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मिशन बिजनौर की कमान अब एनआइए के पास

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बिजनौर (विसंके, मेरठ). बिजनौर में विस्फोट के बाद फरार छह सिमी के आतंकियों को खोजने का मिशन अब नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी (एनआइए) ने संभाल ली है.  एनआइए ने आज से ? ही अपना काम भी शुरू कर दिया है. 12 सितंबर को बिजनौर के जाटन में एक मकान में विस्फोट के बाद से वहां रहने वाले सभी लोग फरार है.

पुलिस के साथ जांच में लगी एसटीएफ तथा एटीएस उत्तर प्रदेश ने इन फरार आतंकियों के कमरे से एल्बो पाइप में भरा विस्फोटक, तार लगा सिलेंडर, नाइन एमएम की पिस्टल, डेटोनेटर, लैपटॉप, बारूद, फर्जी मतदाता पत्र आदि बरामद किया था.  इसके बाद से ही बिजनौर पुलिस, एसटीएफ और नोएडा व मेरठ की एटीएस लगातार आतकियों को दबोचने के लिये अभियान छेड़े हुये है.  आईबी व अन्य खुफिया एजेंसी भी खोजबीन में जुटी हैं.  पांच दिन बाद भी सुराग नहीं मिलने से कयास लगाये जा रहे हैं कि आतंकी भाग चुके हैं.

नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी की टीम ने कल से ? मोर्चा संभाला. डीएसपी पीके अवस्थी टीम के साथ मोहल्ला जाटान पहुंचे और आतंकियों के कमरे को देखा.  थाने पहुंचकर आतंकियों के कमरे से बरामद सामान की जांच की.

एटीएस व एसटीएफ मान रही है कि आतंकी जिले में ही कहीं पनाह लिये हुये हैं. पुलिस दल इनके ठिकानों और मददगारों की तलाश में भागदौड़ कर रहे हैं. पुलिस के साथ अन्य टीमें भी बिजनौर के आसपास के आधा दर्जन गांवों के अलावा धामपुर, नगीना और नजीबाबाद तहसील क्षेत्र के चिह्न्ति गावों में भी छापे मार रही हैं.

आतंकियों के कमरे में थी विस्फोटक प्रयोगशाला

बिजनौर के जाटान मुहल्ले में इन आतंकियों का कमरा उनका ठिकाना ही नहीं बल्कि प्रयोगशाला भी थी. कमरे से बरामद ब्लैक पाउडर को जानकार आरडीएक्स मान रहे हैं.  आतंकियों के कमरे का विधि विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक व अन्य विशेषज्ञों ने भी गहनता से परीक्षण किया है. उन्होंने दरवाजे व दीवार पर बने निशानों को परखा है. बारूद के निशानों से प्रतीत होता है कि वह विस्फोटक सामग्री का वहीं परीक्षण करते थे. विधि विज्ञान प्रयोगशाला की टीम को आइईडी इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस मिली हैं. इन्हें बम बनाने के काम में इस्तेमाल किया जाता रहा है.  ब्लैक पाउडर को विस्फोट के लिये लाये जाने की आशंका जताई जा रही है.  आरडीएक्स रिसर्च डेवलपमेंट एक्सप्लोसिव प्रतीत होने वाला ब्लैक पाउडर बम बनाने के काम आता है.  वैज्ञानिकों की टीम को मौके से माचिस की तीली का भूरा पाउडर, खिड़की का कांच, लोहे के पाइप, एल्बो और टेप से तार जुड़ा ढाई किलो का रसोई गैस सिलेंडर मिला. इनका भी इस्तेमाल बम बनाने में किया जाता है, साथ ही इनके परीक्षण के निशान भी मिले हैं.  दीवार पर मारकर इसकी तीव्रता नापी जाती थी.  विधि विज्ञान प्रयोगशाला के विशेषज्ञ डॉक्टर अरुण कुमार शर्मा ने बताया कि आगरा की विधि विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट से स्पष्ट हो जायेगा कि बारूद का पाउडर कितना खतरनाक था.

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