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पालघर हत्याकांड – ६

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विकास का विरोध करने के लिए जनजातियों का उपयोग

वामपंथी विचार जनजतियों को बना रहा हिंसक

एपीजे अब्दुल कलाम जी ने कहा है, भारत २०२२ तक महासत्ता बन जाएगा. महासत्ता बनने के दृष्टिकोण से भारत काम कर रहा है. विकास के लिए कॉरिडोर, एअरपोर्ट जैसे प्रकल्प आवश्यक हैं. पालघर जिले से एक कॉरिडोर गुजरता है, बुलेट ट्रेन का प्रकल्प भी चल रहा है. किन्तु आज जनजाति युवा इन प्रकल्पों का विरोध कर रहे हैं. आज इन प्रकल्पों के कारण पालघर के जनजातियों की जमीन अधिग्रहित की जा रही है. वास्तव में केवल पालघर के जनजातियों की ही नहीं, बल्कि जहाँ-जहाँ से बुलेट ट्रेन का मार्ग जा रहा है, उन सभी जगहों पर जमीन का अधिग्रहण हो रहा है. परन्तु पालघर जिले के जनजातियों में जमीन का प्रश्न उठाया गया और युवाओं को भड़काया गया. क्या प्रशासन केवल जनजातियों की जमीन हाथ में लेकर प्रकल्प पूरा कर रहा है? क्या उसे दूसरी जगह जमीन नहीं मिल रही? ऐसे प्रश्न कम्युनिस्टों द्वारा युवाओं के मन में भरे जा रहे हैं. विकास का विरोध करना यह वामपंथियों की आदत है. कम्युनिज्म, मार्क्सवाद के विचार उनके द्वारा जनजातियों के मन में भरे जा रहे हैं.

कॉरिडोर के लिए कुछ जनजातियों की जमीन हासिल कर ली गयी है. कुछ लोगों को उसके पैसे भी मिल रहे है. अनेकांश जनजातियों को इस कॉरिडोर का लाभ क्या होने वाला है, इसकी जानकारी देने के बदले उन्हें विरोध करने के लिए कम्युनिस्टों द्वारा भड़काया जा रहा है. लोगों को इकठ्ठा करना, उनको भड़काना, हमारी जमीन लेकर फसाया जा रहा है, ऐसा बारबार कहकर भ्रमित करना, ऐसे प्रयास इन लोगों द्वारा किए जा रहे हैं. विकास का भी विरोध और राष्ट्रीय विचारों के संगठनों का भी विरोध, ये दोनों प्रयास इन लोगों द्वारा किये जा रहे हैं.

तक़रीबन 50 वर्ष पहले पालघर जिले में वनवासी विकास प्रकल्प की शुरूआत हुई. यह जनजातियों के शैक्षणिक विकास के लिए तैयार किया गया एक महत्वपूर्ण शिक्षा प्रकल्प है. जनजाति समाज का शिक्षार्थी यहां आकर शिक्षित और संस्कारित हो रहा है. ये विकास, जनजातियों की शिक्षा का प्रयास वामपंथियों को पसंद नहीं था. जनजाति शिक्षार्थी अगर पढ़कर सुशिक्षित, सुसंस्कारित हुआ तो वह हमारे पीछे नहीं आएगा, हम जो कहेंगे वह नहीं सुनेगा, यह उनको पता था. इसीलिए 1991 में तलासरी गाँव के इस प्रकल्प पर हमला हुआ. विरोध करने वाले वामपंथियों ने ही यह हमला किया. कुछ दिन पहले दो संतों पर हुआ हमला और उस हमले में बड़ी निर्ममता से की गयी हत्या भी इसी मानसिकता के कारण हुई है. जहाँ पर हत्या हुई वह क्रिश्चियन बहुल क्षेत्र है. अगर साधुओं की जगह कोई मिशनरी होता तो यह हत्या नहीं होती. इस परिसर में बस्तियों (जनजाति परिभाषा में ‘पाडा’) जगह-जगह पर क्रिश्चियन प्रार्थना स्थल हैं. यहाँ के जनजाति मिशनरीज को जानते हैं, मानते हैं. इसी कारण साधुओं की जगह मिशनरीज की हत्या बिलकुल नहीं होती. हिन्दू विचारों के लोग होने के कारण ही साधू और उनके वाहनचालक की हत्या हुई.

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