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भाग दो – नवसृजन की प्रसव पीड़ा है – ‘कोरोना महामारी’

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नरेंद्र सहगल

भौतिकवादी विचारधाराओं का अंत

सनातन भारतीय संस्कृति का उदय

संपूर्ण विश्व को एक साथ अपनी लपेट में लेने वाले कोरोना वायरस में सभी धर्मों, विचार धाराओं और चिंतन प्रहारों को अपने गिरेबान में झांकने के लिए बाध्य कर दिया है. जो काम बड़ी-बड़ी क्रांतियां,  दो विश्वयुद्ध, जन संघर्ष, राजनीतिक परिवर्तन, सामाजिक बगावतें और कथित धर्मगुरू नहीं कर सके, वह काम कोरोना वायरस ने कर दिया है. किसी दिव्य शक्ति के उदय होने की रणभेरी है यह, प्राकृतिक परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है यह.

सारा संसार एकजुट होकर, एक ही शत्रु से, एक ही हथियार से, एक ही समय पर पूरी ताकत के साथ लड़ रहा है. कुछ छिटपुट प्रसंगों को छोड़ दिया जाए तो ऐसा लगता है मानो सभी देशों का इस समय एक ही उद्देश्य है – अपनी प्रजा के जीवन को सुरक्षित करना.

संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी समस्त विश्व को एक साथ चलने की प्रेरणा नहीं दे सकीं. विश्व शांति के सभी प्रयास इसलिए विफल हुए क्योंकि इनका आधार, कार्य पद्धति और मार्ग दिशाहीन भौतिकवाद था.

भारत की सनातन संस्कृति में वह क्षमता है, जिसके आधार पर विश्व शांति का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है. परंतु भारत की इस आध्यात्मिक क्षमता और सामर्थ्य पर विचार करने से पूर्व हमें उन विचारधाराओं की समीक्षा करने की जरूरत है जो अनेक शताब्दियों के प्रयासों के बावजूद भी संसार को सुख-शांति प्रदान नहीं कर सके. यहां हम संक्षेप में इस्लाम, ईसाइयत और साम्यवाद के तौर तरीकों पर ही विचार करेंगे.

आज विश्व के लगभग साठ देशों पर इस्लाम के अनुयायियों का वर्चस्व है. इतिहास साक्षी है कि इस मजहब के झंडाबरदारों ने खूनी जिहाद, कत्लोगारत, काफिरों (मूर्ति पूजकों) के सर्वनाश, मंदिरों के विध्वंस के सिवाए मानवता को कुछ नहीं दिया. जिस मजहब के धार्मिक ग्रंथ में निर्देश दिए हों कि इस्लाम कबूल ना करने वालों को किसी भी तरह समाप्त कर दो, उस मजहब के प्रचारकों और अनुयायियों से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे अमन चैन से युक्त विश्व की रचना करेंगे.

एक ही प्रवर्तक, एक ही पुस्तक, एक ही पूजा पद्धति और एक ही अनुयाई परंपरा पर अडिग रहने वाले धर्मगुरू समस्त विश्व की विविधताओं को साथ लेकर नहीं चल सकते. तलवार और आतंक के बल पर विश्व को ‘दारुल इस्लाम’ में बदलने की चाहत रखने वाला मजहब एक दिन अवश्य ही विश्व द्वारा अस्वीकृत हो जाएगा.

इसी तरह ‘ईसाइयत’ की कार्य-संस्कृति भी विश्व को शांत करने में पूरी तरह विफल हो गई है. आर्थिक साम्राज्यवाद की स्थापना करके संसार को अपने राजनीतिक चंगुल में लेने के एकमात्र उदेश्य से प्रेरित समाज विश्व को शांति प्रदान नहीं कर सका. जन सेवा के माध्यम से धर्मांतरण और तत्पश्चात राष्ट्रांतरण की प्रक्रिया से साम्राज्य तो स्थापित हो सकते हैं, परंतु शांति की दुल्हन का घूंघट नहीं हटाया जा सकता है.

