विश्वगुरु मार्ग का मील पत्थर – बुद्धत्व Reviewed by Momizat on . प्रवीण गुगनानी भारत किसी समय में विश्वगुरु यूं ही नहीं कहलाता था. भारत एक ऐसा देवदुर्लभ, बिरला, अनोखा राष्ट्र है, जिसने कभी किसी राष्ट्र की सीमाओं पर हमला नहीं प्रवीण गुगनानी भारत किसी समय में विश्वगुरु यूं ही नहीं कहलाता था. भारत एक ऐसा देवदुर्लभ, बिरला, अनोखा राष्ट्र है, जिसने कभी किसी राष्ट्र की सीमाओं पर हमला नहीं Rating: 0
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    विश्वगुरु मार्ग का मील पत्थर – बुद्धत्व

    प्रवीण गुगनानी

    भारत किसी समय में विश्वगुरु यूं ही नहीं कहलाता था. भारत एक ऐसा देवदुर्लभ, बिरला, अनोखा राष्ट्र है, जिसने कभी किसी राष्ट्र की सीमाओं पर हमला नहीं किया. कभी स्वयं की सीमाओं के विस्तार का प्रयास नहीं किया. साथ ही भारत एक ऐसा भी बिरला राष्ट्र है जो बिना आक्रमण ही विश्व भर में अपनी सीमाओं को सांस्कृतिक माध्यम से बढ़ाने में सफल रहा है. भारत ने अपने सांस्कृतिक देवदूतों के माध्यम से लगभग एक चौथाई विश्व को अपनी संस्कृति में रंग दिया. भारतीय संस्कृति को विश्वव्यापी रूप देने व विश्वगुरु के स्थान पर विराजित कराने मे सनातन धर्म की एक शाखा के रूप में उपजे बौद्ध धर्म का आविर्भाव एक महत्वपूर्ण घटना रही है. सनातन या हिन्दू धर्म में विष्णु के 9वें अवतार के रूप में भगवान बुद्ध को गिना जाता है. लगभग 2600 वर्ष पूर्व सनातन से उपजा तथागत बुद्ध प्रवर्तित बौद्ध धर्म बाद में वैश्विक सांस्कृतिक व राजनैतिक परिवर्तनों को जन्म देने का एक बड़ा कारण सिद्ध हुआ. बौद्ध धर्म को विश्व का तीसरा सबसे बड़ा वैश्विक धर्म बनाने में बौद्ध तत्व बड़े ही महत्वपूर्ण रहे हैं. इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण वह बात रही, जिसमें भगवान बुद्ध ने कहा था कि – हम सब स्वतंत्रता की कामना करते हैं, पर जो चीज मनुष्यों को अलग बनाती है वह है बुद्धि. पर स्वतंत्र मनुष्यों के रूप में हम अपनी अद्वितीय बुद्धि के उपयोग से स्वयं को और अपने विश्व को समझने का प्रयास कर सकते हैं. भगवान बुद्ध ने स्पष्ट कर दिया था कि उनके अनुयायी स्वयं उनकी बातों को सुन कर जस का तस न मान लें, बल्कि उनका परीक्षण करें, जांच करें जैसे एक सुनार सोने की गुणवत्ता की करता है. उन्होंने कहा था कि – यदि हमें अपने विवेक और रचनात्मकता का उपयोग करने से रोका जाता है तो हम मनुष्य होने का एक आधारभूत गुण खोते हैं. गौतम बुद्ध ने विश्व को पंचशील और निर्वाण का मार्ग दिखाया, यह मार्ग पहले की अपेक्षा आज ज्यादा व्यावहारिक, सार्वलौकिक एवं सर्वाधिक उपयुक्त है. पिछले दिनों भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बोधगया मे एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था – कई भारतीय विद्वानों ने हिन्दुत्व पर बुद्ध के प्रभाव का विश्लेषण किया है. यहां तक कि जिस तरह आदि शंकर बुद्ध से प्रभावित हुए थे, उनकी आलोचना की गई थी और शंकर को “प्रच्छन्न बुद्ध” अर्थात शंकर के भेष में बुद्ध भी कहा गया था. आमजन के लिए बुद्ध इतने श्रद्धेय थे कि जयदेव ने अपने ‘गीत गोविंद’ में उनकी महाविष्णु के रूप में प्रशंसा की जो अहिंसा का पाठ पढ़ाने के लिए अवतरित हुए. इसलिए बुद्ध के आगमन के पश्चात हिन्दू बौद्ध के रूप में व बौद्ध हिन्दू के रूप में समाहित हो गए. आज वे एक-दूसरे में पूरी तरह से घुलमिल गए हैं.

    भारत की सांस्कृतिक सीमाओं के विस्तार में व बिना शस्त्र ही विश्वविजयी होने में प्रमुख योगदान दिया है तथागत गौतम बुद्ध द्वारा प्रचलित बौद्ध धर्म ने. भगवान बुद्ध ने ईसवी पूर्व 563 से ईसवी पूर्व 483 तक अपना यशस्वी जीवन जिया और बौद्ध धर्म को स्थापित किया. आज विश्व में बौद्धों की संख्या लगभग 200 करोड़ हो गई है. विश्व के सभी महाद्वीपों में प्रचलित होकर यह एक विश्वधर्म के रूप में स्थापित हो गया है. माना जाता है कि अकेले चीन में ही 100 करोड़ से अधिक बौद्ध हैं जो चीन की जनसंख्या का 80% से अधिक है. आज वहां सभी बौद्ध ग्रन्थों का चीनी भाषांतर हो चुका है. दक्षिण पूर्वी एशिया में तो बौद्ध धर्म एक प्रमुख धर्म बन चुका है. थाईलैंड एक घोषित बौद्ध राष्ट्र है, यहां बौद्ध विहारों, लंबे सुनहरे स्तूप, बौद्ध वास्तुकला प्रमुख रूप से दिखती है.

