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बातों से नहीं मानते लातों के भूत – भाग दो

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  • समस्त भारतीय सरकार एवं सेना के साथ
  • चीन के चहेतों से सावधान
  • वीरव्रती इतिहास का शुभारम्भ

नरेन्द्र सहगल

भारत चीन सीमा पर भारतीय क्षेत्र गलवान घाटी को शत्रु के कब्जे से मुक्त करवाने के लिए हमारे बीस सैनिकों ने जिस वीरता का परिचय दिया है, उसकी प्रशंसा समस्त भारतीयों सहित पूरा विश्व कर रहा है. हमारे जवानों ने विश्वासघाती चीनी सैनिकों का ना केवल मुकाबला ही किया, बल्कि उनके हथियार छीन कर उन्हीं से लगभग 50 शत्रु सैनिकों को मार गिराया.

भारतीय सैनिकों ने अपना बलिदान देकर अपने विजयी इतिहास में एक और अध्याय जोड़ दिया है. पूरा देश हमारी सैन्य रणनीति को समझ रहा है और समस्त भारतीय दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर सरकार एवं सेना के साथ खड़े हैं. परंतु कुछ अधकचरे एवं दिशाहीन राजनीतिक नेता और दल ऐसे भी हैं जो इस संकटकालीन परिस्थिति में भी सैन्य रणनीति को कटघरे में खड़ा करने से बाज नहीं आ रहे.

ये वही अराष्ट्रीय तत्व हैं, जिन्होंने ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ और ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी’ जैसे राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वालों का उनके पास जाकर समर्थन किया था. यह वही लोग हैं, जिन्होंने बालाकोट स्ट्राइक के समय हमारे सेनाधिकारियों से इसके सबूत मांगे थे. यह वही नेता हैं, जिन्होंने भारतीय सेना को गली के गुण्डे बताकर उन पर कश्मीर में आतंक फैलाने का आरोप मढ़ दिया था.

आज जब देश की सीमाओं पर चीन और पाकिस्तान युद्ध की दस्तक दे रहे हैं और हमारी तीनों सेनाएं शत्रु का रक्त पीने के लिए तैयार हो रही हैं, ऐसे समय में यह राष्ट्र विरोधी, मोदी विरोधी, स्वार्थी तत्व फिर सक्रिय हो गए हैं. चीन और पाकिस्तान के एजेंट के नाते काम कर रहे ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के सदस्यों से सतर्क रहने की जरूरत है. अपनी राजनीतिक जमीन से उखड़ चुके यह साम्यवादी, समाजवादी, जेहादी और कांग्रेसी मोदी विरोध के नशे में राष्ट्र की अखण्डता को खतरे में डाल रहे हैं. इन नापाक तत्वों को गद्दार न कहें तो फिर क्या कहा जाए?

वर्तमान संदर्भ में देखा जाए तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आधुनिक अवतार ‘कांग्रेस आई’ के नेता अपनी राजनीतिक औकात का परिचय देते हुए देश की सरकार और सेना से ही पूछ लिया है कि भारतीय सैनिकों को बिना हथियारों के किसने भेजा? उन्हें मरने का मौका क्यों दिया? इससे पहले तो राहुल बाबा ने प्रधानमंत्री को कहा ‘कहां छिप गया?’ यह कह कर बाहर निकलने का आदेश दे दिया था. एक यशस्वी, साहसी और तपस्वी नेता पर कीचड़ उछालने से पहले जरा अपने और अपने दल के गिरेबान में तो झांक लिया होता. देशवासियों को खेद है कि एक ऐसा नेता जो भारत, भारतीयता, भारतीय इतिहास और भारत की सनातन संस्कृति की तनिक भी जानकारी नहीं रखता, वह भारत के भावी प्रधानमंत्री के स्वप्न देख रहा है और इसी नशे में अपना, कांग्रेस का और देश का बेड़ा गर्क कर रहा है.

सारा देश जानता है कि आज चीन और पाकिस्तान जो कुछ भी कर रहे हैं, वह कांग्रेसी सरकारों की ही दिशाविहीन, अदूरदर्शी और निम्नस्तरीय नीतियों का ही नतीजा है. तिब्बत, लद्दाख, कश्मीर की समस्याएं नेहरू नीति का ही प्रतिफल हैं. अलगाववाद, आतंकवाद, नक्सलवाद के साथ भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिक दंगे, जातीय वैमनस्य और सामाजिक भीतरघात इत्यादि सभी समस्याएं कांग्रेस के साठ वर्षों के शासन काल में ही उपजी हैं. इन सब समस्याओं का शिलान्यास कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों ने स्वयं अपने हाथों से किया था. भारतीय इतिहास के इस काले अध्याय को अगर कांग्रेस नेता पढ़ लें तो अच्छा रहेगा.

