विविधता के मूल में एकता की अनुभूति Reviewed by Momizat on . डॉ. मनमोहन वैद्य भारतीय समाज की कुछ विशेषताएं हजारों वर्षों की सामाजिक यात्रा के कारण उसकी पहचान बन गई हैं. इस पहचान को बनाए रखने का अर्थ है राष्ट्रीय होना. अपन डॉ. मनमोहन वैद्य भारतीय समाज की कुछ विशेषताएं हजारों वर्षों की सामाजिक यात्रा के कारण उसकी पहचान बन गई हैं. इस पहचान को बनाए रखने का अर्थ है राष्ट्रीय होना. अपन Rating: 0
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    विविधता के मूल में एकता की अनुभूति

    डॉ. मनमोहन वैद्य

    भारतीय समाज की कुछ विशेषताएं हजारों वर्षों की सामाजिक यात्रा के कारण उसकी पहचान बन गई हैं. इस पहचान को बनाए रखने का अर्थ है राष्ट्रीय होना. अपनी स्थापना के करीब 20 वर्ष बाद कांग्रेस ने ब्रिटिश विरोधी स्वतंत्रता आंदोलन का रूप लिया. तब कांग्रेस के सभी नेता भारत के परंपरागत समाज की उस विशिष्ट पहचान के साथ खड़े थे जो सदियों की सामूहिक यात्रा के कारण निर्मित हुई थी और जो अनेक आक्रमण और संघर्षों के बाद भी टिकी हुई थी. भारत के समाज का एक वैचारिक अधिष्ठान है. जिसका आधार आध्यात्मिक है. इसके कारण भारत का एक व्यक्तित्व और स्वभाव बना. भारत की विशाल भौगोलिक इकाई में रहने वाला विविध जाति-पंथ-भाषा के नाम से जाना जाने वाला संपूर्ण समाज भारत की इन विशेषताओं को साझा करता है.

    विविधता के मूल में एकता की अनुभूति

    भारत के व्यक्तित्व के चार पहलू हैं. पहला है, एकम् सत् विप्रा: बहुधा वदंति. भारत ने अपने आचरण से यह सिद्ध किया है. इसीलिए स्वामी विवेकानंद ने अपने शिकागो व्याख्यान में कहा था कि हम सभी मार्गों को सत्य मानकर उनका सम्मान करते हैं. दूसरा है, विविधता के मूल में रही एकता की अनुभूति करना. रविंद्रनाथ टैगोर ने लिखा है, अनेकता में एकता देखना और विविधता में ऐक्य प्रस्थापित करना ही भारत का अंतर्निहित धर्म है. भारत विविधता को भेद नहीं मानता और पराए को दुश्मन नहीं समझता. इसीलिए नए मानव समूह के संघात से हम भयभीत नहीं होंगे. उनकी विशेषता को पहचान कर उसे सुरक्षित रखते हुए उन्हें अपने साथ लेने की विलक्षण क्षमता भारत रखता है. तीसरी विशेषता भारत की यह मान्यता है कि प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर का अंश है. चौथा लक्षण, यहां प्रत्येक व्यक्ति को अपना-अपना ‘मुक्ति’ का मार्ग चुनने की स्वतंत्रता होना है.

    सामाजिक समृद्धि को बढ़ाना धर्म

    भारत का स्वभाव धर्म है. यह धर्म ‘रिलीजन’ अथवा उपासना नहीं है. मंदिर में जाना, भगवान की पूजा करना, व्रत करना इत्यादि धर्म नहीं, उपासना है. उपासना करने से धर्म का आचरण करने के लिए शक्ति मिलती है. धर्म तो समाज को अपना समझ कर देना है. यह धर्म संकल्पना भारत की है. भारत की प्रत्येक भाषा के अभिजात्य और लोकसाहित्य में इसका वर्णन विपुलता से मिलता है. इसीलिए अंग्रेजी में धर्म का प्रयोग करना ही ठीक होगा. विद्या प्राप्त करने की इच्छा वालों को विद्या देना, प्यासे को पानी, भूखे को रोटी, निराश्रित को आश्रय, रोगी को दवाई देना – धर्म कार्य माना गया है. इसीलिए धर्मशाला, धर्मार्थ अस्पताल शब्द प्रचलित हैं. धर्म का एक वर्णन कर्तव्य भी कर सकते हैं. बिना भेदभाव परस्पर सहयोग से सामाजिक समृद्धि को बढ़ाना धर्म है.