यदि चर्च आधारित सिद्धांतों की समीक्षा की जाए तो पता चलेगा कि इस मत ने भी विश्व समाज को एक ही लाठी से हांक कर अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा को पूरा किया है. अन्यथा यह लोग यह ना कहते – “ईसा ही सत्य है – ईसा ही मार्ग है और ईसा ही लक्ष्य है”. इस मार्ग के अनुयायिओं ने भी आधे से भी ज्यादा विश्व में धर्मान्ध उन्माद मचाया है.

अगर हम साम्यवादियों की बात करें तो यह लोग जितनी ताकत और गति के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़े थे, उसी रफ्तार से धराशाही होते चले गए. दिव्य शक्ति ब्रह्म, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद और योग को धत्ता बता कर इन लोगों ने साम्यवाद के नाम पर जो वाद पैदा कर दिए, उन्हीं की आग में झुलस गए साम्यवादी. साम्यवाद के विरोधियों को किस तरह से भयानक एवं जानलेवा यातना शिविरों में मारा गया, यह सारी दुनिया जानती है.

केवल मात्र ’अर्थ’ को ही मानव के समग्र विकास की गारंटी मानने वाले साम्यवादियों ने केवल मनुष्य के शरीर एवं पेट को ही पूर्ण मानव मान लिया. मन, बुद्धि और आत्मा को तिलांजलि देकर मजदूर-किसानों का पेट भरने के इनके स्वप्निल इरादे मानव समाज के चातुर्दिक विकास की चट्टान पर सर पटक कर चूर-चूर हो गए.

सत्य तो यही है कि मानव के समग्र विकास अथवा एकात्म मानववाद की कल्पना तक भी उपरोक्त तीनों विचारधाराओं के पास नहीं है. इन तीनों के प्रयासों में ‘मनुष्यता’ कहीं दृष्टिगोचर नहीं होती. प्रचण्ड भौतिकवाद और संस्थागत स्वार्थ से प्रेरित उद्देश्य हैं इनके. इनके पास मानव को भेड़ बकरी समझने वाली विचारधारा है और गैर इनसानी, अहंकारी, हिंसक मार्ग है. आज विश्व में जो आतंकवाद, आप्रकृतिक जीवन रचना, हथियारों के भण्डार और विश्व युद्ध की विभीषिका जैसा वातावरण बना है, वह इन्हीं तीनों विचारधाराओं का परिणाम है.

विश्व मानव त्रस्त है, मानवता कराह रही है. कोरोना जैसी व्याधियां चुनौति दे रही हैं. चारों ओर अधर्म का साम्राज्य व्याप्त है. विश्व को प्रतीक्षा है, किसी ऐसे अवतार की जो धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए पुन: धरती पर अवतरित हो. निश्चित रूप से भारत की सनातन संस्कृति की कोख से वह अवतरण हो चुका है.

बहुत शीघ्र सारे संसार के कर्णपुटों पर गगनभेदी उद्घोष होगा – ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ – ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ सभी प्राणियों में एक ही आत्मा का वास है, जो एक समान, सार्वभौम और सर्वस्पर्शी है. सारा विश्व इस वेद वाक्य का अनुसरण करेगा और इसे सार्थक रूप भी देगा – ‘संगच्छध्वं संवदध्वं’ अर्थात् सभी एक साथ चलें और स्नेहपूर्वक संवाद करें. ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ सारा संसार एक परिवार है.

हमारा भारत पुन: बनेगा विश्वगुरू. इस प्रकार के ‘विश्वगुरू-तत्व’ का जन्म भारत की धरती पर होने वाला है. रणभेरी बज रही है. विश्वव्यापी आध्यात्मिक क्रांति की मशाल हाथों में लेकर हम भारतीय कदम से कदम मिला कर आगे बढ़ने वाले हैं……क्रमशः

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

 

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One thought on “भाग दो – नवसृजन की प्रसव पीड़ा है – ‘कोरोना महामारी’

  1. अत्यंत ही उत्तम विचार मुझे लगता है कि अब पूरे विश्व को भौतिक आधार को छोड़ कर त्याग वाली सनातनी परम्परा की ओर आना होगा तब ही पूरे विश्व का कल्याण होगा ऋण अन्यथा हमारे पास जो संसाधन है वे जल्द ही खत्म हो जाए गा।

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