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पुण्य तिथि 21जून, डॉ हेडगेवार – संघ संस्थापक का विलक्षण व्यक्तित्व

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संघ का विकास कर हिन्दू राष्ट्र को अपने बल और वैभव के साथ पुनः एक बार विश्व में शीर्षस्थान प्राप्त कराने की महत्त्वाकांक्षा से ही डॉक्टर हेडगेवारजी ने भगवान् की दी हुई सम्पूर्ण शक्तियों को बटोरकर अपने जीवन की रचना और सब प्रयत्न किये थे. उस कार्य के हेतु वे बीच-बीच में बाहर दौरे पर जाते थे पर प्रत्येक प्रवास के पश्चात् कुछ दिन संघ के केन्द्र नागपुर में अवश्य रहते. उनके दिन-प्रतिदिन के व्यवहार में किसी ने काकदृष्टि से देखा तो भी स्वार्थभाव का लव मात्र भी ढूँढ़े नहीं मिलेगा. जिस प्रकार संन्यासी अपना श्राद्ध करके चलता है, उसी मनोवृत्ति से प. पू. डॉक्टरजी जीवन में व्यवहार करते थे. उनके शरीर पर संन्यासी के भगवे वस्त्र नहीं थे तथा उन्होंने समाज के लौकिक व्यवहारों का भी परित्याग नहीं किया था, किन्तु इसमें शंका नहीं कि उनका अन्तरंग देह-गेह को भुलाकर पूर्णतः हिन्दुराष्ट्रमय हो गया था. वे ब्रह्मचारी थे, पर उन्होंने इस विषय में भी लोगों के सामने ऐसा रूप नहीं रखा मानो वे कोई अलौकिक बात कर रहे हों. उन्होंने प्रारम्भ से ही तथा विचारपूर्वक यही कार्यपद्धति स्वीकर की थी कि समाज में रहते हुए सामान्य व्यक्तियों के समान व्यवहार कर उनके जीवन के साथ समरस होकर उसमें परिवर्तन किया जाये. उन्होंने समाज में रहते हुए अन्य लोगों का यह अनुभव देख लिया था कि बाह्य व्यवहार में विशेषता, वेश तथा रहन-सहन में अलौकिकता लायी तो आर्थिक एवं शारीरिक दृष्टि से अत्यधिक दुर्बल लोग उनकी चेलागीरी शुरू कर देते हैं तथा उनसे यह भी नहीं छिपा था कि ये भक्तगण अपने गुरु के गुणों का अनुकरण करने के स्थान पर दिन-प्रतिदिन मन से अधिकाधिक परावलम्बी एवं सत्वहीन बनते जाते हैं. डॉक्टरजी को तो हिन्दुस्थान के ऐहिक जीवन को ऐश्वर्य एवं सम्पन्नता से समृद्ध करनेवाले बुद्धिमान् एवं कर्तृत्वान् तरुण भारी संख्या में निर्माण करने थे और इसलिये जिस संन्यासी वेश के कारण भोले-भाले लोग ही अधिक प्रमाण में चारों ओर कत्र होते हैं, वह वेश उन्होंने विचारपूर्वक टाला था. निःस्वार्थभाव, विचारों की तर्कशुद्धता, स्वभाव का माधुर्य, चरित्र की निष्कलंकता, प्रयत्नों की पराकाष्ठा एवं सातत्य, ये बातें यदि अपने व्यवहार में प्रकट हुईं तो अपने समाज का नेतृत्त्व करने की पात्रता रखनेवाले तरुण सहज ही अपने आसपास खड़े किये जा सकेंगे, इस आत्मविश्वास के कारण ही उन्होंने सामान्यजनों के समान ही अपने जीवन का बाह्य स्वरूप रखा था. नागपुर की ओर उन दिनों मध्यमवर्ग का जो प्रचलित वेश था, वही वे सदैव धारण करते थे.

पैर में जूते या चप्पल, सादी धोती, कमीज तथा कॉलरवाला कोट और अन्दर पुट्ठेवाली कुछ ऊँची काली टोपी, उनके वेश के निश्चित उपादान थे. हाथ में बाहर जाते समय रुपहली मूठ की छड़ी रहती थी. गोल मूठ पर सिंह का चित्र तथा डॉक्टरजी के मन की पराक्रमशील आकांक्षा को व्यक्त करनेवाला संस्कृत का ध्येयवाक्य ‘स्वयमेव मृगेन्द्रता’ अंकित रहता था. 1938-39 से उनके शरीर पर ऊन के वस्त्र दिखने लगे थे, किन्तु वे अस्वस्थ होने के कारण अपरिहार्य होने के परिणामस्वरूप ही थे. अन्यथा तब तक वे सफेद मोटे सूती वस्त्रों का ही उपयोग करते थे. कभी-कभी तो उनके फटे हुए वस्त्र उनकी निर्धनता की साक्षी देते थे. दुपट्टे का उपयोग विशेष प्रसंग पर करते थे तथा अन्य दिनों में गले की खराबी के कारण गलूबन्द का भी उपयोग करने लगे थे. वे स्वयं सादा जीवन व्यतीत करते थे तथा अन्यों को भी यही बताते थे कि ‘‘विलास के साधन उपलब्ध हैं इसीलिये उनका उपयोग करना ठीक नहीं है. सीधी-सादी वस्तुओं का व्यवहार सदैव उत्तम है तथा उसी में आनन्द भी आता है.’’ कपड़ों के विषय में तो वे यही कहा करते थे कि ‘‘बाह्य वेश में हम दुनिया से आगे न जायें क्योंकि यह कैसे कहा जा सकता है कि हम उस अज्ञात क्षेत्र में अत्युत्तम सिद्ध होंगे. इसी प्रकार बहुत पीछे रहकर लोगों की दृष्टे में दकियानूसी अथवा फूहड़ भी न दिखें. आज के बराबर रहने में भी सुरक्षितता नहीं है. कारण, उस अवस्था में हम उनके गुण-दोष नहीं परख सकेंगे. इसलिये समय से केवल एक कदम पीछे रहना ही उत्तम है.’’
यह उल्लेख पीछे आ चुका हैं कि वे जहाँ जाते थे, वहाँ उनका व्यवहार सहज एवं अत्यन्त आत्मीयतापूर्ण रहता था. उनकी दृष्टि में हिन्दुस्थान का कोई भी स्थान नागपुर की अपेक्षा अपनेपन में दूर का प्रतीत नहीं होता था. कारण, सम्पूर्ण हिन्दुस्थान ही उनका घर हो गया था तथा उसमे रहनेवाला समाज उन्हें विशाल कुटुम्ब के सदृश लगता था. फिर भी इसमें शंका नहीं कि नागपुर में अपने घर में रहते हुए उनका व्यवहार चार अन्य लोगों जैसा, हेडगेवार-कुटुम्ब के एक सदस्य के नाते ही होता था. उन्होंने अपने जीवन में प्रारम्भ से ही यह ध्यान रखा था कि  लोगों को उनके सम्बन्ध में कोई कौतूहल न हो.
