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भारत की संप्रभुता का पहला पड़ाव – गिलगित बाल्तिस्तान

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डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

जम्मू कश्मीर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा गिलगित बाल्तिस्तान है जो अब पाकिस्तान के कब्ज़े में है. अक्तूबर 1947 में जब पाकिस्तानी सेना ने कबायलियों की ढाल बना कर जम्मू कश्मीर पर हमला किया था, तब भी उसकी नज़र गिलगित बाल्तिस्तान पर ही लगी हुई थी. लेकिन उसे गिलगित में लड़ाई लड़ने की भी जरुरत नहीं पड़ी. १९४७ में ब्रिटिश सरकार को आशा थी कि जम्मू कश्मीर रियासत को महाराजा हरिसिंह पाकिस्तान में शामिल करेंगे. इसके लिये स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लार्ड माऊंटबेटन ने उन पर काफ़ी दबाव भी डाला. लेकिन जब ब्रिटिश सरकार को लगा कि महाराजा जम्मू कश्मीर रियासत को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनाएंगे, बल्कि उसे हिन्दुस्तान की सांविधानिक व्यवस्था का हिस्सा ही रखेंगे, तो उसने रियासत को पाकिस्तान में शामिल करवाने के लिए दोहरी रणनीति अपनाई. 22 अक्तूबर, 1947 को मुज्जफराबाद के रास्ते कश्मीर घाटी पर पाकिस्तान ने हमला कर दिया. लेकिन ब्रिटिश सरकार की आँख तो गिलगित पर लगी थी, जिसे वह हर हालत में भारत से बाहर रखना चाहती थी. इसलिए उसने रियासत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्से गिलगित को रियासत में से निकालने का षड्यंत्र रचा. उस समय वहाँ तैनात गिलगित स्काऊट्स के कमांडिंग आफिसर मेजर विलियम ब्राउन ने ब्रिटिश योजना को लागू करते हुए महाराजा हरिसिंह की सेना की टुकड़ियों पर कब्ज़ा कर लिया, वहाँ के गवर्नर घनसारा सिंह को बंदी बना लिया, वहाँ तैनात रियासती सेना के सभी हिन्दू सिक्ख सैनिकों का निर्भयता से क़त्ल कर दिया और गिलगित पाकिस्तान के हवाले कर दिया. छावनी में ब्राउन ने पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया. गिलगित पर कब्ज़ा करने के बाद, पाकिस्तानी सेना स्वयं सक्रिय हुई और उसमें बाल्तिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया. यह सेना तो लद्दाख की ओर बढ़ रही थी और उसने कारगिल पर कब्ज़ा भी कर लिया था, लेकिन बाद में भारतीय सेना ने हिमालय के शिखरों तक पर टैंक पहुँचाकर कारगिल को तो मुक्त करवा लिया.

शायद, भारतीय सेना गिलगित बाल्तिस्तान भी मुक्त करवा लेती, लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरु ने लार्ड माऊंटबेटन दम्पत्ति के जाल में आकर सीज फ़ायर लागू कर दिया. तभी से गिलगित बाल्तिस्तान पाकिस्तान के कब्ज़े में है. लेकिन आश्चर्य की बात है कि भारत सरकार ने इस इलाक़े का प्रश्न कभी पाकिस्तान के साथ नहीं उठाया.

गिलगित बाल्तिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, पूर्वी तुर्कमेनिस्तान और रूस की सीमा के साथ लगने के कारण सामरिक लिहाज़ से अत्यन्त महत्वपूर्ण है. पूर्वी तुर्कमेनिस्तान पर आजकल चीन का कब्ज़ा है, जिसे चीन आजकल सिक्यिांग के नाम से प्रचारित कर रहा है. बाग़ान गलियारा भी इसके साथ लगता है जो भारत को अफ़ग़ानिस्तान के साथ जोड़ता है. पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर के कब्ज़ाए गए हिस्से को दो भागों में बाँट रखा है. एक हिस्से को वह आज़ाद कश्मीर कहता है, जिसमें जम्मू संभाग के पंजाबी बोलने वाले इलाक़े और पंजाबी बोलने वाला मुज्जफराबाद है. इस इलाक़े में मुसलमानों का पूर्ण बहुमत है. गिलगित बाल्तिस्तान को पाकिस्तान सरकार तथाकथित आज़ाद कश्मीर में शामिल नहीं करती.

