प्रेम और सत्य की शक्ति हमारा बचाव करती है – डॉ. मोहन भागवत जी Reviewed by Momizat on . संघ के इतिहास में कितने ही प्रसंग आए, संघ को समाप्त करने का प्रयास किया. संघ समाप्त नहीं हुआ, लेकिन संघ को समाप्त करने वाले समाप्त हो गए. क्योंकि ये प्रेम लेकर संघ के इतिहास में कितने ही प्रसंग आए, संघ को समाप्त करने का प्रयास किया. संघ समाप्त नहीं हुआ, लेकिन संघ को समाप्त करने वाले समाप्त हो गए. क्योंकि ये प्रेम लेकर Rating: 0
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    प्रेम और सत्य की शक्ति हमारा बचाव करती है – डॉ. मोहन भागवत जी

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    संघ के इतिहास में कितने ही प्रसंग आए, संघ को समाप्त करने का प्रयास किया. संघ समाप्त नहीं हुआ, लेकिन संघ को समाप्त करने वाले समाप्त हो गए. क्योंकि ये प्रेम लेकर चलने वाला, सत्य लेकर चलने वाला काम है. उस प्रेम की, सत्य की शक्ति हमारा बचाव करती है. जैसे प्रह्लाद की रक्षा हिरण्यकश्यपु से नरसिंह भगवान ने किया. चलेगा, बढ़ेगा, सबको अपने आगोश में लेकर भारत वर्ष को उन्नत बनाने के अभियान को गति देगा. ऐसा अपना संघ का काम है, हम सबका काम है.

    सरसंघचालक जी बरेली में आयोजित भविष्य का भारत – संघ का दृष्टिकोण, प्रबुद्ध नागरिकों के कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे.

    लेकिन इतना अपप्रचार होता है. अपप्रचार करने वाले जितने आरोप हम पर लगाते हैं, वो सब आरोप उन पर लागू होते हैं, हम पर नहीं होते. कौन-कौन हैं, आप देख लीजिए, उनका अध्ययन कर लीजिए, उनके इतिहास का और वर्तमान का, उनका भविष्य भी ध्यान में आ जाएगा. उनकी चाल है कि वहम पैदा करना, वहम का डर दिखाकर अपने पीछे भीड़ एकत्रित करना. हम भीड़ जमा करने पर विश्वास नहीं करते, हमें किसी को हराना नहीं है, हमारा कोई दुश्मन नहीं है. ये सब जो लोग कर रहे हैं, हमें उन्हें भी जोड़ना है, पूरा समाज यानि पूरा समाज, उसमें कोई नहीं छूटेगा. ये सब हमारे अपने हैं. हमारे मन में गुस्सा भी नहीं है.

    प्रचार के हथकंडे चलते हैं, कभी-कभी समझ में न आने के कारण भी होता है. मुझे एक प्रश्न पूछा कि कितनी संतान हों. ये छपा है कि मैंने दो बच्चों का कहा. लेकिन मैंने ऐसा कहा ही नहीं कि दो बच्चे होने चाहिए. मैंने कहा कि हमारा संघ का एक प्रस्ताव है जनसंख्या पर, क्योंकि जनसंख्या एक समस्या भी है और एक साधन भी बन सकती है. इन सबका विचार करके एक नीति बननी चाहिए. सबका मन बनाना चाहिए उसके लिए और बाद में लागू करनी चाहिए सब पर….मन बना है तो फिर कठिनाई नहीं आएगी. कैसे समझा पता नहीं, ये भी हो सकता है कि पहले से प्रतिमा बनी हुई हो, इनका अगला एजेंडा…वगैरह-वगैरह बातें…..उसके कारण यह हो रहा है.

    अब, इतना होता है कि कभी हम खंडन करते, कभी नहीं करते…. हमको तो मनुष्य बनाना है, हमें सबको प्रेम से जोड़ना है, इस झंझट में हम कहां पड़ें. हमको तो कोई चुनाव नहीं जितना है, हमारे वोट कम ज्यादा होते नहीं, बढ़ते ही रहते हैं. तो इसलिए अगर आपको संघ को समझना है तो सीधा संघ में आकर देखिए. अंदर आकर देखिए, आने जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं, कोई फीस नहीं लगती, कोई मेंबरशिप नहीं. आएये, रहिये, देखिये, अध्ययन कीजिए, संघ कैसा है, क्या है, संघ के शिविरों, कार्यक्रमों में जाइये, संघ के कार्यकर्ताओं को देखिए, उनके परिवारों को देखिए, उनके क्रियाकलापों को देखिए. तो आपको संघ समझ में आएगा. चीनी मीठी होती है, इस पर भाषण हो सकता है. लेकिन ध्यान में नहीं आता, एक चम्मच खा लीजिए, ध्यान में आता है, मीठी यानि क्या.

    संघ को अंदर आकर प्रत्यक्ष देखने के बाद जो मन बनाएंगे, मत बनाएंगे, हमारे लिए वह ठीक है. विरोध भी होना है तो वह गलतफहमियों पर आधारित नहीं होना है, सत्य पर आधारित विरोध होता है तो वह हमारे सुधार का कारण बनता है.