अपने घर में दुमंजिले पर सामनेवाले कमरे में उनकी बैठक रहती थी. वहाँ एक दरी बिछी रहती थी. दरी पर वे एक भी सलवट सहन नहीं करते थे. कोई मिलकर गया कि कमरे की सब व्यवस्था ठीक-ठाक है या नहीं, इसका डॉक्टरजी बराबर ध्यान रखते थे. बैठक के कमरे में लोकमान् तिलक, स्वामी श्रद्धानन्द तथा डॉक्टरजी के मित्र स्वर्गीय भाऊजी कावरे के छायाचित्र लगे रहते थे  तथा एक काँच की आलमारी में छत्रपति शिवाजी महाराज का अर्धपुतला रखा हुआ था. यह कमरा 1926 में बनवाया था, किन्तु उसे मजबूत नहीं कहा जा सकता था. डॉक्टरजी का वजन पौने दो सौ पौण्ड से ऊपर था. जब उनका शरीर नीचे से ऊपर आता तो बिचारा जीना तो काँप उठता तथा उसके साथ सहानुभूति दिखाती हुई कमरे की दीवारें भी हिलने लगतीं.
कमरे के एक कोने में डॉक्टरजी की एक मोटी लाठी रखी हुई थी. भार एवं मोटेपन के विचार से उसे मूसल कहना ही अधिक ठीक होगा. लाठी को खूब तेब पिलाया गया था इसलिये खूब चमकती थी. उसके दोनों छोरों पर लोहे की टोपी(साम) लगवा रखी थी. सीधी पीठ करके तथा हाथ को शरीर से सटाकर खड़े होकर लाठी का पतला सिरा बायें हाथ में तथा दूसरा जमीन पर टिकाकर बाजू एवं कलाई न हिलाते हुए केवल हाथ से लाठी को जमीन के समानान्तर उठाने की क्रिया बड़ी कठिन थी, किन्तु डॉक्टरजी उसे लीलया कर लेते थे. उनके पास बाहर से जब स्वयंसेवक आते तो किसी-किसी तरुण से वे इस प्रकार लाठी उठाने को कहते. यदि वह उनकी अपेक्षा के अनुसार लाठी उठा देता तो डॉक्टरजी उसकी पीठ पर हाथ फेरकर शाबाशी देते तथा उसकी उन्हें बड़ी प्रसन्नता होती थी. वे चाहते थे कि तरुणों की कलाई लोहदण्ड के समान सबल होनी चाहिये. यह ध्यान में लाने के लिये लाठी उठाने के खेल करते रहते थे. एक बार नासिक के कुछ स्वयंसेवक नागपुर आये. डॉक्टरजी ने उनसे लाठी उठाने के लिये कहा. उनमें से कुछ से यह कार्य नहीं सधा. किन्तु एक ने सफलतापूर्वक लाठी उठा ली. तब डॉक्टरजी ने कहा ‘‘चाहे जिससे यह काम नहीं हो सकता. जो शक्ति और युक्ति का मेल कर सकेगा, वही यहाँ सफल होगा.’’
घर छोटा था परन्तु सभी वस्तुयें ठिकाने से तथा अत्यन्त सुरुचिपूर्ण ढंग से रखी रहती थीं. हर चीज अपने स्थान पर रहे इस ओर वे बराबर ध्यान रखते थे. घर के किसी भी काम को करने में उन्हें कभी छोटापन प्रतीत नहीं हुआ. रविवार को प्रातःकाल संघ का सांधिक कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वे घर के चौबारे, बरामदे और कोठे को साफ करने में जुट जाते. इसी प्रकार, स्वास्थ्य ठीक रहा तो वे तथा उनके बड़े भाई श्री सीतारामपन्त घर के आँगन में लकड़ी फाड़ते थे. डॉक्टरजी के यहाँ आनेवाले अनेक स्वयंसेवकों को तो स्वयं घर की अपेक्षा डॉक्टरजी का घर ही अपना प्रतीत होता था तथा उनके साथ काम करते हुए, हम कुछ विशेष कर रहे हैं, एऐसा विचार भी कभी उनके मस्तिष्क में नहीं आया. ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव’ इस प्रकार की जिनकी डॉक्टरजी के साथ एकरूपता हो गयी थी, वे स्वयंसेवक यदि स्वयं कुल्हाड़ी लेकर डॉक्टरजी के घर पर लकड़ियाँ फाड़ते हुए दिखें तो उसमें अनहोनी कुछ भी नहीं.
डॉक्टरजी का घरेलू जीवन नये-पुराने का संगम था. उनके भाई सीतारामजी पुरोहिताई करते थे तथा उनकी पोशाक बिल्कुल ही सादी, केवल धोती और दुपट्टा ही, थी. उनके रहन-सहन में स्वाभाविक ही पुरानी पीढ़ी का कठोर कर्मकाण्ड था. परन्तु डॉक्टरजी के व्यवहार में हिन्दू समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिये, फिर वह किसी प्रान्त अथवा जाति का क्यों न हो, बिना किसी भेदभाव के स्थान था. सखरे-निखरे, छुआछूत आदि के नियम सीतारामजी बड़ी कठोरता तथा बारीकी से पालन करते थे. पर डॉक्टरजी के कमरे में इन बातों के लिये कोई स्थान नहीं था. ऊपर से देखने में दोनों का स्वभाव एवं वृत्ति दो ध्रुवों के समान एक दूसरे से भिन्न थी, पर दोनों के बीच उत्कट प्रेम होने के कारण वह व्यवहार में कोई अड़ंगा नहीं डाल पायी. कुछ दिनों तो दोनों एक ही चश्मे से काम चलाते थे. दोनों की आवाज तो इतनी मिलती-जुलती थी कि कोई नया आदमी बाहर से बता ही नहीं सकता था कि उनमें से कौन बोल रहा है. दोनों का स्वर गम्भीर एवं भारी था. दोनों भाइयों के दो अलग-अलग ढंग थे. डॉक्टरजी की भाभीजी, श्री सीतारामजी की पत्नी, दोनों की चिन्ता करतीं. उनका काम तार पर कसरत करने के समान कठिन था परन्तु उन्होंने जीवन-भर उसे भली भाँति निभाया. डॉक्टरजी के यहाँ रहकर अपनी महाविद्यालयीन शिक्षा पूर्ण करनेवाले श्री श्रीकृष्ण पुराणिक लिखते हैं कि ‘‘इस खींचातान में सौ. रमा भाभी बड़ी मुसीबत में फँस जाती थीं. एक ओर तो देवर के मन-मुताबिक घर की सब बातें करना तथा दूसरी ओर पति के कर्मकाण्ड एवं दैनिक आह्विक भी बिना किसी कोर-कसर के होते रहें, यह ध्यान रखना, इन दोनों ही परस्पर-विरोधी आचार-विचार के साथ घर चलाने में उन्हें बहुत कष्ट उठाने पड़ते थे. परन्तु उनके मन की शान्ति और सन्तुलन कभी टूटे नहीं. सबके समय और ढंग को सम्हालकर उस साध्वी ने डॉक्टरजी को घर के झंझटों से निश्चिंत रखकर एक प्रकार से राष्ट्र की महान् सेवा की.’’
