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यूरोप-अमेरिका के ईसाई खेमों में खलबली

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पश्चिमी यूरोपीय देश एवं अमेरिका अपने यहां के लोकतंत्र एवं सामाजिक एकात्मता का जब उल्लेख करते हैं तब पंथनिरपेक्षता, पंथ के परे की भूमिका अथवा सेक्युलरिज्म का उल्लेख जरूर करते हैं. मुख्य रूप से इन देशों के नागरिक, मिशनरी, व्यावसायिक प्रतिनिधि, विदेश नीति क्षेत्र के कूटनीतिक और वास्तव में विदेशों के दौरे पर जाने वाले मंत्रिगण अपने सेक्युलरिज्म पर जोर देते हैं. इसका संदर्भ यह होता है कि ‘हमारे देश में हमारा पंथ हमें प्रिय हो तो भी आपके देश में आपके पंथ के बारे में हमारे अंदर उतना ही आदर है. आपकी संस्कृति में तो हमारे लिये काफी कुछ लेने जैसा है’, वगैरह वगैरह. यही भूमिका लेकर यूरोप और अमेरिका के साठ सत्तर देश अन्य देशों से संबंध बढ़ाते हैं एवं इसमें से अनेक प्रकार के लाभ भी प्राप्त करते रहते हैं. इन विदेशी लोगों की हमारे देश में विचरण करने की शैली देखकर हमें भी इसमें कुछ अलग सा प्रतीत नहीं होता. क्या सेक्युलरिज्म से पश्चिमी लोगों का यह प्रेम प्रामाणिक है, इस विषय पर अभी गौर करना शुरू हुआ है, क्योंकि इस सेक्युलरिज्म के विरोध में यूरोप और अमेरिका में बड़ी मुहिम शुरू हुई है. यह विषय अभी ध्यान में आने का कारण यह है कि एक तरफ स्वेच्छाचार एवं दूसरी तरफ ईसाई समाज में ही इस परंपरा को न मानने वालों की संख्या पचास प्रतिशत से अधिक हो गई है. समाज में स्वेच्छाचार का बढ़ता हुआ रुख एवं पंथ को न मानने की यह समस्या वैसे केवल यूरोप और अमेरिका तक सीमित नहीं है, लेकिन इन दोनों जगहों पर यह रुख फिलहाल खतरे के निशान के पार जा चुका है. यह सागर में उठी सुनामी लहर जैसा हो चला है.

सारे यूरोपीय देशों की स्थायी भूमिका यही है कि ‘इस भूतल पर केवल ईसा मसीह को स्वीकार करने वाला ही पार लग सकता है, दूसरे किसी भी मार्ग से नहीं. ‘दुनिया का उद्धार केवल ईसा मसीह के मार्ग से हो सकता है, उनकी इस भूमिका को पूरे विश्व में चुनौती मिल रही है. आज उन देशों एवं वेटिकन की असली समस्या यही है. इस विषय पर जो गोष्ठी आयोजित की गई थी, उसे नाम दिया गया था – ‘हाऊ टू कंट्रोल द सुनामी ऑफ सेक्युलरिज्म’. उसका नेतृत्व अमेरिका के वाशिंगटन डीसी के कार्डिनल डोनाल्ड वूअर्ल के पास था. संबंधित देशों में स्वेच्छाचार का असर कम हो एवं आस्तिकता की जीवनशैली और ‘गॉड फिअरिंग’ स्वभाव हो, इसके लिये अनेक देशों में प्रयास चलते रहते हैं, लेकिन ऐसे प्रयासों से पूरे यूरोप में मुहिम शुरू हुई है. इसके पीछे कुछ कारण हैं. वे कारण हैं कि दो वर्ष पूर्व पोप बेनेडिक्ट सोलह ने इस गोष्ठी का नेतृत्व किया. उस पंद्रह दिन की चर्चा से जो कार्यक्रम पत्रिका तैयार हुई, वह अब उन देशों में कानून और व्यवस्था संभालने वाले सत्ताधारी, प्रशासक, शिक्षा संस्थाओं, सांस्कृतिक संस्थाओं, चर्च के जमीनी स्तर के पदाधिकारियों, महिला संगठनों तक पहुंच चुकी है.

वेटिकन काउंसिल आमंत्रित करने का कारण यह था कि ये पचास वर्ष पूर्व हुई ‘सेकिंड वेटिकन’ परिषद की स्वर्ण जयंती के तौर पर आयोजित हुई थी. ‘सेकिंड वेटिकन’ परिषद पांच वर्ष तक चली थी. पिछले एक हजार वर्ष में सबसे बड़ी एवं सबसे परिणामकारक परिषद के रूप में किसी परिषद का उल्लेख करना हो तो वह ‘सेकिंड वेटिकन’ ही है. विश्व में यूरोप और अमेरिका की आधे से ज्यादा विश्व पर गुलामी समाप्त होने के बाद उसके साथ चर्च संगठन भी जिस तरह व्यापक स्तर पर पीछे धकेले गये, उसके बाद उन्हें फिर से संगठित एवं अधिक आक्रामक करने के लिये विश्व के आठ हजार चर्च पदाधिकारी एकत्र हुये थे. सैकड़ों समितियों एवं उपसमितियों द्वारा वह काम पांच वर्ष तक जारी रहा. ‘सेकिंड वेटिकन’ की स्वर्ण जयन्ती अपने मूल विषय की पूरक हो, इसी तरह से उसकी रचना की गई थी.