  • 1962 में 37244 स्केयर मीटर का आकसाई चिन का क्षेत्र पंडित नेहरू जीने स्वंय चीन को सौंपा था.
  • 1963 में काराकोरम बाईपास का भारतीय क्षेत्र भी इसी तरह चीन के हवाले कर दिया गया.
  • 2008 में तिया, पंगनक और छबीली वैली, चाबची घाटी और 2009 में प्राचीन व्यापार केंद्र दून चेलयी के क्षेत्रों पर चीन का अधिपत्य मान लिया गया.
  • 2012 में दमपोक के भारतीय क्षेत्र में चीन ने पक्के बंकर बना लिए, इसी तरह पूर्वी लद्दाख का 640 वर्ग मील का क्षेत्र राकी नूला जब चीन ने हथिया लिया तो सरकार ने भारतीय सेना के हाथ बांध दिए.
  • जब 2013 में ही भारतीय सेना ने अपने ही क्षेत्र (लद्दाख) दौलत बेग गौहडी में बंकर बनाए तो चीन के कहने पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इन्हें तुड़वा दिया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कायरता के इस इतिहास को वीरता के इतिहास में बदला है. भारतीय सेना के पांवों में डाली गईं जंजीरों को तोड़ डाला गया है. सेना को रक्षात्मक एवं आक्रामक रणनीति अपनाने की खुली छूट दे दी गई है. चीन के साथ लगते पहाड़ी दुर्गम क्षेत्रों में सड़कों के जाल बिछ गए हैं. पक्के बंकर और सुरंगे तैयार हुई हैं. चीन के साथ लगती सीमा (एल.ए.सी.) पर भारतीय सेना की टुकड़ियां, टैंक दस्ते, लॉंचिंग पैड, मिसाइलों की तैनाती, हवाई सेना एवं समुद्री सेना की सक्रिय तैनाती इत्यादि नए भारत की नई सरकार के सशक्त इरादों का ही परिणाम है.

नए भारत की वर्तमान सरकार की ठोस सैन्य रणनीति और निडर राजनीतिक इच्छाशक्ति के परिणाम स्वरूप चीन बौखला गया है. चीन ने 2017 में डोकलाम, 2020 में लिपुलेख, पैंगाम तसो और गलवान घाटी में जब कब्जा करने के लिए सैनिक हस्ताक्षेप किया तो भारत के जवानों ने चीनी सैनिकों को वापस जाने के लिए बाध्य कर दिया. यही अंतर है कांग्रेस और भाजपा में.

वर्तमान सरकार शत्रु के घर में घुस कर मारना जानती है, परन्तु पूर्व की कांग्रेसी सरकारें तो अपने ही क्षेत्रों को शत्रुओं के हवाले करती रहीं. भारत की देशभक्त जनता को इस सच्चाई से अवगत होना चाहिए कि वे कौन सी ताकतें हैं जो चीन और पाकिस्तान के इशारे पर भारत की सरकार और सेना के मार्ग में कांटे बिछा रही हैं.

राहुल गांधी और कांग्रेस के नेताओं व प्रवक्ताओं को देशवासियों को यह भी बताना होगा कि चीन के साथ डोकलाम विवाद के समय गांधी परिवार की चीन के राजदूत के साथ हुई मुलाकात की पृष्ठभूमि क्या थी? किस अधिकार के अंतर्गत की गई थी यह मीटिंग?

देश की जनता यह भी जानना चाहती है कि डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए दो कांग्रेस नेताओं ने चीन में जाकर वहां की साम्यवादी सरकार और नेताओं से क्या गुप्त वार्ताएं की थीं?

सारांश यही है कि चीन एवं पाकिस्तान द्वारा लादे जा रहे खतरे को ध्यान में रखो और सरकार व सेना के मार्ग में रोड़े ना अटकाओ और  लातों के भूतों की श्रेणी में ना आओ….—क्रमश:

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.

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