भारत और विदेश में क्रांतिकारियों को प्रेरित करने वाले श्यामजी कृष्ण वर्मा Reviewed by Momizat on . सच्चे देशभक्त, भारत और विदेश में क्रांतिकारियों को प्रेरित करने वाले, लंदन में 'इंडिया हाउस' की स्थापना कर उसे क्रांतिकारियों का केंद्र बनाने वाले स्वतंत्रता से सच्चे देशभक्त, भारत और विदेश में क्रांतिकारियों को प्रेरित करने वाले, लंदन में 'इंडिया हाउस' की स्थापना कर उसे क्रांतिकारियों का केंद्र बनाने वाले स्वतंत्रता से Rating: 0
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    भारत और विदेश में क्रांतिकारियों को प्रेरित करने वाले श्यामजी कृष्ण वर्मा

    सच्चे देशभक्त, भारत और विदेश में क्रांतिकारियों को प्रेरित करने वाले, लंदन में ‘इंडिया हाउस’ की स्थापना कर उसे क्रांतिकारियों का केंद्र बनाने वाले स्वतंत्रता सेनानी श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म 4 अक्तूबर 1857 को माण्डवी कस्बे (गुजरात) में हुआ था. बीस वर्ष की आयु से ही वे क्रान्तिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे थे.

    पुणे में दिये गये उनके संस्कृत के भाषण से प्रभावित होकर मोनियर विलियम्स ने वर्मा जी को ऑक्सफोर्ड में संस्कृत का सहायक प्रोफेसर नियुक्त किया था.

    इंग्लैण्ड से मासिक समाचार-पत्र “द इण्डियन सोशियोलोजिस्ट” निकाला, जिसे आगे चलकर जिनेवा से भी प्रकाशित किया गया.

    इंग्लैण्ड में रहकर उन्होंने इंडिया हाउस की स्थापना की जो इंग्लैण्ड जाकर पढ़ने वाले छात्रों के परस्पर मिलन एवं विविध विचार-विमर्श का एक प्रमुख केन्द्र बना. उस समय यह भारतीय छात्रों में क्रान्ति की अलख जगाने में प्रेरणा केंद्र बना. वीर सावरकर ने वर्मा जी का मार्गदर्शन पाकर लन्दन में रहकर लेखन कार्य किया था.

    भारत लौटने के बाद 1905 में वर्मा जी ने क्रान्तिकारी छात्रों को लेकर इण्डियन होम रूल सोसायटी की स्थापना की.

    1905 के बंग-भंग आन्दोलन में कर्जन वायली की ज्यादतियों के विरुद्ध संघर्षरत रहे. उनके प्रिय शिष्य क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा ने 01 जुलाई 1909 की शाम इण्डियन नेशनल एसोसिएशन के वार्षिकोत्सव में कर्जन वायली को मारकर उसकी ज्यादतियों का प्रतिशोध लिया.

    1918 के बर्लिन और इंग्लैण्ड में हुए विद्या सम्मेलनों में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया था.

    31 मार्च 1930 को जिनेवा के एक अस्पताल में उन्होंने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया.

    उनकी अन्तिम इच्छा थी कि “मेरी अस्थियाँ मेरे भारत देश में तब ले जाई जाएं, जब देश अंग्रेजों से आजाद हो जाए.

    उनकी यह इच्छा 56 वर्ष बाद पूरी हुई. 22 अगस्त 2003 को गुजरात सरकार के प्रयासों से जिनेवा से उनकी और उनकी पत्नी भानुमती जी की अस्थियों को भारत लाया जा सका.

     

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