दोनो भाइयों के घर के जीवन की छोटी-छोटी बातें भी उल्लेखनीय हैं. डॉक्टरजी की बैठक में अलग बर्तन में पीने का पानी रखा जाता था. इस बात का ध्यान रखा जाता था कि वह पानी फिर रसोई में न जाये. 1935 से डॉक्टरजी बारम्बार बीमार हो जाते थे और इसलिये उनको कपड़े पहनकर ही भोजन करना पड़ता था. ऐसे अवसरों पर शास्त्रीजी कभी गलती से भी उनकी पंक्ति में भोजन के लिये नहीं बैठते थे. घर में कभी-कभी दोनों भाइयों की भिन्न-भिन्न सामाजिक तथा धार्मिक विषयों पर चर्चा होती थी. वे इतनी जोर-जोर से बोलते थे कि पड़ोसियों को तो यही लगता कि झगड़ा हो गया है. डॉक्टरजी की इच्छा रहती थी कि घर में अच्छी दुधारू गाय रहे और वे कभी-कभी अपनी इच्छा प्रकट भी करते थे, परन्तु यह इच्छा कभी साकार नहीं हो सकी. कारण क्या था ? श्री सीतारामजी ने गाय अथवा बैल जैसे मूक पशु को खूँटे से बाँधकर बन्धन में रखना निषिद्ध ठहरा रखा था. डॉक्टरजी यह जानते थे कि अपने भाई के कारण ही उनको घरेलू जीवन तथा कौटुम्बिक वातावरण में रहने को मिलता था. अतः सीतारामजी की कुछ कल्पनायें उन्हें नापसन्द होते हुए भी बन्धुप्रेम तथा उपर्युक्त ज्ञान के कारण वे उनका समादर करते थे. भाई के बच्चों को खिलाना, आवश्यकता आ पड़ी तो चाय-खाना आदि बनाना, भाई की बीमारी में रात-रात भर जागकर सेवा-सुश्रूषा करना आदि काम मतभिन्नता होते हुए भी डॉक्टरजी सहज भाव से कर सकते थे. इसी प्रकार, डॉक्टरजी के आचार-विचार में मतभेद होते हुए भी अपने केशव के द्वारा समाज-संघटन का एक महान् कार्य हो रहा है, इतने एक विचार मात्र से सीतारामजी डॉक्टरजी की अनेक अरुचिकर बातों की ओर आँखें मूँद लेते थे. शास्त्रीजी की जाँघ में एक बार फोड़ा होने पर उसका ऑपरेशन करना पड़ा. अन्दर रुई का एक छोटा-सा टुकड़ा रह जाने के कारण बहुत कुछ करने पर भी ठीक नहीं होता था. डॉक्टरजी ने फिर से शल्यक्रिया करवाकर उस रुई के टुकड़े को बाहर निकलवा दिया. इस समय डॉक्टरजी ने इतनी सुश्रूषा की कि अपने स्वभाव के अनुसार अक्षरशः रात-दिन एक कर दिया. उनकी सेवा सुश्रूषा का ही तो परिणाम था कि शास्त्रीजी उस कष्ट से मुक्ति पा सके. अपने सामाजिक कार्य का व्याप सम्हालते हुए भी डॉक्टरजी की ओर से शास्त्रीजी को यह अप्रतिम बन्धुप्रेम मिला था, उसे वे कभी भूल नहीं पाते थे. इस भाव से उनकी सहिष्णुता को बनाये रखने में बहुत सहायता की.
डॉक्टरजी के चाचा श्री आबाजी आयु में बहुत बड़े तथा स्वभाव में हेडगेवार कुलपरम्परा के अनुकूल अर्थात् क्रोधी थे. नागपुर में डॉक्टरजी के साथ रहने के लिये आने पर कुछ दिनों तो वे संघ के कार्य तथा डॉक्टरजी के प्रयत्नों को दूर से ही कौतुक एवं तटस्थता के भाव से देखते रहे पर 1932-33 से शनैः-शनैः डॉक्टरजी के काम का स्वरूप पहचान कर, उन्होंने उसमें भाग लेना प्रारम्भ कर दिया. चाचा के नाते डॉक्टरजी उनका बहुत सम्मान करते थे. पर आगे ऐसी स्थिति हो गयी कि अन्य स्वयंसेवकों के समान आबाजी भी डॉक्टरजी का आदर करते थे. संघ के आय-व्यय की ओर तो उन्होंने अपनी व्यवहारी एवं दक्षतापूर्ण दृष्टि से ध्यान देना प्रारम्भ किया ही, इसके साथ स्थान-स्थान पर संघशाखाओं की स्थापना करने के हेतु भी वे मास-दो मास के लिये प्रवास पर जाने लगे.
डॉक्टरजी नागपुर में रहे कि अनेक लोगों का उनके यहाँ आना शुरू हो जाता. डॉक्टरजी आनेवालों का स्वागत बड़े ध्यान से करते, बाहर से आनेवालों के ठहरने, भोजन आदि की व्यवस्था के सम्बन्ध में वे बड़ी आत्मीयता के साथ पूछताछ करते तथा उसमें कोई कमी होती तो वे उन्हें अपने घर पर ही रख लेते. चाय का अदहन तो उनके घर में लगभग दिन-भर चूल्हे पर रखा रहता था. अनेक बार जब डॉक्टरजी एकाएक आये मेहमानों के स्वागत और बैठाने में निमग्न होते उस समय उनकी भाभी के सामने, घर में जो कुछ है, उससे सबके चाय-जलपान की व्यवस्था कैसे की जाये, यही समस्या पड़ जाती थी. कुटुम्ब की वृत्ति तो पुरोहिताई थी, अतः संचय और निश्चिन्तता का तो विचार ही नहीं किया जा सकता. दान-दक्षिणा के सहारे जैसे-तैसे घर की गाड़ी खिंचती थी. शास्त्रीजी तो निमंत्रण मिलने के कारण भोजन करने के लिये यजमानों के यहाँ बाहर चले जाते थे. किन्तु डॉक्टरजी के कारण मेहमानों का ताँता सदैव लगा रहता. डॉक्टरजी के भोजन का समय होने पर उनके मुँह से यह कभी सुनने को नहीं मिला था कि ‘‘जरा बैठिये, मैं भोजन करके आता हूँ,’’ बल्कि जो भी वहाँ उपस्थित रहता, उसे वे भोजने के लिये अन्दर ले जाते तथा जो कुछ रूखा-सूखा होता बड़े प्रेम से अपने साथ खिलाते. कभी-कभी ऐन मौके पर मेहमान आ गया और घर में भोजन थोड़ा ही बचा हो तो वे ‘‘मेरा अभी भोजन हुआ है, आइये भोजन कर लीजिये’’ कहकर उसे भोजन कराते तथा स्वयं सामने पट्टे पर बैठकर बातचीत करते रहते. दरिद्रता की व्यथा कभी उनके चेहरे पर नहीं दिखती थी. इस प्रकार, खाली पेट रहने पर भी आगन्तुक सज्जन को मिर्च का अचार परोसते हुए मजाक में पूछते ‘‘इसमें जरा तीखा कम ही दिखता है.’’ कभी-कभी तो इस प्रकार अचानक आये मेहमान का आतिथ्य डॉक्टरजी की सत्व-परीक्षा ही सिद्ध होती थी. पर इन अवसरों पर उनके मन के सन्तुलन एवं उदारता में कोई कमी नहीं आयी. एक बार रात्रि को अतिथियों के आने पर पता चला कि घर में जलाने की लकड़ी समाप्त हो गयी है. उस समय उन्होंने अपने घर के दो-एक पट्टे फाड़कर काम चलाया था. अखिल भारतीय संघटन का निर्माण करने में सफलता प्राप्त करनेवाले डॉक्टरजी का यह था गृहजीवन. ‘‘दारिद्र्याची अमुची दीक्षा, सत्त्वाची प्रतिपदीं परीक्षा’’ (दारिद्र्य की हमारी दीक्षा, प्रतिपद में सत्व की परीक्षा), यही था उनके जीवन का नित्य का अनुभव. डॉक्टरजी किसी विशेष दिन व्रतोपवास नहीं करते थे, किन्तु इस प्रकार का उपवास करने के अवसर उन्हें अनेक बार मिलते रहते थे.
