भारत को विश्व का सिरमौर बनाना है तो हमें भारतीयता को बनाए रखना होगा – डॉ मोहन जी भागवत Reviewed by Momizat on . भोपाल (विसंकें). अपेक्स बैंक के समन्वय भवन में सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत के कर कमलों से मृदुला सिन्हा द्वारा लिखित उपन्यास “ परितप्त लंकेश्वरी ” का लोकर्पण कि भोपाल (विसंकें). अपेक्स बैंक के समन्वय भवन में सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत के कर कमलों से मृदुला सिन्हा द्वारा लिखित उपन्यास “ परितप्त लंकेश्वरी ” का लोकर्पण कि Rating: 0
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    भारत को विश्व का सिरमौर बनाना है तो हमें भारतीयता को बनाए रखना होगा – डॉ मोहन जी भागवत

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    3भोपाल (विसंकें). अपेक्स बैंक के समन्वय भवन में सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत के कर कमलों से मृदुला सिन्हा द्वारा लिखित उपन्यास “ परितप्त लंकेश्वरी ” का लोकर्पण किया गया. मृदुल सिन्हा गोवा की राज्यपाल हैं. कार्यक्रम की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन और मुख्य अतिथि के रूप में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उपस्थित थे.

    सरसंघचालक जी ने कहा कि भारत को विश्व का सिरमौर बनना है, तो उसे भारतीयता को बनाए रखना होगा. अपनी जमीन पर पैर रखे हुए, समाज को बदलना होगा. समाज को महिलाओं और कमजोर वर्ग के प्रति अनुचित व्यवहार की प्रथाओं और परंपराओं को फैंकना होगा. सीता के साथ ही तारा और मंदोदरी को भी समझना होगा. भारतीय महिला तेजस्वी और वात्सल्य से परिपूर्ण है. उसका वात्सल्य केवल मोह नहीं है, वह सत्मार्ग का दिग्दर्शन भी कराती है. मंदोदरी का पात्र ऐसा ही है. मंदोदरी के प्रयास भले ही असफल रहे, किन्तु वो असफल नहीं थी. इसीलिये जो परिवार प्रात: स्मरणीय पांच कन्याओं का स्मरण करेगा, उसके मर्म को समझेगा, वह सब प्रकार के पाप कर्मों से मुक्त रहेगा. महिलाओं और तथाकथित शूद्रों के साथ जो कुछ वर्षों से हुआ है, वह शास्त्र सम्मत नहीं है. पूरा समाज अपना व्यवहार सही रखता है.. तब ही देश बड़ा बनता है.”

    पू. सरसंघचालक जी ने बचपन के शाखा और प्रातःस्मरण को याद करते कहा कि सीता, उर्मिला, मंदोदरी, अनुसुईया, तारा के चरित्र के स्मरण मात्र से ही पाप का नाश होता है. रामायण का कथानक पुराना है. उस समय के कथानक का उल्लेख आज के उपन्यासों में बहुत ही कम मिलता है. रामायण हमें बताती है कि दुनिया कैसी है और हमें किस तरह बनना चाहिए. मंदोदरी के जीवन को बताते हुए भारतीय संस्कृति में नारी के स्थान देवताओं के बराबर माना गया है.

    Mohan-Bhagwat-in-Bhopal-Book-releaseउन्होंने कहा कि आज हर मनुष्य किसी न किसी परिस्थिति से जुड़ा होता है. जिसमें मनुष्य की परीक्षा भी होती है. वात्सल्य की अनुभूति भारत की महिलाओं के साथ ही मिलती है. सीता भूमि में चली गई, ऐसा वर्णन है. प्रकृति ने महिलाओं को वात्सल्य का गुण दिया है. नारी वात्सल्य का प्रयोग अभिस्नेह देने के लिए करती है.

    कार्यक्रम की शुरूआत करते हुए लेखिका मृदुला सिन्हा ने बताया कि मन भीगा-भीगा सा है और बरसात का मौसम भी है. इसलिए इस पुस्तक का लोकर्पण और भी महत्वपूर्ण बन जाता है. राष्ट्र की समस्याओं में बड़े-बड़े विचारों की बात का उल्लेख करते हुए सावित्री और मंदोदरी की आत्मकथा पर प्रकाश डाला है. उन्होंने कहा कि मंदोदरी का चरित्र भी भारतीय समाज को सांझ दिखाने की भांति हैं. रामायण में सीता, राम, लक्ष्मण और हनुमान के प्रसंग का सुन्दर वर्णन किया गया है. लेकिन रावण की पतिव्रता पत्नी मंदोदरी का उल्लेख तुलसीदास ने दो जगह ही किया है. मंदोदरी भी सीता की तरह जीवित है. हमारी बेटियां जल, थल, नभ हर जगह जा रही है. परितप्त लंकेश्वरी उपन्यास हमारी 46 रचनाओं में सबसे प्रमुख मंदोदरी रचना है और निरन्तर लिखती रहूंगी.

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पुस्तक में वर्णित मंदोदरी की रचना को भारत के अत्यंत प्राचीन महान इतिहास बताया है. उन्होंने दो महाकव्य रामायण, महाभारत में राम भगवान और कौरव के प्रंसग को सुनाते हुए भारत के प्रचीन नालंदा विश्वविद्यालय का भी उल्लेख किया. आज भी गांवों में राम-राम बोला जाता है और लोगों के रग-रग में जन्म से मृत्यु तक आज भी राम-राम शब्द गुंजायमान है. पति के साथ वनवास पर जाने का प्रसंग आज भी प्रेरणा देता है. भक्ति की पराकाष्ठा वीर हनुमान से सीखी जा सकती है. लेकिन मंदोदरी की पतिव्रतता सीता के ही सामान है, रावण कूटनीतिज्ञ भी था और विद्वान भी था. लेकिन अंहकार के कारण ही उसकी मृत्यु संभव हो पायी. यदि मंदोदरी की बात रावण मान जाता तो रावण जैसे राक्षस की मृत्यु संभव नहीं थी. पुत्र मेघनाथ, सोने की लंका और पति को बचाने के लिए मंदोदरी ने अंतिम क्षण तक पर्यत्न किया, लेकिन रावण नहीं माना और अंत में वह मारा गया.

    लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने पंच कन्या का उल्लेख करते हुए कहा कि मंदोदरी के बारे में कम बोला जाता है. इसलिए इनके बारे में लिखा गया. आज रावण जैसे अनेकों राक्षस है जो सोने की लंका और सब प्रकार का वैभव होते हुए भी अभिमानी होता है. “ यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ” यह हमारी संस्कृति है.. उन्होंने प्रभात प्रकाशन को धन्यवाद देते हुए नारी की स्मिता और गौरव को चित्रण करने के लिए आभार प्रकट किया.

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