    जो धारणा करता है वह धर्म है

    भगिनी निवेदिता ने कहा है, जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक अपने ही पास न रखकर समाज को देते हैं, ऐसे समाज के पास एकत्र हुई पूंजी के आधार पर समाज समृद्ध बनता है और परिणामत: समाज का प्रत्येक व्यक्ति संपन्न-समृद्ध बनता है. परंतु जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक समाज को न देकर अपने पास रखते हैं, उस समाज में कुछ लोग तो संपन्न होते हैं, लेकिन शेष समाज दरिद्र रहता है. जो सहायता करते समय भेदभाव करता है वह धर्म हो ही नहीं सकता. धर्म समाज को जोड़ता है और इसीलिए धर्म की परिभाषा है, जो धारणा करता है वह धर्म है.

    भारत के संविधान निर्माण के समय संविधान समिति के सदस्यों को इस ‘धर्म’ तत्व की जानकारी थी. इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय का बोधवाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ है. लोकसभा में ‘धर्मचक्र प्रवर्तनाय’ लिखा है. राज्य सभा में ‘सत्यं वद धर्मं चर’ लिखा है. राष्ट्रध्वज पर जो चक्र अंकित है, वह धर्म चक्र है.

    जब वृद्धा ने कहा मैं मांगने नहीं देने आई हूं

    वर्ष 1988 में गुजरात के कुछ हिस्से में भीषण अकाल था. मैं तब वड़ोदरा में प्रचारक था. अकालग्रस्त क्षेत्र में भेजने के लिए ‘सुखड़ी’ नामक एक पौष्टिक पदार्थ घर-घर बनवाकर संघ कार्यालय में एकत्र हो रहा था. एक दिन एक वृद्धा वहां आई. क्षीण आवाज में उसने एक कार्यकर्ता से कहा, सुखड़ी. उस कार्यकर्ता ने कहा माता जी, यह सुखड़ी अकालग्रस्त लोगों को भेजने के लिए है. तब उस वृद्धा ने अपनी साड़ी में समेटी एक पुड़िया निकाल कर देते हुए कहा, बेटा, मैं मांगने नहीं, देने आई हूं.

    विविधता के मूल में एकता

    ऐसे छोटे-छोटे कृत्यों द्वारा धर्म पुष्ट होता है और धर्मचक्र प्रवर्तन होता रहता है. भारत का यह वैचारिक अधिष्ठान जिस कारण बना उसका एक व्यक्तित्व और स्वभाव है. इसे दुनिया हिन्दुत्व के नाम से जानती है. इसीलिए भारत और भारतीय समाज की पहचान दुनिया में हिन्दू है. यह हिन्दुत्व सबको जोड़ने वाला, सबको साथ लेकर चलने वाला, किसी भी प्रकार का भेदभाव न करने वाला है. विविधता से संपन्न, अनेक भाषा बोलने वाला, विविध उपासना पंथों का अनुसरण करने वाला भारत का राष्ट्रीय समाज एक है. विविधता भेद न होकर हमारा वैशिष्ट्य है. आवागमन और संदेश व्यवहार के आधुनिक साधनों के कारण अब दुनिया बहुत करीब आ गई है. दुनिया में भाषा, वंश, उपासना, विचार का वैविध्य रहने वाला ही है. इस विविधता के मूल में एकता को देखने की दृष्टि भारत के पास है. इसीलिए भारत ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को प्रस्थापित किया है.

    कांग्रेस में साम्यवाद का प्रभाव

    स्वतंत्रता के पहले कांग्रेस के अधिकांश नेता और असंख्य कार्यकर्ता राष्ट्रीय वृत्ति के थे. कांग्रेस में साम्यवाद का प्रभाव बढ़ने से इस ‘राष्ट्रीय’ को हाशिये पर धकेलने की वृत्ति बढ़ती गई. 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद यह प्रक्रिया और तेज हुई. इसी के साथ किसी भी प्रकार सत्ता में आना अथवा सत्ता में बने रहने की दिशा में कांग्रेस की यात्रा शुरू हुई. इसी कालखंड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अनेक लोक नेता और साधु-संतों के प्रयास से राष्ट्रभाव जागरण का कार्य अधिक गति से हुआ और उसका प्रभाव समाज में दिखने लगा.

    एक तरफ राष्ट्रीय जागरण हो रहा था, जिसके परिणामस्वरूप समाज जाति, पंथ, प्रांत, भाषा आदि पहचान से ऊपर उठकर राष्ट्रीय दृष्टि से विचार और आचरण करने लगा तो दूसरी तरफ कांग्रेस जाति, पंथ, प्रांत, भाषा आदि विविधताओं को भेद की तरह प्रस्तुत कर, भावनाएं भड़काकर सत्ता में टिके रहने या सत्ता प्राप्त करने के प्रयासों में उलझी रही. इसके फलस्वरूप कांग्रेस ने राष्ट्रीयता से किनारा कर लिया और जागृत जनता ने राष्ट्रीयता से दूर हुई कांग्रेस को किनारे कर दिया. वास्तव में कांग्रेस की कमजोर होती स्थिति का यही एक बड़ा कारण है.

    (लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह हैं.)

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