डॉक्टरजी अपनी युवावस्था में अत्युग्र देशभक्ति की भावना के कारण चाय नहीं पीते थे. पर संघ प्रारम्भ होने के बाद सन् 1927 में चाँदा में एक घटना हो गयी कि जिसके कारण उन्होंने चाय लेना प्रारम्भ कर दिया. वे एक गरीब स्वयंसेवक के घर गये थे. वहाँ जलपान के लिये उनके सामने चाय और पोहे पेश किये गये. डॉक्टरजी ने पोहे को तो खा लिया पर चाय छोड़ दी. घर में यह पता लगते ही डॉक्टरजी चाय नहीं पीते, कुछ खलबली मच गयी. हालत कुछ ऐसी थी कि डॉक्टरजी चाय तो पीते नहीं और देने के लिये दूध पर्याप्त नहीं. घर के लोगों का यह असमंजस डॉक्टरजी की निगाह में नहीं छिप सका. वे वहाँ से लौट आये पर उनका मन रह-रहकर झोंपड़ी की ओर ही दौड़ता रहा. सायंकाल काम समाप्त होने के बाद वे एकदम उठे तथा कोट-टोपी पहनकर बोले ‘‘चलो उस स्वयंसेवक के घर चलकर चाय पी आयें.’’ वे यह जानते थे कि चार लोगों को जुटाना है तो उनके समान ही व्यवहार करना चाहिये. और इसी विचार से चाय पीना प्रारम्भ कर दिया. उन्हें कोई चाय की आदत नहीं थी और न कोई रुचि ही. पर उनका यह विचार था कि चाय के बहाने पाँच-दस मिनट बैठने के कारण बातचीत का सहज अवसर मिल जाता था. उनकी प्रत्येक रुचि-अरुचि की कसौटी लोकसंग्रह की आवश्यकता और उसके लिये उपादेयता ही थी. व्यक्तिगत अभिरुचि के कारण कोई चाय पेश करता तो स्वास्थ्य के लिये हानिकर होते हुए भी वे सहर्ष ग्रहण करते. एक बार एक सज्जन से मिलने के लिये डॉक्टरजी गये थे. थोड़ी-सी बातचीत होने के उपरान्त उन सज्जन ने कहा ‘‘जरा बैठिये, अभी चाय बनाने के लिये कहता हूँ.’’ इस पर डॉक्टरजी के साथ गये हुए कार्यकर्ता ने कुर्सी से उठते हुए कहकर कि ‘‘नहीं, नहीं, आज सबेरे से कई बार चाय हो चुकी है’’ उन्हें रोक दिया अर्थात् थोड़ी देर में बातचीत समाप्त कर डॉक्टरजी को वहाँ से चलना पड़ा. यह बात उन्हें अच्छी नहीं लगी. ‘‘राखावीं बहुतांचीं अन्तरे’’(‘‘बहुतों का मन रखना होगा’’), यह उनके स्वभाव का सूत्र होने के कारण वे बाहर आने पर उस कार्यकर्ता पर कुछ बिगड़े भी. उन्होंने कहा ‘‘चाय का खर्च होता तो उस व्यक्ति का होता, तेरा क्या जाता था ? चाय बनने तक हमें उसके साथ फुरसत से बात करने का और अवसर मिल जाता. तुम्हारे नकार ने वह अवसर गवां दिया.’’
चाय का चारों ओर प्रचार होने के कारण डॉक्टरजी ने चाय पीना प्रारम्भ कर दिया था क्योंकि उठते-बैठते चारों ओर जाना पड़ता तथा दिन में अक्षरक्ष: सैकड़ों व्यक्तियों से मिलने का प्रसंग आता. यदि किसी ने चाय दी तो उसका मन तोड़कर मना करना उन्हें संघठन की दृष्टि से हितकर नहीं प्रतीत होता था और इसीलिये सामने आये हुए प्याले में से एक घूँट ही क्यों न हो पीकर, वे उसके आतिथ्य को स्वीकार करते थे. परन्तु इस चाय के कारण उनकी भाभी सौ. रमाबाई को बहुत कष्ट होता था. पर उस माता ने देवर का ऊपर से चाय का सन्देश आने पर कभी भी चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाने में मुसीबत नहीं मानी. यही कहना उपयुक्त होगा कि उनके रूप में मूक सेवा ही डॉक्टरजी के घर में वास करती थी. पर कभी-कभी ऐसी स्थिति हो जाती थी कि ऊपर से चाय बनाने का आदेश तो आ जाता पर, घर में चाय नहीं तो कभी चीनी नहीं. उस समय ऐसे मौके पर किसी स्वयंसेवक को बाजार भेजकर दौड़धूप करनी पड़ती थी. एक बार डॉक्टरजी के पास उनके मित्र श्री विश्वनाथराव केलकर आये. डॉक्टरजी ने उनके लिये चाय बनाने का सन्देश भेज दिया पर पाँच मिनट बाद भी चाय न आने पर डॉक्टरजी श्री विश्वनाथराव को थोड़ा रुकने के लिये कहकर घर में गये. वहाँ जाकर देखते हैं तो पता चला कि न तो चाय है, न खरीदने के लिये पैसे ही. डॉक्टरजी ने अपने मित्र को चाय के लिये बैठा दिया और इधर घर में यह अवस्था ! तुरन्त डॉक्टरजी पास की दुकान पर जाकर चाय लाये. जैसे-तैसे उस अवसर का निर्वाह किया. पर श्री केलकर के ध्यान में सब बात आ गयी. उसके बाद जब उनकी श्री गुरुजी से भेंट हुई तो उनसे डॉक्टरजी के घर की आर्थिक स्थिति तथा स्वास्थ्य के सम्बन्ध में सूक्ष्मता से पूछताछ की और कहा ‘‘आप उनके घर की कठिनाइयों की ओर ध्यान क्यों नहीं देते? मुझे उनका स्वास्थ्य गिरा हुआ दिखा.’’ डॉक्टरजी दरिद्रता का आघात सहन कर सकते थे किन्तु अपनी अयाचित-वृत्ति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन करने की कल्पना भी उनको असह्य थी. इसी बात का भलीभाँति ज्ञान होने के कारण उनके समान ही ऐहिक कठिनाइयों की ओर दुर्लक्ष्य करनेवाले श्री गुरुजी ने उत्तर दिया कि ‘‘एकादशी का पेट शिवरात्रि कैसे भरेगी ?’’ इस पर श्री विश्वनाथराव ने यह इच्छा व्यक्त की कि ‘‘डॉक्टरजी के घर के खर्च के लिये मैं अपनी ओर से पत्र-पुष्प के रूप में प्रतिमास पच्चीस रुपये आपको देता जाऊँगा.’’ यह सुनकर श्री गुरुजी ने कहा ‘‘आप उनके मित्र हैं, अतः यह पैसे आपने सीधे उनके हाथ में दिये तो ठीक रहेगा.’’ पर डॉक्टरजी के स्वभाव से परिचित होने के कारण श्री विश्वनाथराव के लिये उनके सामने यह विषय निकालने की कभी हिम्मत नहीं हुई.
