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    रक्षाबंधन उत्सव का महत्व

    Raksha Bandhanपरस्पर संबंधों पर आधारित है जिन्दगी. संबंध की पवित्रता को ठीक समझकर परस्पर पूरक जीवन जीने से ही ऐश्वर्य की प्राप्ति कर सकते हैं. इस तत्व को श्रीकृष्ण जी ने बहुत ही रोचक ढंग से भगवदगीता  में कहा है –

    देवान भावयतानेन, ते देवा भाव यन्नुवः।

    परस्परं भाव यन्तः, श्रेयः परम वाप्स्यथः।।

    ऐश्वर्य प्राप्ति के लिये भगवान जिस श्रेयमार्ग को दिखाता है उस अंतर संबद्धता का महोत्सव है श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन उत्सव.

    सबसे श्रेष्ठ संबंध भातृत्व भाव है. हम सब एक ही माता के पुत्र हैं, इस भाव से ही एकात्म भाव प्रकट हो जाता है. वहीं से परस्पर एैक्य भाव से अनन्य भाव के साथ आपस में सेवा करने का भाव अंकुरित हो जाता है. आत्मैक्य बोध का अभाव समाज को बिखराव, पराभव और सर्वनाश की ओर खींचकर ले जायेगा.

    रक्षाबंधन से संबंधित उदाहरण इस वैचारिक पक्ष को उजागर करते है. भयानक पराजय व पलायन के बावजूद देवेन्द्र के नेतृत्व में देवगण अमरावती के ऊपर अपना वर्चस्व पुनर्स्थापित करने के लिये एक अनुष्ठान के रूप में रक्षाबंधन को अपनाते हैं ऐसा इतिहास में वर्णन आता है. आपस में जोड़ने वाला आंतरिक पवित्र सुवर्ण सूत्र तोड़ने से देवों की पराजय प्रांरभ हो गई. एकता और अपनेपन का भाव नष्ट होने के कारण देवत्व लुप्त हो कर वे सामान्य बन गये. गुरू के आदेशानुसार हुये रक्षाबंधन से उनको सम्पतियाँ वापस मिलती है. देवी संपत्ति वापस आने पर वे शक्तिशाली होकर संपूर्ण विश्व को बचाते हैं. अपनेपन के भाव से एकात्म बनकर, परस्पर भावयन्तः के आधार पर वे एक श्रेष्ठ लक्ष्य को पाने के लिये अधर्म के विरूद्ध संघर्ष करने के लिये आगे आते हैं. आसूरी शक्तियों के ऊपर विजय प्राप्त करते हैं.

    इस कहानी से प्रेरणा पाकर हर श्रावण माह की पूर्णिमा को राखी बांधकर रक्षाबंधन मनाने का क्रम हिन्दुओं ने शुरू किया. भारतीय इतिहास पर नजर डालें तो प्रत्येक महत्वपूर्ण क्षणों में रक्षाबंधन से उसके गौरवमय दायित्व को निभाने की झलक मिल जायेगी. विदेशी आक्रमण का मुकाबला करने के लिये रण बांकुरो को सजाने में, मुगल अत्याचारों के विरूद्ध राजपुत्रों ने जो मोर्चा खड़ा किया, उसके पीछे तथा बांटकर राज करने के ब्रिटिश षड्यंत्रों को पराभूत करने में रक्षाबंधन से मिला हुआ जोश एवं स्फूर्ति कारक थी. जाति, वर्ण के ऊपर उठकर राष्ट्र के लिये प्राण देने की प्रेरणा रक्षाबंधन ने दी है.

    राष्ट्र को परमवैभव के शिखर तक ले जाने के लिये स्थापित हुये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूलभूत कार्यों जैसे व्यक्ति निर्माण, स्वत्व जागरण, समरस समाज निर्माण, समाज संगठन आदि रक्षाबंधन के आधारभूत मूल्यों के साथ मेल खाते हैं. इसलिये संघ की शाखाओं में मनाये जाने वाले राष्ट्रीय उत्सवों में रक्षाबंधन भी शामिल हो गया.

