया जा रहा है.

    प्रशांत बाजपई

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