1934-35 में, मई मास में होनेवाले अधिकारी शिक्षण वर्ग में शिक्षार्थियों की ओर से डॉक्टरजी को एक श्रद्धानिधि समर्पण की जाने लगी थी. इस थैली से डॉक्टरजी के हाथ पाँच-छः सौ रुपये आ जाते थे. किन्तु इतने पर भी डॉक्टरजी के घर तंगी कम न हुई क्योंकि वे इस निधि से भारी गुरुदक्षिणा देने लगे तथा स्वयंसेवकों की अड़चनों को दूर करने के लिये भी अब उनका हाथ पहले से अधिक खुल गया. साथ ही अब प्रवास भी बढ़ गया था. स्वयंसेवकों की अड़चन तथा घर की अड़चन में वे पहली को वरीयता देते थे. एक वर्ष उनके घर के कमरे की दीवार गिर गयी. उस भीत को बनाना आवश्यक था. परन्तु वह उसी अवस्था में बहुत दिनों तक पड़ी रही. इसका कारण यही था कि डॉक्टरजी के पास जैसे ही पैसे आते कि वे उन स्वयंसेवकों के ऊपर खर्च कर देते जो कठिनाई में फँसे होते. फलतः दीवार चुनवाने के लिये पैसे बचते ही नहीं थे. पर डॉक्टरजी को उसकी चिन्ता ही कहाँ थी ? उन्हें तो यही लगता था कि सम्पूर्ण राष्ट्र की अवस्था आकाश फटने के समान होने के उपरान्त में अपने घर की अलग से और क्यों चिन्ता करुँ ?
पौढ़ स्वयंसेवकों के समान उनके स्नेह की शीतल छाया में रहनेवाले बाल और किशोर स्वयंसेवकों को भी डॉक्टरजी की गरीबी का अनुमान लगे बिना न रहा. एक बार नागपुर के एक प्रतिष्ठित सज्जन उनके पास मिलने के लिये आये. उस समय कुछ बाल स्वयंसेवक भी वहाँ बैठे थे. थोड़ी देर बातचीत करने के बाद जब वे सज्जन चलने लगे तो डॉक्टरजी ने उन्हें आग्रहपूर्वक रोका और कम-से-कम सुपारी तो लेकर जाने की प्रार्थना की. वे पानदान लेने के लिये नीचे गये तो क्या देखते हैं कि उसमें सुपारी खत्म हो गयी है. अपने भाई की पुरोहिताई में आयी हुई सुपारियों में से कहीं एकाध टुकड़ा मिल जाये इसलिये उन्होंने एक-एक डिब्बा खड़खड़ाया. तब कहीं सौभाग्य से एक टूटी सुपारी हाथ लग गयी. उसे पानदान में रखकर वे ऊपर आये तथा उन सज्जन का आतिथ्य किया. उनके चले जाने पर डॉक्टरजी ने कहा ‘‘देखो, इनके यहाँ जाने पर तो वे कितने ठाठ के साथ हम लोगों का स्वागत करते हैं. वे मेरे यहाँ आये तो उन्हें देने के लिये सुपारी भी नहीं निकली.’’
डॉक्टरजी के मुख से ये उद्गार सुनकर बाल स्वयंसेवकों में से कुछ को उनके घर की स्थिति की कल्पना आ गयी. उनका बाल-हृदय यह दुःख देखकर बड़ा उदास हो गया. थोड़े दिनों के बाद जब डॉक्टरजी का जन्मदिवस आया तो उन बालकों ने आपस में योजना बनाकर उन्हें कुछ भेंट दी. इसमें एक धोती का जोड़ा तो था ही परन्तु वे बालक सुपारी की एक बड़ी पुड़िया भेंट करना नहीं भूले. बाद में पता चला कि इस भेंट के लिये उन बालकों ने आपस में जो पैसे इकट्ठे किये तो उनमें से एक ने तो अपना सोने का अलंकार बेचकर पैसा दिया था.
हिन्दुत्व की प्रतीक शिखा डॉक्टरजी ने स्वयं रखी थी तथा उनकी अपेक्षा थी कि हिन्दू चोटी रखें परन्तु उसके लिये उन्होंने कभी किसी पर दबाव नहीं डाला. हाँ, स्वयंसेवकों के गणवेश का निरीक्षण करते समय जैसे स्वच्छता, व्यवस्था आदि बातों के लिये अंक दिये जाते थे, वैसे ही पाँच अंक चोटी के लिये भी रखे थे.
संघ की स्थापना के पूर्व डॉक्टरजी स्नान के बाद नियमपूर्वक सन्ध्या करते थे. उस समय पहनी हुई धोती का एक पल्ला शरीर पर डाल लेते थे. आगे दौड़धूप के व्यस्त जीवन में उन्हें सन्ध्या के लिये भी अवसर मिलना कठिन हो गया था. एक बार उनके मित्र श्री प्रह्लालपन्त फडणवीस ने उनसे पूछा कि ‘‘इतनी उमर हो गयी पर तुम सन्ध्या, पूजा, नाम-स्मरण आदि कुछ भी नहीं करते’’ तो डॉक्टरजी ने तुरन्त उत्तर दिया कि ‘‘आपका कहना सही है पर कल यमराज के सम्मुख मुझे खड़ा किया तो वह मेरा क्या करेगा? कारण, मैने अपने जन्म में स्वतः के लिये कुछ भी नहीं किया.’’ स्नान के बाद वे रोली का टीका लगाते थे तथा प्रवास में कहीं मिल गया तो चन्दन भी लगा लेते थे. कहीं जाने के लिये जब वे ऊपर से नीचे आते तो देवगृह में देवता को प्रणाम करके ही बाहर जाते. उनके पूज्य माता-पिताजी का श्राद्धदिन एक ही था तथा उनकी स्मृति के इस अवसर पर वे नियमपूर्वक घर ही रहते थे. वे श्रावणी के संस्कार में भी सम्मलित होते थे. आश्विन महीने में गोवत्सद्वादशी को डॉक्टरजी के घर में कुल-परम्परा से एक कार्यक्रम होता था.
(गोवत्सद्वादशी के इस कार्यक्रम के साथ एक महत्त्वपूर्ण घटना की स्मृति जुड़ी हुई दिखती है. हेडगेवार-कुल के वल्लभेश मूलपुरुष थे. उनसे डॉक्टरजी नवीं पीढ़ी में आते हैं. श्री वल्लभेश की उत्कट भक्ति से सम्बन्धित दिवस के रूप में यह दिन उनके कुल में मनाया जाता है.
श्री वल्लभेश दत्तात्रेय के बड़े भक्त थे. आजीविका के लिये वे व्यापार करते थे. सुशील एवं आचारनिष्ठ होने के कारण लोगों में उनकी बहुत प्रतिष्ठा थी. एक बार वे व्यापार के लिये बाहर गये. घर से चलते समय उन्होंने संकल्प किया कि यदि व्यापार में अच्छा लाभ रहा तो कुरवपुर की यात्रा के समय वे प्रातः ब्राह्मण मण्डली को एकत्र कर अभिषेक एवं ब्राह्मणों को सहस्र भोजन करवायेंगे. आगे उनकी अपेक्षानुसार व्यापार में तेजी आ गयी तथा उनको काफी लाभ हुआ. वे अपने संकल्प का स्मरण कर भरपूर धन लेकर गुरु श्रीपाद का नाम लेते हुए यात्रा के लिये चल दिये. रास्ते में कुछ धूर्त लोगों को उनके पास धन होने का अनुमान लग गया तथा वे भी ब्राह्मण का वेश रखकर यात्रा के बहाने श्री वल्लभेश के साथ चल दिये. दो-तीन दिन की यात्रा के बाद एक दिन रात्रि  को जब सब लोग कुरवपुर-माहात्म्य एक दूसरे को सुनाने में निमग्न थे, तब चोरों ने वल्लभेश पर आक्रमण कर उनका शिरच्छेद कर दिया और सब द्रव्य लूट लिया. इतने में ही एक त्रिशूल एवं खड्गधारी जटामण्डित दिव्य पुरुष प्रकट हुआ तथा उसने चोरों को समाप्त कर वल्लभेशको जीवित कर दिया. वह दिन कुरवपुर-यात्रा का अर्थात् गुरुद्वादशी का दिन ही था.)
