भारत शक्ति संपन्न राष्ट्र बने, यही हमारी कामना है – डॉ. मोहन भागवत Reviewed by Momizat on . नागपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने कहा कि हिन्दू समाज शक्ति संपन्न रहना ही चाहिये. शक्ति के बिना वचन किसी काम के नहीं र नागपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने कहा कि हिन्दू समाज शक्ति संपन्न रहना ही चाहिये. शक्ति के बिना वचन किसी काम के नहीं र Rating: 0
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    भारत शक्ति संपन्न राष्ट्र बने, यही हमारी कामना है – डॉ. मोहन भागवत

    नागपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने कहा कि हिन्दू समाज शक्ति संपन्न रहना ही चाहिये. शक्ति के बिना वचन किसी काम के नहीं रहते. दुनिया शक्ति की भाषा ही समझती है, अत: शक्ति संपन्न राष्ट्र यही हमारी कामना है. समाज में इन विचारों का संचार करने का कार्य स्वातंत्र्यवीर सावरकर जीवनभर करते रहे. दुर्भाग्य से हम उनको, उनके विचारों को समझ न सके, अत: यदि भारत को दुनिया का एक ताकतवर राष्ट्र बनना है तो स्वातंत्र्यवीर सावरकर का यह सन्देश अब कृतिरूप में उतारना होगा. ऐसा संकल्प हमें करना पड़ेगा.

    सरसंघचालक स्वातंत्र्यवीर सावरकर स्मारक समिति द्वारा दिये जाने वाले स्वातंत्र्यवीर सावरकर जीवन गौरव पुरस्कार समारोह में संबोधित कर रहे थे. शिक्षक सहकारी बैंक के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में वैज्ञानिक डॉ. विजय भटकर को जीवन गौरव सम्मान प्रदान किया गया.

    स्वातंत्र्यवीर सावरकर के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि वीर सावरकर जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था. उनकी आलौकिक प्रतिभा का वर्णन कुछ मिनटों में नहीं हो सकता. उनके जीवन के प्रत्येक पहलू पर विचार करने के लिये उतने दिनों की ही व्याख्यानमाला करनी पड़ेगी. दुर्दम्य आशावाद यह उनका विशेष गुण था, जुझारू थे, ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष करते हुए पकड़े जाने पर तथा अंडमान की दो आजन्म (25-25 वर्ष की) कालेपानी की सजा सुनने के बाद हंसकर बोले थे कि 50 वर्ष तक ब्रिटिश शासन भारत में रहेगा क्या? ‘राष्ट्र के लिए आपना सारा व्यक्तिगत जीवन राष्ट्रवेदी पर आहुत करने पर उन्हें क्या मिला? स्वतंत्रता के बाद भी केवल शासन की तरफ से उपहास, निंदा, अपमान, झूठे आरोप यही तो मिला, जो शिव के समान विषप्राशन करने जैसा था. बचपन में उन्होंने जो देश, धर्म के लिए प्रतिज्ञा ली थी, वह जीवन के अंत तक निभाई. भव्य और उद्दात्त ध्येय सामने रखकर, उसी कठोर मार्ग पर अपने व्यक्तिगत सुख की आहुति देकर जीवन यापन करना कोई साधारण कार्य नहीं था, जो वे जीवन पर्यंत करते रहे. उनका साहित्य हमारे हृदय में आज भी संवेदना उत्पन्न करता है.

    उन्होंने कहा कि आज वायु सेना ने प्रत्यक्ष कृति करके पुलवामा में बलिदान जवानों को सच्ची श्रद्धांजलि दी है. सावरकर जी के विचार मानने वाले लोग सरकार में आज हैं, इसलिये यह संभव हो पाया. यदि इसी विचार से देश आगे कार्य करेगा तो उनके आत्मार्पण का सही मायनों में सम्मान होगा.

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