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भारी पड़ती कर्बला की बला

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मुसलमानों का एक वर्ग तथाकथित मजहबी आयोजन की आड़ में इस देश के कानून को आये दिन ठेंगा दिखा रहा है, सड़कों पर उतर कर तोड़-फोड़ कर रहा है, पुलिस उन्हें रोकती है तो उन पर पत्थर बरसाए जाते  है . यह सब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन.सी.आर.) और दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री निवास से मात्र दो किलो मीटर की दूरी पर  होता है, लेकिन उसकी निन्दा न तो सेकुलर मीडिया करता है और न ही सेकुलर नेता. मानो उनकी जुबान पर ताला लगा हुआ है. यह सब क्यों हो रहा है, यह जानेंगे तो आप भी हैरान रह जायेगे. यह सब हो रहा है कर्बला के आसपास के सरकारी भूखण्डों पर जबरन कब्जा करने के लिये.

उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली में प्रधानमंत्री निवास से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर कर्बला है. इसका आधुनिक नाम बटुकेश्वर दत्त (बी.के.) कॉलोनी है. यहां 1947 में भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थियों को बसाया गया था. यहां कुल 1100 घर हैं. केवल एक घर मुसलमान का है.  कॉलोनी के अन्दर कई बड़े-बड़े सरकारी भूखण्ड हैं. कॉलोनी के बीचोंबीच ‘दरगाह-शाहे-मरदान’ भी  है. इसका क्षेत्रफल 4 बीघा, 17 बीसवा है. इसकी देखरेख दिल्ली वक्फ बोर्ड से जुड़ी एक संस्था ‘अंजुमन हैदरी’ करती है. इसके अलावा कानूनन कोई भी भूखण्ड अंजुमन हैदरी का नहीं है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ही इस संस्था से जुड़े लोगों ने कॉलोनी के प्राय: सभी सरकारी भूखण्डों पर जबरन कब्जा कर लिया है. यहां तक कि उन भूखण्डों पर कॉलोनी के निवासियों का प्रवेश भी पूरी तरह बन्द है.  रेजीडेन्ट वेलफेयर एसोसिएशन (आर.डब्ल्यू.ए.) बी.के.दत्त कॉलोनी के अध्यक्ष  कर्मवीर सिंह नागर कहते हैं,  ‘लगता है कि दिल्ली में कोई सरकार ही नहीं है. मुसलमानों ने अरबों रु. की सरकारी जमीन पर जबरन कब्जा कर लिया है, किन्तु सरकार उस जमीन को वापस लेने के लिए कोई कार्रवाई नहीं कर रही है. यह मुस्लिम तुष्टीकरण नहीं तो क्या है? हम हिन्दुओं को सरकार अपनी ही कॉलोनी में कोई कार्यक्रम करने की अनुमति नहीं देती है, जबकि बाहर से सैकड़ों की संख्या में आये मुसलमान हमारी कॉलोनी में बिना सरकारी अनुमति के जलसा करते हैं, भड़काऊ भाषण देते हैं. इस कारण हिन्दुओं की इस कॉलोनी में हिन्दू ही दहशत में जीवन जी रहे हैं. हम कानून नहीं तोड़ रहे हैं शायद इसलिए हमें दबाया जा रहा है, और जो कानून तोड़ रहे हैं उन्हें सरकारी शह मिल रही है. देश की राजधानी में हिन्दुओं के साथ इतना बुरा व्यवहार हो रहा है और दुर्भाग्य से कोई कुछ बोल नहीं रहा है’.

उल्लेखनीय है कि यहां के लोग वर्षों से यह मांग कर रहे हैं कि इन भूखण्डों को पार्क के रूप में विकसित किया जाये. जब सरकार ने ऐसा नहीं किया, तो कॉलोनी के लोग इस मामले को लेकर 2005 में दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंचे. वहां यह मामला अभी तक लंबित है.

इधर अंजुमन हैदरी जबरदस्ती पर उतर आई है. कर्बला के पास ही स्थित एक नर्सरी पर कब्जा करने के लिए आये दिन मुसलमानों की भीड़ जुटाई जा रही है. सार्वजनिक सम्पत्ति में आग लगाई जा रही है. पहले 10 मार्च और फिर 31 मार्च को ऐसा ही किया गया. उत्तर प्रदेश के रामपुर, मुरादाबाद, बरेली, मेरठ और दिल्ली के विभिन्न इलाकों से बसों में ठूंस-ठूंस कर हजारों मुसलमान कर्बला लाये गये, जबकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने कर्बला में किसी भी तरह के आयोजन पर रोक लगा दी थी. इसके बावजूद भारी संख्या में मुस्लिम कर्बला पहुंच गये. जब पुलिस ने उन्हें नर्सरी में घुसने से रोका तो उन लोगों ने पुलिस पर जमकर पथराव किया. इस कारण दो दर्जन से अधिक पुलिस वाले बुरी तरह घायल हो गये.