    रक्षाबंधन के उद्भव के पीछे का भाव व तत्व कितना महत्वपूर्ण था इसके बारे में बहुत कुछ कहा गया. स्वत्व जागरण एवं स्वातंत्र्य हासिल करने के लिये हुये संघर्ष के कालखंड में रक्षाबंधन ने धार्मिक और राष्ट्रीय भूमिका को कैसे निभाया यह भी प्रारंभ में वर्णन किया है. लेकिन बाद में इतिहास की तेज गति के साथ रक्षाबंधन एक उत्सव मात्र बन गया. इस अवस्था में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा के द्वारा रक्षाबंधन एक सामाजिक आयाम बन गया है. इसके साथ-साथ संपूर्ण समाज को संगठित, सशक्त बनाने के संघ के लक्ष्य को सार्वजनिक रक्षाबंधन उत्सवों के द्वारा बहुत ज्यादा प्रेरणा मिलती है.

    सही अर्थ में समाज को संगठित व सशक्त बनाना है तो उसकी पूर्व शर्तों में सर्वप्रथम समरसता का अनुभव सर्वत्र पहुँचाने का कार्य है. प्रत्येक व्यक्ति के अंदर, मैं समाज का एक अभिन्न अंग हूँ ऐसा भाव जगना चाहिये. इस प्रेरणा के बिना समाज हित के लिये कार्य करने की अनुभूति जगाना कठिन होता है. सबल, सम्पन्न समाज खड़ा करने में प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण है. समाज का पिछड़ापन मेरी कमजोरी है, उस कमजोरी को दूर करने के लिये समाज में रचनात्मक कार्य शुरू करने होंगे.

    समाज का एक वर्ग या व्यक्ति अगर दुर्बल है तो, समाज उस हिसाब से दुर्बल है. समाज की दुर्बलता को ठीक किये बिना समाज आगे नहीं बढ़ेगा. समाज के सभी सदस्यों ने अपने आप आगे आकर, पिछड़े हुये बंधुओं को आगे करने के लिये प्रयत्न करना चाहिये. ऐसा होता है तो पूरे समाज में विशेषतः दुर्बल वर्ग में और मेरे अंदर एक ही चेतना विद्यमान है अथवा हम सब एक ही हैं का बोध निर्माण होगा. समरसता की अनुभूति जगाना है तो, हम सब कौन है यह समझना चाहिये.

    अपने समाज के संदर्भ में विचार किया तो यह मालूम हो जायेगा कि हम सब हिन्दु है. अपना स्वत्व हिन्दुत्व ही है. समाज को जोड़ने वाली शक्ति अर्थात् हिन्दुत्व को ठीक से समझकर उस आधार पर आगे बढना. स्वामी विवेकानंद जी ने इसीलिये बिना संदेह के यह सत्य बताया ‘‘then and then alone you are a hindu when the very name sends through a galvanic stroke of strength ’’ तब ही आप हिन्दु बनेंगे. जब हिन्दु नाम सुनकर ही आपके शरीर में शक्ति का एक विद्युत प्रवाहित हो जायेगा. आगे चलकर उन्होंने यह भी कहा है कि एक हिन्दु का दुःख एवं कष्ट आपके हृदय को अनुभव करना चाहिये. वह दीन-दुःखी व्यक्ति आपका ही पुत्र है, ऐसा जब आपको लगेगा उसी वक्त आप हिन्दु हो जायेंगे.

    इस में दो पहलू है. पहली बात हिन्दुत्व बोध और दूसरी बात, हम सब एक है ऐसी भावना है. मतलब स्वत्व बोध से समरसता की अनुभूति जगेगी.

    आर्थिक या सामाजिक या सांस्कृतिक, किसी भी प्रकार का पिछड़ापन अगर समाज में रहता है तो, उसको दूर करते हुये, उन बंधुओं को आगे ले जाने की जरूरत है. उसके बिना देश का विकास संभव नहीं है. यह सत्य समझकर प्रत्येक व्यक्ति ने स्वार्थ छोड़कर अपनेपन के भाव से समाज के लिये कार्य करना चाहिये. यह प्रेरणा रक्षाबंधन देता है. उन लोगों की उन्नति का संपूर्ण दायित्व अपने मन में लेने का संकल्प इस रक्षाबंधन की पवित्र बेला में हमें लेना चाहिये.

    – जे. नन्द कुमार (अ.भ.सह-प्रचार प्रमुख रा.स्व.संघ)

     

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