गिलगित बाल्तिस्तान में शिया समाज का बहुमत है और वह पिछले कुछ अरसे से पाकिस्तान के मुसलमानों के निशाने पर है. शिया समाज के अनेक लोगों की हत्या आतंकवादी मुसलमानों द्वारा होती रहती है. गिलगित बाल्तिस्तान का नाम, कुछ साल पहले, पाकिस्तान सरकार ने उत्तरी क्षेत्र कर दिया था. लेकिन यहाँ के शिया समाज द्वारा इसका ज़बरदस्त विरोध करने के कारण, सरकार को एक बार फिर पुराना नाम ही बहाल करना पड़ा. पाकिस्तान के संविधान में देश के जिन इलाक़ों का नाम शामिल किया हुआ है, उसमें गिलगित बाल्तिस्तान शामिल नहीं है. पाकिस्तान के उच्चतम न्यायालय ने भी निर्णय किया है कि गिलगित और बाल्तिस्तान पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है.

पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान अपने देश के मुसलमानों को लाकर गिलगित बाल्तिस्तान में बसा रहा है. शिया समाज को ख़तरा है कि पाकिस्तान की इस साज़िश के कारण, वे अपने इलाक़े में ही अल्पसंख्यक होकर रह जाएंगे. जिसके कारण शिया समाज और पाकिस्तानी मुसलमानों में झगड़े होते रहते हैं. लेकिन पाकिस्तान सरकार पर शिया समाज के इस विरोध का कोई असर नहीं हुआ.

पाकिस्तान सरकार के अनुसार इस समय गिलगित बाल्तिस्तान की कुल जनसंख्या बारह लाख है. शिया समाज का आरोप है कि इसमें इस्लामाबाद ने पाकिस्तान से लाकर मुसलमान बसा दिए हैं. ये मुसलमान शिया समाज को प्रताड़ित ही नहीं करते, बल्कि उनको दूसरी श्रेणी का नागरिक मानते हैं. चीन की इस क्षेत्र पर अरसे से नज़र है, क्योंकि चीन इसी रास्ते से अरब सागर या सिन्धु सागर में आ सकता है. जहाँ वह बलूचिस्तान में ग्वादर बंदरगाह का निर्माण कर रहा है. कहने को यह बंदरगाह पाकिस्तान के क्षेत्र में है, लेकिन व्यवहारिक रूप से यह चीन का अड्डा बन रहा है. पाकिस्तान भी शिया समाज पर नियंत्रण के लिए चीनी सेना का डर बिठाना चाहता है. यह क्षेत्र यूरेनियम का भी भंडार है. पाकिस्तान ने इस क्षेत्र में आने के लिए चीन को सभी सुविधाएँ प्रदान कर दी हैं.