वेदपाठ तथा तदुपरान्त इष्ट-मित्रों के साथ भोजन होता था. पुरोहितों को छोड़कर नागपुर तथा प्रान्त के कम-से-कम पच्चीस-तीस मित्रों को उस दिन डॉक्टरजी अवश्य निमंत्रित करते थे. यह दिन बड़ी धूमधाम से मनाया जाता.
डॉक्टरजी कृति से सात्विक एवं आस्तिक थे. ईश्वर के अधिष्ठान पर उनकी अचल श्रद्धा थी. ‘श्री’ अथवा ‘ॐ’ अंकित किए बिना कोई पत्र या दैनिकी का पृष्ठ उनके द्वारा लिखा हुआ नहीं मिलता. उनकी दृढ़ श्रद्धा थी कि संघ का कार्य ईश्वरीय है तथा यह भाव उनके बोलने एवं पत्रों में भी बार-बार प्रकट होता था. वे इसी धारणा से पत्रव्यवहार करते थे कि हम सब परमेश्वर के हाथ में एक उपकरण मात्र हैं तथा उसके सूत्रचालकत्व में ही सब काम अपने से होते हैं. संघकार्य को ईश्वरीय कार्य बताते समय वे यह भी स्पष्ट करते थे कि इसका अभिप्राय सज्जनों के संरक्षण एवं दुर्जनों का निर्दलन करनेवाले, श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित ईश्वरीय कार्य से था. वैसे ही ‘दासबोध’ के मर्म को हृद्गत करनेवाले डॉक्टरजी से श्री समर्थ द्वारा व्यक्त ईश्वरीय कार्य का अर्थ भी अज्ञात नहीं रह सकता था. श्री समर्थ ने पुरुषार्थ को ही ईश्वरीय कार्य का स्वरूप बताया है. संघकार्य को ईश्वरीय कार्य बताते समय डॉक्टरजी के सम्मुख निश्चित ही समर्थ के ‘‘यत्न तो देव जाणावा’’(‘‘यत्न से देव जानिये’’) तथा ‘‘अचुक यत्न तो देवो. चुकणें दैत्य जाणिजे’’(‘‘अचूक यत्न ही देव, चूक ही दैत्य जानिये’’) ये पद रहते थे. संघ की प्रार्थना में भी सर्वशक्तिमान् प्रभु को सम्बोधित कर दो चरणों की योजना में यही आस्तिकता प्रकट हुई है. प्रतिज्ञा में भी परमेश्वर तथा पूर्वजों का स्मरण कर हिन्दू राष्ट्र के पुनरुद्धार एवं उसको वैभवसम्पन्न करने के लिये प्रयत्नशील रहने का संकल्प किया जाता है. निस्सन्देह इसमें डॉक्टरजी के अन्तःकरण का भाव ही प्रतिबिम्बित होता है.
जीवन में धार्मिकता होते हुए भी उन्होंने कभी इसका प्रदर्शन नहीं किया. उनके अति निकटवर्ती मित्र बताते हैं कि वे कभी-कभी प्रातःकाल उठकर ध्यान मग्न होकर बैठ जाते थे. पीड़ित एवं दुःखित समाज के लिये रात-दिन प्रयत्न करते रहने योग्य उनका साधुत्व उज्जवल था तथा उनके मन को इतनी उन्नतावस्था प्राप्त हो गयी थी कि वह किसी भी स्थिति में अविचल रह सकता था. सन्त एकनाथ की यह वाणी ‘‘कडकडीत विजेचे कल्लोळ. तेणें गगनासि नसे खळबळ. तैसा नाना ऊर्मी माजी निश्चळ. गाम्भीर्य केवळ या नाँव.’’ (‘‘बिजली चाहे जितनी तड़पे, नभ में कब खलबली रही. विविध ऊर्मियों में निश्चलता, है सच्चा गाम्भीर्य यही..’’) उनके व्यवहार में साकार हुई दिखती थी. उनका मन सदैव विवेक के सिंहासन पर आरूढ़ रहता था. इसका प्रत्यय उनके किसी भी क्षण के व्यवहार तथा किसी भी विषय के निर्णय से किया जा सकता था.’’
एक बार तीसरे पहर के समय डॉक्टरजी के कुछ मित्र बैठे थे. कमरे के बीच में एक दीप टँगा हुआ था तथा उसके धीमे प्रकाश में बातचीत का रंग खूब जम गया था. जब सभी लोग इस प्रकार हास्य-विनोद में मगन थे, उसी समय डॉक्टरजी का चचेरा भाई वामन किसी काम के निमित्त उस दीपक के नीचे से भागता हुआ निकला. उसके सिर का धक्का लग जाने से काँच की चिमनी नीचे गिरकर फूट गयी तथा तेल लुढ़क जाने से दीपक भी भक-भक करके बुझ गया. इस घटना से सबसे रंग-में-भंग होता देख वामन के पिता श्री आबाजी हेडगेवार भी दीपक के समान भड़क उठे. पर डॉक्टरजी ने उन्हें शान्त कर नीचे बैठाया तथा मानो कुछ हुआ ही नहीं है. इस शान्ति के साथ उन्होंने दूसरी चिमनी लाकर उस पर बैठा दी. उनका संयम सभी के लिए आश्चर्य का विषय था.
डॉक्टरजी के क्रान्तिकारी जीवनकाल से अर्थात् 1915-16 से ही उनके प्रति आत्मीयता एवं स्नेह रखनेवाले गुरुजन सम्पूर्ण प्रान्त में फैले हुये थे. उनमें से अनेक घरों में उनका इतना निकट का सम्बन्ध था, मानो वे कुटुम्ब के ही एक सदस्य हों. जब वे उन स्थानों पर जाते तो उनका व्यवहार इस घनिष्ठता के अनुरूप ही आत्मीयतापूर्ण एवं संकोचरहित होता. डॉक्टरजी की युवावस्था में उनके हृष्ट-पुष्ट एवं भीमकाय शरीर, सेवाभाव एवं विनीत स्वभाव से सभी गुरुजन अत्यधिक प्रभावित थे. इसका वर्णन करते हुए सावनेर के वकील श्री मामा हरकरे कहते हैं कि ‘‘ये मुझसे मिलने के लिये घर आये कि मेरे पिताजी घर में जलपान की सूचना देते हुए कहते थे ‘अरे ! यह हनुमान आया है .’’ डॉक्टरजी का व्यवहार देखकर किसी भी व्यक्ति को प्रेमपूर्वक प्रयुक्त ‘हनुमान’ शब्द ही उपयुक्त प्रतीत होगा. विवाह-यज्ञोपवीत आदि के समय भोज में उनकी पत्तल पर चालीस-पचास जलेबियाँ तो सहज ही परोस दी जाती थीं तथा वे हँसते-हँसते उन्हें साफ कर जाते थे. 1930 के कारावास के समय तक उनके सभी मित्रगण इसी आहार के थे और कहीं वे सब-के-सब किसी व्यक्ति के यहाँ भोजन करने गये कि एक बार का गूँधा हुआ आटा समाप्त होने के कारण दुबारा गूँधना पड़ता तथा रोटियों के साथ साग समाप्त होने के कारण मुरब्बे या अचार का सहारा लेना पड़ता. उसमें भी वे इमरतबान के तले को पूरा-पूरा साफ किये बिना न छोड़ते. कुछ घरों में तो डॉक्टरजी का इतना सम्बन्ध था कि वे घर की वृद्धा से निस्संकोच जाकर कह सकते थे कि ‘‘आज मुझे नारियल की गुझिया बनाकर खिलाओ’’ तथा पाँच-सात नारियल का ‘पूरण’ तुरन्त समाप्त हो जाता था. डॉक्टरजी को भाकरी के साथ मिर्च और तेल रुचता था. इतना ही नहीं, बड़ाभात, भजाभात, चकली, थालीपीठ, पुड़ा की बड़ी, मुरमुरे डाला हुआ चिवड़ा आदि राजस पदार्थों की गिनती उनकी रुचि के पदार्थों में विशेष थी. 1934 तक यह स्थिति रही किन्तु उसके बाद हालत बदल गयी. पिछले अनुभव के कारण लोग डॉक्टरजी से भोजन का आग्रह अवश्य करते थे पर वह उनके स्वास्थ्य के लिये हानिकर सिद्ध होता था.
