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    विकास का भारतीय चिंतन व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और सृष्टि पर आधारित है – डॉ. अनिरुद्ध देशपांडे जी

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    आगरा (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख डॉ. अनिरुद्ध देशपांडे जी ने कहा कि पश्चिम और भारतीय चिंतन में अधिक अंतर उपभोग का है. पश्चिम में मान्यता है कि दुनिया हमारे उपभोग के लिए, इसलिए वहां व्यक्ति केंद्रित विकास की अवधारणाएं हैं. इसके विपरीत भारत की अर्थव्यवस्था पांच घटकों व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और सृष्टि के आधार पर विकास के मापदंडों का निर्धारण करती है. भारतीय चिंतन में व्यक्ति चिंतन के साथ समाज और आध्यात्मिक चिंतन का समावेश है. यहां पर समाज, समाज की चिंता करता है, जबकि पश्चिम का चिंतन बिल्कुल अलग है. अनिरुद्ध जी शनिवार (08 फरवरी) को विश्वविद्यालय के खंदारी परिसर स्थित जेपी सभागार में आयोजित प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे.

    ‘विकास की भारतीय अवधारणा’ विषय पर पाथेय प्रदान करते हुए अनिरूद्ध जी ने कहा कि भारत में 16 प्रतिशत महिलाएं रोजगार के क्षेत्र में हैं. पुरूषों के साथ महिलाओं का रोजगार प्रतिशत बढ़ना चाहिए. मानव की उपभोग वाली वृत्ति से पर्यावरण का बड़ा नुकसान हो रहा है. ऋतु परिवर्तन चिंता की बात है. हमें सभी संसाधनों का संरक्षण करना चाहिए. उन्होंने कहा कि स्वदेशी का चिंतन करते हुए ग्राम आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए. महात्मा गांधी ने कहा था कि सबसे नजदीक जो उपलब्ध है, उसका हमें प्रयोग करना चाहिए. अपने गांव, तहसील, जिले में जो मिले उसे प्रयोग करें, नहीं मिलने पर विदेश से मंगाया जा सकता है.

    अनिरूद्ध देशपांडे जी ने कहा कि आज जो मुद्रा उद्योग, स्टार्टअप, आयुष्मान जैसी सरकारी योजनाएं चल रही हैं. वह समाज को केंद्रित रखकर बनायी गई हैं. 09 करोड़ लोगों ने स्वेच्छा से गैस सब्सिडी छोड़ी, परिणामतः 12 करोड़ महिलाओं को गैस का चूल्हा उपलब्ध कराया गया. विकास के मॉडल में समाज की सहभागिता जरूरी है. हमारा चिंतन बचत पर आधारित है. भारत में बचत दर सर्वाधिक है. उन्होंने कहा कि रोजगार निर्माण करना विकास की प्रक्रिया का प्रमुख हिस्सा है. शिक्षा विकास का सबसे बड़ा साधन है. 10 साल पहले 63 प्रतिशत बच्चे स्कूलों में जाते थे और आज 95 प्रतिशत जाते हैं. 2025 में यह आंकड़ा सौ प्रतिशत तक पहुंच जाएगा.

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