पाकिस्तान ने निर्माण कार्य के नाम पर इस पूरे क्षेत्र में चीनी सेना को ही बुला लिया है. चीन ने पूर्वी तुर्कमेनिस्तान के कशागार से लेकर इस्लामाबाद को जोड़ने वाली सड़क बना ली है. यह सड़क गिलगित में से होकर जाती है और कराकोरम मार्ग या सिल्क रूट रोड कहलाती है. अब अनेक स्थानों पर चीनी सैनिकों और यहाँ के स्थानीय शिया समाज से भी झगड़े होते रहते हैं.
सामरिक दृष्टि से पाकिस्तान और चीन मिल कर हिन्दोस्तान की घेराबन्दी कर रहे हैं, जिसके लिये हिन्दोस्तान के ही इलाक़े गिलगित बाल्तिस्तान का दुरुपयोग किया जा रहा है. लेकिन इसके कारण इस पूरे इलाक़े में शिया समाज की पहचान और महत्व संकट में पड़ गया है. चीन और पाकिस्तान के इस व्यवहार से गिलगित बाल्तिस्तान में चीन व पाकिस्तान के प्रति विरोध तो बढ़ ही रहा है, साथ ही अपनी मूल संस्कृति और भाषा के प्रति रुझान भी बढ़ रहा है. अभी यहाँ की भाषाएँ अरबी लिपि में लिखी जाती हैं, लेकिन अब यह माँग भी उठ रही है कि इसे भोटी लिपि में लिखा जाए जो बाल्तिस्तान की अपनी लिपि है. इसी प्रकार शीना भाषा, बुरुशसकी को पढ़ाने की माँग भी उठने लगी है. युवा पीढ़ी एक बार फिर बुद्ध में रुचि लेने लगी है.

यही कारण है कि पाकिस्तान से लाकर बसाए गए मुसलमानों, अरब मूल के सैयदों और मध्य एशिया मूल के तुर्कों व मुग़लों ने माँग करनी शुरु कर दी है कि गिलगित बाल्तिस्तान को पाकिस्तान का पांचवां प्रान्त बना दिया जाए. चीन भी पाकिस्तान पर इसके लिए दवाब ना रहा है. लेकिन गिलगित बाल्तिस्तान का शिया समाज इसका डट कर विरोध कर रहा है. इमरान खान की सरकार किसी प्रकार वहाँ की स्थानीय सरकार को भंग कर प्रशासन का नियंत्रण अपने हाथ में लेना चाहती है. उसमें पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट से ऐसा आदेश भी पारित करवा लिया है. भारत सरकार ने पाकिस्तान के कदम का सख़्त विरोध किया, साथ ही उसके राजदूत को विदेश मंत्रालय में बुलाकर अपना विरोध दर्ज करवाया. यह पहली बार है कि दिल्ली ने पाकिस्तान की गिलगित बाल्तिस्तान में असंवैधानिक गतिविधियों पर अपना विरोध दर्ज करवाया है.

दरअसल, भारतीय संविधान से अनुच्छेद 370 निरस्त हो जाने के बाद समस्त जम्मू कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान व चीन द्वारा अनाधिकृत रूप से कब्जाया क्षेत्र भी है, उसको लेकर सारा भ्रम एकबारगी समाप्त हो गया है. जब तक वह अनुच्छेद संविधान में विद्यमान था, तब तक यह भ्रम बन सकता है कि जम्मू कश्मीर को विवादग्रस्त होने के कारण ही अलग से ट्रीट किया गया है. लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि अलग से ट्रीट करने वाली सरकार भी चली गई है और अलग से ट्रीट करने वाला अनुच्छेद भी चला गया है. भारत के लिए गिलगित इसलिए जरुरी है क्योंकि वह मध्य एशिया के लिए हमारा सिंहद्वार है. चीन के लिए गिलगित की महत्ता इसलिए है क्योंकि वह कराकोरम मार्ग का हिस्सा है. यही हिस्सा उसे अरब सागर में पहुँचाता है. लद्दाख में चीन की भारत को भयभीत करने वाली हरकतें इसी में से उपजी हैं. परन्तु जहां तक भारत सरकार का ताल्लुक़ है, उसने स्पष्ट कर दिया है कि वह देश की अखंडता की हर हालत में रक्षा करेगी. गिलगित उस रक्षा अभियान का पहला पड़ाव है.

भारत सरकार को इस बात की बधाई देनी होगी कि उसने गिलगित बाल्तिस्तान को भी गंभीरता से अपने सक्रिय एजेंडा में शामिल किया है. लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि गिलगित बाल्तिस्तान को लेकर भारत की यह कूटनीति लम्बे समय तक चलनी चाहिए, तभी इसका लाभ होगा.

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