विदर्भ एवं मध्यप्रान्त में घूमते हुए डॉक्टरजी के आहार के सम्बन्ध में अनेक लोगों के मुख से मजेदार कथाएँ सुनने को मिलती हैं. उनमें प्रत्येक अपने यहाँ डॉक्टरजी द्वारा खाये हुए पदार्थ को ही उनकी रुचि का पदार्थ बताता है. इन सब प्रकार के पदार्थों के नाम सुनकर यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि डॉक्टरजी को सभी पदार्थ पसन्द थे, अथवा जिसके यहाँ वे जाते उसे यही सन्तोष देने का प्रयत्न करते कि उसने उनकी मनपसन्द का भोजन बनाया है.
इतने आहार के साथ ही अनेक लोगों ने डॉक्टरजी को पालथी मारकर कुएँ या नदी में घण्टों तैरते देखा है. एक बार काशी में गंगा का विशाल घाट होते हुए भी उन्होंने उसे तैरकर आरपार किया था. इसी प्रकार खाली बर्तन के समान फटफटी को उठाकर घर से बाहर सड़क पर खड़ा करनेवाले श्री गोविन्दराव चोलकर के साथ वे समय-समय पर जोर आजमाई करते रहते थे. उनका शरीर भव्य था, आहार अच्छा था तथा उनकी काम निबटाने की फुर्ती और परिश्रम करने की सिद्धता अद्भुत थी. पर हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि जैसा आनन्द उन्हें स्वादिष्ट भोजन करते समय मिलता वही निराहार रहने पर भी उनके चेहरे पर खेलता रहता. दुनिया की दृष्टि में डॉक्टरजी ‘कभी विलासी, कभी प्रवासी’ इस प्रकार दिखे तो भी उनकी अविचल दृष्टि हिन्दू राष्ट्र के उद्धार के लिये लक्षावधि बन्धुओं को एक संघटन-सूत्र में गूंथने की ओर ही लगी हुई थी और इसलिये वे अनुकूलता अथवा प्रतिकूलता की दोनों स्थितियों में समान रूप से उत्साही एवं कार्यक्षम बहुधा देते थे. स्वास्थ्य ठीक रहने तक वे अपनी मित्रमण्डली के साथ बहुधा हाथपाई करते रहते. तकिये और मसनद एक दूसरे पर फेंककर इतनी धमाचौकड़ी मचाते कि सारी बैठक सिर पर उठा लेते थे. इतना ही नहीं, नरम तकियों से एक दूसरे की अच्छी तरह से खबर नहीं ली जा सकती, इसलिये अरहर की दाल भरकर तकियों को भारी बनाकर उनका उपयोग करते थे. संघ के स्वयंसेवकों को इस प्रकार मस्ती से व्यवहार करते देख उन्हें बहुत आनन्द आता था तथा कभी-कभी वे स्वयं भी इस तारुण्यसुलभ धींगाधींगी में सम्मिलित हो जाते. हाथ लगते ही कुम्हला जायें इस प्रकार के व्यक्ति उन्हें नहीं चाहिये थे.
संघठन के लिये हिन्दू समाज के सर्वजन एकत्र आकर एकता और स्नेह के सम्बन्ध बढ़ायें, इस हेतु डॉक्टरजी के प्रयत्न चलते रहे थे. किन्तु उन्हें यह बिल्कुल नहीं लगता था कि इस उद्देश्य की सिद्धि के लिये समाज से जातियों का समूल उच्चाटन कर दिया जाये अथवा कुल-परम्परा से चले आये विशेष संस्कारों का त्याग किया जाये. डॉक्टरजी हिन्दू समाज के किसी भी व्यक्ति के यहाँ संकोचरहित होकर भोजन करते थे और इसमें उन्हें लव मात्र भी यह नहीं लगता था कि वे कुछ विशेष बात कर रहे हैं. नागपुर में यद्यपि उनका डॉ. मुंजे के यहाँ काफी आना-जाना रहता था और डॉ. मुंजे शाकाहार को सदैव बड़ी तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे तथा राष्ट्र में पराक्रम की भावना जगाने के लिये मांसाहार का प्रतिपादन करते थे. फिर भी, डॉक्टरजी ने अत्यधिक आत्मीयता होत हुए भी डॉ. मुंजे का इस विषय में कभी अनुकरण नहीं किया. किसी भी व्यक्ति के उत्तम गुणों का अवश्य अनुकरण करना चाहिये किन्तु एकाध अच्छे गुण पर मुग्ध होकर अपना सम्पूर्ण विवेक खोकर विकारवश होना अथवा गुणों के साथ उस व्यक्ति की सभी बातों का अनुकरण करना डॉक्टरजी को कतई स्वीकार नहीं था. उनका विवेक जागरूक रहता था.