उच्च न्यायालय के आदेश पर दिल्ली पुलिस ने उत्तर प्रदेश से आने वाले मुसलमानों को सीमा पर ही रोक लिया था और इधर कर्बला के आसपास भी सुरक्षा बढ़ा दी थी. दो मेट्रो स्टेशन (जोरबाग और आई.एन.ए.) भी आठ घंटे बन्द रखे गये. लेकिन समाचारों के अनुसार उसी समय केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे और सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल ने एक बैठक कर पुलिस को आदेश दिया कि मुसलमानों को कर्बला आने दें. इसके बाद कर्बला में देर रात तक हंगामा होता रहा. हंगामा इस बात के लिए भी हुआ कि किसी मजहबी आयोजन को अदालत कैसे रोक सकती है? जबकि यह किसी भी तरह से मजहबी आयोजन नहीं था. यह विशुद्ध रूप से सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति थी.

30 मार्च को कर्बला में मजहबी नेताओं ने अपने भाषणों में सरकार को चेतावनी भी दी कि यदि नर्सरी वाली जमीन  उन्हें नहीं दी गई तो मुसलमान  कांग्रेस को वोट नहीं देंगे. इस चेतावनी का असर भी हुआ. 2 अप्रैल को पुलिस ने नर्सरी के गेट पर ताला जड़ दिया है, जबकि इस मामले पर न्यायालय ने यथास्थिति बनाए रखने को कहा है. माना जा रहा है कि पुलिस ने केन्द्र सरकार के आदेश पर ऐसा किया है.

आर.डब्ल्यू.ए. के एक अन्य पदाधिकारी सोहनलाल  कहते हैं, ‘पहले यहां किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं होती थी. अब यहां हमेशा दहशत का माहौल रहता है. स्थानीय हिन्दुओं में भय पैदा करने और सरकारी जमीन पर कब्जा बनाये रखने के मकसद से सैकड़ों मुसलमान यहां महीने में कम से कम चार बार इकट्ठे होते हैं और रात-रात भर भाषणबाजी होती है. कॉलोनी में मुसलमानों की इतनी भीड़ हो जाती है कि लोग अपने घरों में बंधक बन कर रहने को मजबूर हो जाते हैं. घर से महिलाओं और लड़कियों का निकलना तो खतरे से खाली नहीं है. शोरगुल से बच्चों की पढ़ाई भी बाधित होती है. हम लोग यहां कैसे रह रहे हैं, इसकी कल्पना कोई भुक्तभोगी ही कर सकता है’.

कर्बला की इस बला को बढ़ाने में कांग्रेसी नेताओं का बड़ा हाथ है. बी.के.दत्त कॉलोनी के निवासी अनिल चौधरी कहते हैं, ‘जिन सरकारी भूखण्डों पर जबरन कब्जा किया गया है, उन पर पहले स्थानीय लोग भैंस पालते थे और दूध का व्यवसाय करते थे. करीब तीन दशक पहले सरकार ने उन्हें दूसरी जगह भेज दिया. इसके बाद अंजुमन हैदरी के लोगों की नजर इन भूखण्डों पर पड़ी. तभी से ये लोग इन पर कब्जा करना चाहते थे, पर ये सफल नहीं हुये. जैसे ही उन्हें राजनीतिक अनुकूलता मिली उन्होंने इन भूखण्डों पर कब्जा कर लिया. खास कर कांग्रेसी नेताओं ने उनके मनोबल को बढ़ाया. दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने खुलेआम यह कहा कि कर्बला के मामले में  जिन मुस्लिमों पर मुकदमा चल रहा है वह वापस लिया जायेगा. जब नेता इस तरह की बात करेंगे तो ये लोग कहीं भी सरकारी जमीन कब्जा लेंगे’.

स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि इस मामले का जल्दी निपटारा किया जाना चाहिये. इससे लोगों को आये दिन आने वाली समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा और सरकारी पैसे की भी बचत होगी. जो पुलिस वाले 15 जनवरी, 2012 से दिन-रात यहां ड्यूटी दे रहे हैं, उन्हें जहां जरूरत है वहां भेजा जा सकता है.

 

सौजन्य : www.panchjanya.com

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