इस परिषद के तीन संदर्भ भारत जैसे बड़े देश के लिये ध्यानाकर्षण योग्य हैं. इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि इस संदर्भ में पूरे वेटिकन और यूरोप तथा अमेरिका को भारत एक समस्या प्रतीत होता है. इस संदर्भ में छह वर्ष पूर्व प्रकाशित न्यूज वीक साप्ताहिक के विशेषांक का संज्ञान लेना आवश्यक है. विश्वभर में मान्यता प्राप्त इस साप्ताहिक की संपादिका श्रीमती लीजा मिलर ने उसमें कहा था कि भारतीय जीवनशैली मूलत: सेक्युलर है. कैथोलिक अथवा प्रोटेस्टेंट जीवनशैली के अनुसार, ‘विश्व के लोगों का उद्धार करने का अधिकार अथवा सम्मान केवल ईसा मसीह के पास ही है. उसके अलावा किसी भी जीवनशैली वाले व्यक्ति को ईसाई बनाना ही मुक्ति पाने जैसा है. इसके लिये चाहे किसी भी मार्ग को स्वीकार करना पड़े तो करना चाहिये. यह हर ईसाई व्यक्ति का ईश्वर प्रदत्त कार्य है. इसलिये ‘जो ईसा का अनुयायी नहीं होता, उसे जीने का अधिकार नही होता’, लेकिन हिंदू जीवनशैली की मान्यता कुछ ऐसी है कि उद्धार अथवा मुक्ति देने का अधिकार जैसे ईसा को है, उसी तरह गौतम बुद्ध को है, भगवान श्रीकृष्ण को है, और वैसे ही अनेक संतों, महात्माओं को भी है. यह जो हिंदू विचार है वह विचार अनजाने में अमेरिका का जीवन-विचार बना है. पड़ोस में रहने वाला कोई यहूदी अथवा शिंतो अनुयायी हो तो आम व्यक्ति इस पर कोई बुरा नहीं मानता. भारतीय योग, गणित, आयुर्वेद अथवा अन्य कुछ भक्तिमार्ग, परंपरा अमेरिकी जीवन का हिस्सा बने हैं, यह अलग बात है. इसी तरह मृत्यु के बाद पार्थिव शरीर को आग को समर्पित करने का जो हिंदू संस्कार है, उसे अमेरिका में 30-35 प्रतिशत लोग स्वीकार कर रहे हैं. यह भी अलग विषय है, लेकिन अन्य व्यक्ति की आस्था पर आपत्ति न होने की भारतीय जीवनशैली अमेरिका, यूरोपीय देशों एवं अनेक मायनों में विश्व के 70 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र के लोगों की जीवनशैली का जाने अनजाने हिस्सा बन रही है.

यूरोप-अमेरिका में व्याप्त स्वेच्छाचार की आज स्थिति यह है कि समलैंगिक विवाह की मांग से पूरा यूरोप एवं अमेरिका सहमा हुआ है. स्वेच्छाचारी युवाओं तक यह समस्या सीमित नहीं रही बल्कि वह मिशनरियों की संस्थाओं में भी फैल रही है. यूरोप-अमेरिका की कोई भी सरकार अपने देशों के विपक्ष से ज्यादा इन ‘गे मैरिज’ की मांग करने वालों से डरती है. उनको लेकर चर्च की चिंता स्वाभाविक है, लेकिन इससे भी अधिक बड़ी समस्या है, ईसाई पंथों-उपपंथों के अनुयायियों की यूरोप में संख्या कम होना. अमेरिका, यूरोप में पिछले दस वर्ष में मुस्लिमों की संख्या दुगुनी हो गई है. अपने पंथ का त्याग एवं किसी पंथ को न मानने की समस्या फिलहाल पश्चिमी देशों को सता रही है. पिछले पांच सौ वर्ष में यूरोप ने जो मानसिकता जी-जान से बचाये रखी थी, उसमें ईसा मसीह के अलावा अन्य किसी को भी ईश्वर का दूत मानना मृत्युदंड लायक अपराध माना गया था. इसी सोच से विश्व में बड़े बड़े नरसंहार हुये हैं. एक बार विश्व के अन्य पंथों के लोगों का ईसाइयत को स्वीकारना बंद हो गया तो वेटिकन से लेकर चर्च ऑफ केंटरबरी तक सेमिनरी का अस्तित्व ही नष्ट हो जाता है.

विश्व पर पुन: वर्चस्व प्रस्थापित करने की सारे यूरोप एवं अमेरिका की इच्छा अभी समाप्त नहीं हुई है. वहां का प्रत्येक देश और उन देशों का प्रत्येक बैंक, बहुराष्ट्रीय कंपनियां उसी दृष्टि से प्रयास करते रहते हैं. इसलिये उन सबकी सर्वोच्च संस्था मानी जानी वाली वेटिकन काउंसिल का भी वही प्रयास होना स्वाभाविक है. इसलिये उन्हें विश्व का कोई भी पंथ अथवा आध्यात्मिक विचार किसी सुनामी जैसा लगता है. उसे रोकने के लिये उन्होंने पूरी ताकत से प्रयास शुरू किये हैं. इसलिये विश्व के किसी भी देश में यूरोपीय प्रतिनिधिमंडल अथवा कोई व्यक्ति जाकर मित्रता करने के लिये अगर सेक्युलरिज्म का गुणगान करता दिखे तो उसे भी उनके खाने के असली दांत दिखाना आवश्यक है.

-मोरेश्वर जोशी

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