उनकी मित्रता बहुत व्यापक एवं ऊँचे दरजे की थी. एक बार उनके सम्बन्ध में आया हुआ व्यक्ति सहसा दूर नहीं जा सकता था. यदि अपने स्वभाव के कारण कोई दूर हटा भी तो जैसे पृथ्वी से दूर जाने पर भी चन्द्रमा उसके चारों ओर घूमता रहता है वैसे ही डॉक्टरजी के असामान्य गुरुत्वाकर्षण की परिधि में ही वह चक्कर काटता रहता. राजनीतिक अथवा सैद्धान्तिक मतभेद उनके स्नेह-सम्बन्धों को नहीं तोड़ सकते थे. उनके पत्रों का प्रारम्भ ‘परम मित्र’ के सम्बोधन से ही होता था. किन्तु यह शब्द केवल पद्धति या शिष्टाचार के नाते प्रयुक्त नहीं होता था अपितु उसके पीछे हृदय का सच्चा प्रेमपूर्ण भाव रहता था. श्री सन्त एकनाथ के ‘भागवत’ में वर्णन के अनुसार इस शब्द में अत्यन्त उदात्त तथा उच्च कोटि के हृदय एवं व्यवहार की पुण्यता समाविष्ट रहती थी. ‘‘मनें धनें कर्तव्यता. ज्याची अनन्य अवंचकता. त्या नाँव परममित्रता. हे खूण तत्त्वता जाणावी’’ (‘‘मन में हो कर्तव्यता, और अवंचक भाव. परममित्रता है यही, जहाँ न कपट दुराव.’’) यह ओवी पूर्णांश में डॉक्टरजी के अकृत्रिम स्नेह के कारण सार्थक होती हुई दिखती थी. इस अलौकिक एवं अभिजात प्रेम के कारण ही मतभेद होते हुए भी वे नागपुर के कांग्रेस-नेता बैरिस्टर अभ्यंकर के पास से आवश्यकता पड़ने पर एकाएक रात्रि में पाँच सौ रुपये उधार लाये थे. उस समय जब डॉक्टरजी ने ऋणबन्धन-पत्र लिख देने को कहा तो बैरिस्टर अभ्यंकर के मुख से सहज ही निकल पड़ा ‘‘मैं कोई इतना पागल नहीं हो गया हूँ कि डॉक्टर हेडगेवार के पास से कागज लिखाऊँ.’ यह प्रेम कितना उच्च कोटि का था, उसका इस घटना से किंचित् अनुमान लगाया जा सकता है. डॉक्टरजी के साथ 1921 में कारागार में रहनेवाले कर्मवीर श्री पाठक ने तो कहा था कि ‘‘मतभिन्नता के कारण मैंने डॉक्टरजी के साथ उदासीनता के सम्बन्ध रखे. परन्तु उन्होंने स्नेह का सम्बन्ध सदा बनाये रखा. वे मतभेदों को कभी इतना तीव्र नहीं होने देते थे कि मित्रता टूट जाये.’’ उनकी इस विशेषता का वर्णन करते समय ‘तरुण भारत’ के सम्पादक श्री ग. त्र्यं. माडखोलकर ने कहा कि ‘‘प्रजातंत्र के लिये उनकी वृत्ति इतनी अनुकूल थी कि उनके व्यवहार में प्रत्यक्ष विरोधी को भी सौजन्य मिलता था.’’ कांग्रेस में काम करनेवाले अनेकानेक लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के उपरान्त भी डॉक्टरजी के साथ व्यवहार में अपना विरोध भूल जाते थे. डॉक्टरजी के प्रेम के सम्बन्ध में बोलते हुए कांग्रेस के प्रमुख कार्यकर्ता श्री मामा हरकरे वकील ने कहा कि ‘‘डॉक्टरजी के संघ में प्रतिज्ञित स्वयंसेवक जो काम करते हैं वह काम केवल डॉक्टरजी पर प्रेम होने के कारण करने को मेरी आज भी तैयारी है.’’ डॉक्टरजी के साथ राजनीतिक मतभेद रखनेवालों की जब यह स्थिति थी तो उनके साथ सभी क्षेत्रों में एकरस होनेवाले मित्रों के अनुभव में कितनी मिठास होगी.
पुरानी शुक्रवारी में डॉक्टरजी के साथ शैशव में गेंद खेलनेवाले तथा पाठशाला जाते हुए खट्टे बेरों का स्वाद लेनेवाले उनके एक बाल-मित्र श्री रामभाऊ पाटणकर शास्त्री पूना में रहते हैं. एक बार अनेक वर्षों के बाद नागपुर जाने पर स्वाभाविक आकर्षण के कारण वे डॉक्टरजी के यहाँ गये तथा आँगन से खड़े होकर पूछा कि ‘‘केशव है क्या ?’’ पच्चीस-तीस वर्ष से डॉक्टरजी ने उन्हें नहीं देखा था. फिर भी उनकी आवाज सुनते ही उन्होंने पहचान लिया और ‘‘राम ! तू यहाँ कब आया ?’’ कहते हुए उन्हें प्रगाढ़ आलिंगन में कस लिया. एक बार जिसे अपना कहा कि डॉक्टरजी के हृदय में उसका सदा के लिये स्थान हो जाता था. इसी प्रकार के कारण वे अपने मित्रों के बीमार पड़ने पर शुश्रूषा में रात-दिन एक कर देते थे. अपना घरबार न होते हुए भी परिचित एवं मित्रों के लड़के-लड़कियों का विवाह करने की खटपट करते रहते थे. स्वयंसेवकों के संरक्षकों को तो यही लगता था कि अपने बच्चे हमारी अपेक्षा डॉक्टरजी की ही बात ज्यादा सुनते हैं और इसलिये वे भी डॉक्टरजी के पीछे ही सदा यह राग अलापते रहते कि ‘‘मेरे लड़के को विवाह करने के लिये अब आप ही बता दीजिए.’’ प्रसिद्ध उपन्यासकार एवं पत्रकार श्री ग. त्र्यं. माडखोलकर के प्रेमविवाह को साकार करने में डॉक्टरजी की ही मध्यस्थता कारणीभूत हुई थी. उसका वर्णन श्री माडखोलकर ने अपनी पुस्तक ‘जीवन-साहित्य’ में बड़े सुन्दर शब्दों में किया है. वे लिखते हैं कि ‘‘मेरे कर्जे की अभी दो किस्तें बाकी थीं. नागपुर में इस समय मैं इतना अपरिचित था कि मुझ जैसे बेघरबार तथा अज्ञात तरुण को अपनी कन्या देना अंधेरे में छलाँग मारने के समान ही साहस का काम था. फिर मैने जिस लड़की को देखा वह तो अपने माँ-बाप की इकलौती बेटी थी.’’ पर इतने पर भी डॉक्टरजी के प्रयत्न से रास्ता निकल आया तथा गजाननराव ‘मीरा’ के ‘प्रभु’ हो गये.
उनकी मित्रता की भावना उत्कट थी और उसका प्रत्यय स्थान-स्थान पर आये बिना नहीं रहता था. प्रसिद्ध सर्वोदयवादी कार्यकर्ता स्व. तात्याजी वझलवार का अनुभव इस दृष्टि में उल्लेखनीय है. गर्मी में अधिकारी शिक्षण वर्ग के दिनों में समय बचाने के उद्देश्य से डॉक्टरजी तात्याजी के यहाँ स्नान के लिए जाते थे. उन दोनों के सम्बन्ध इतने निकट के थे कि बातचीत में वे एकवचन का ही प्रयोग करते थे. एक दिन डॉक्टरजी के साथ गये हुए स्वयंसेवक ने तात्याजी द्वारा डॉक्टरजी को ‘केशव’ नाम से सम्बोधन करते हुए सुना. जब डॉक्टरजी स्नानघर में चले गये तो उस स्वयंसेवक ने तात्याजी से कहा ‘‘यह तो ठीक है कि आपकी डॉक्टरजी से मित्रता है. पर हमें ऐसा लगता है कि आप डॉक्टरजी को ‘केशव’ के स्थान पर ‘केशवराव’ कहें तो अच्छा रहेगा.’’ थोड़ी देर में डॉक्टरजी बाहर आ गये तथा हँसते हुए तात्याराव ने उस स्वयंसेवक द्वारा दी गयी सूचना उनके सामने रखी. यह सुनते ही डॉक्टरजी गम्भीर हो गये. थोड़ी देर में स्वयंसेवक की ओर मुड़कर कहने लगे ‘‘मुझे केशव कहकर पुकारनेवाले अब नागपुर में दो-चार तो रहे ही हैं. उन्हें भी आप अजी-तजी कहने के लिये विवश करेंगे ?’’ यह कहते हुए डॉक्टरजी तथा तात्याजी की आँखे डबडबा आयीं.

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