    कार्यकारी मंडल में पारित प्रस्ताव

    देश में जनसंख्या नियंत्रण हेतु किए विविध उपायों से पिछले दशक में जनसंख्या वृद्धि दर में पर्याप्त कमी आयी है. लेकिन, इस सम्बन्ध में अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल का मानना है कि 2011 की जनगणना के पांथिक आधार पर किये गये विश्लेषण से विविध संप्रदायों की जनसंख्या के अनुपात में जो परिवर्तन सामने आया है, उसे देखते हुए जनसंख्या नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता प्रतीत होती है. विविध सम्प्रदायों की जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अन्तर,अनवरत विदेशी घुसपैठ व मतांतरण के कारण देश की समग्र जनसंख्या विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों की जनसंख्या के अनुपात में बढ़ रहा असंतुलन देश की एकता, अखंडता व सांस्कृतिक पहचान के लिए गंभीर संकट का कारण बन सकता है.

    विश्व में भारत उन अग्रणी देशों में से था, जिसने वर्ष 1952 में ही जनसंख्या नियंत्रण के उपायों की घोषणा की थी, परन्तु सन् 2000 में जाकर ही वह एक समग्र जनसंख्या नीति का निर्माण और जनसंख्या आयोग का गठन कर सका. इस नीति का उद्देश्य 2.1 की ‘सकल प्रजनन-दर’ की आदर्श स्थिति को 2045 तक प्राप्त कर स्थिर व स्वस्थ जनसंख्या के लक्ष्य को प्राप्त करना था. ऐसी अपेक्षा थी कि अपने राष्ट्रीय संसाधनों और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए प्रजनन-दर का यह लक्ष्य समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से लागू होगा. परन्तु 2005-06 का राष्ट्रीय प्रजनन एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण और सन् 2011 की जनगणना के 0-6 आयु वर्ग के पांथिक आधार पर प्राप्त आंकड़ों से ‘असमान’ सकल प्रजनन दर एवं बाल जनसंख्या अनुपात का संकेत मिलता है. यह इस तथ्य में से भी प्रकट होता है कि वर्ष 1951 से 2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अन्तर के कारण देश की जनसंख्या में जहां भारत में उत्पन्न मतपंथों के अनुयायिओं का अनुपात 88 प्रतिशत से घटकर 83.8 प्रतिशत रह गया है, वहीं मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात 9.8 प्रतिशत से बढ़ कर 14.23 प्रतिशत हो गया है.

    इसके अतिरिक्त, देश के सीमावर्ती प्रदेशों यथा असम, पश्चिम बंगाल व बिहार के सीमावर्ती जिलों में तो मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, जो स्पष्ट रूप से बंगलादेश से अनवरत घुसपैठ का संकेत देता है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त उपमन्यु हजारिका आयोग के प्रतिवेदन एवं समय-समय पर आये न्यायिक निर्णयों में भी इन तथ्यों की पुष्टि की गयी है. यह भी एक सत्य है कि अवैध घुसपैठिये राज्य के नागरिकों के अधिकार हड़प रहे हैं तथा इन राज्यों के सीमित संसाधनों पर भारी बोझ बन सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनैतिक तथा आर्थिक तनावों का कारण बन रहे हैं.

    पूर्वोत्तर के राज्यों में पांथिक आधार पर हो रहा जनसांख्यिकीय असंतुलन और भी गंभीर रूप ले चुका है. अरुणाचल प्रदेश में भारत में उत्पन्न मत-पंथों को मानने वाले जहां 1951 में 99.21 प्रतिशत थे, वे 2001 में 81.3 प्रतिशत व 2011 में 67 प्रतिशत ही रह गये हैं. केवल एक दशक में ही अरूणाचल प्रदेश में ईसाई जनसंख्या में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इसी प्रकार मणिपुर की जनसंख्या में इनका अनुपात 1951 में जहां 80 प्रतिशत से अधिक था, वह 2011 की जनगणना में 50 प्रतिशत ही रह गया है. उपरोक्त उदाहरण तथा देश के अनेक जिलों में ईसाईयों की अस्वाभाविक वृद्धि दर कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा एक संगठित एवं लक्षित मतांतरण की गतिविधि का ही संकेत देती है.

    अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल इन सभी जनसांख्यिकीय असंतुलनों पर गम्भीर चिंता व्यक्त करते हुए सरकार से आग्रह करता है कि –

    देश में उपलब्ध संसाधनों, भविष्य की आवश्यकताओं एवं जनसांख्यिकीय असंतुलन की समस्या को ध्यान में रखते हुए देश की जनसंख्या नीति का पुनर्निर्धारण कर उसे सब पर समान रूप से लागू किया जाए.

    सीमा पार से हो रही अवैध घुसपैठ पर पूर्ण रूप से अंकुश लगाया जाए. राष्ट्रीय नागरिक पंजिका का निर्माण कर इन घुसपैठियों को नागरिकता के अधिकारों से तथा भूमि खरीद के अधिकार से वंचित किया जाए.

    अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल सभी स्वयंसेवकों सहित देशवासियों का आवाहन करता है कि वे अपना राष्ट्रीय कर्तव्य मानकर जनसंख्या में असंतुलन उत्पन्न कर रहे सभी कारणों की पहचान करते हुए जन-जागरण द्वारा देश को जनसांख्यिकीय असंतुलन से बचाने के सभी विधि सम्मत प्रयास करें.

     

     

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