    बौद्ध तीर्थ के रूप मे बोधगया बौद्ध बंधुओं के लिए एक तीर्थ स्थान बन गया है, जहां की यात्रा करना विश्व भर के लगभग 200 करोड़ बौद्ध बंधुओं के लिये एक आशा भरा स्वप्न रहता है. बोधगया का महाबोधि मंदिर युनेस्को द्वारा विश्व विरासत के रूप मे घोषित किया गया है. यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भविष्य मे बोधगया समूचे विश्व की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में विकसित होगा.

    भारत के लिये भगवान बुद्ध के सांस्कृतिक महत्व को स्वामी विवेकानंद द्वारा कहे गए इन शब्दों से समझा जा सकता है – जब बुद्ध का जन्म हुआ, उस समय भारत को एक महान आध्यात्मिक गुरु की परम आवश्यकता थी.

    भगवान बुद्ध कभी भी न वेद, न जाति, न पंडित और न ही परम्परा, कभी किसी के आगे नहीं झुके. उन्होंने निर्भय होकर तर्कसंगत रूप से अपना जीवन बिताया. निर्भय होकर सच्चाई की खोज की और विश्व में सभी के लिए अगाध प्रेम रखने वाले ऐसे महामानव को विश्व ने पहले कभी नहीं देखा. बुद्ध किसी भी अन्य धर्मगुरु से अधिक साहसी और अनुशासित थे.

    बुद्ध पहले मानव थे, जिन्होंने इस दुनिया को आदर्शवाद का एक पूरा तंत्र दिया. वे भलाई के लिए भले और प्रीत के लिए प्रीतिकर थे. बुद्ध समानता के बहुत बड़े समर्थक थे. प्रत्येक व्यक्ति को आध्यात्मिकता प्राप्त करने का समान अधिकार है – यह उनकी शिक्षा है.

    मैं व्यक्तिगत रूप से भारत को बौद्ध-भारत कहूंगा क्योंकि इस देश ने धार्मिक विद्वानों से बुद्ध द्वारा दिये गए सभी मूल्यों और शिक्षाओं को आत्मसात कर उन्हें यहाँ के साहित्य में दर्शाया.

    हमारे भारत से उद्भव हुआ बौद्ध धर्म आज चीन, जापान, वियतनाम, थाईलैण्ड, म्यान्मार, भूटान, श्रीलंका, कम्बोडिया, मंगोलिया, तिब्बत, लाओस, हांगकांग, ताइवान, मकाउ, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, रूस, एवं उत्तर कोरिया सहित कुल 18 देशों का प्रमुख धर्म है. नेपाल, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया,  रूस, ब्रुनेई, मलेशिया आदि देशों में भी करोड़ों बौद्ध निवासरत हैं. अनीश्वरवादी होने के बाद भी चीन में तो बौद्ध धर्म को वहां के पांच प्रमुख मान्यता प्राप्त धर्मों में स्थान प्राप्त है. चीन के पिछले दो हजार वर्षों का इतिहास बौद्ध विरासतों से ही भरा हुआ है. यद्यपि यह भी सत्य है कि एक बौद्ध तिब्बती बालक को जब दलाई लामा ने पांचेन लामा घोषित किया, तब उस बालक को चीनी शासन द्वारा अचानक गायब कर दिया गया व उसके बाद से वह बालक आज तक नहीं मिला. 1960 व 70 के दशक में सांस्कृतिक क्रांति के मध्य चीनी शासन ने बड़ी संख्या में बौद्ध स्थानों को नष्ट किया व हजारों बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों को मौत के घाट उतार दिया या गायब कर दिया.

    भगवान बुद्ध ने विद्वान होने से अधिक ज्ञानदान को प्रमुखता दी. करूणा, शील, मैत्री, सामाजिक भेद भाव मिटाने के साथ साथ  भगवान बुद्ध ने व्यक्ति का मूल्यांकन जन्म नहीं, अपितु कर्म के आधार किया.

    सम्राट अशोक के पश्चात बाबा साहेब आम्बेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाकर इसे भारत में पुनर्स्थापित करने मे बड़ी भूमिका निभाई.

    विश्व के विकसित देशों में से एक देश जापान में बौद्ध धर्म 5वीं शताब्दी में कोरिया से होकर स्थापित हुआ था. आज बौद्ध धर्म जापानी समाज, संस्कृति व राजतंत्र का एक महत्वपूर्ण प्रेरणास्त्रोत है. पूर्वी तुर्किस्तान (झिनजियांग) मे तो बौद्ध धर्म ने एक बार समाप्त हो जाने के बाद अपना नवजीवन निर्मित किया है. तुर्किस्तान के काल्मिक मंगोलों के मठों को सांस्कृतिक क्रांति के दौरान नष्ट कर दिया गया था. ये सभी मठ आज अपने नववास्तु रूप में सुशोभित हो रहे हैं. मंगोलिया में हज़ारों बौद्ध मठ और विहार हुआ करते थे, इन सभी को 1937 में स्टालिन के आदेश पर नष्ट कर दिया गया था. यहां भी बड़ी संख्या मे मठों को पुनर्स्थापित किया गया है. इन देशों मे तिब्बतियों की सहायता से बौद्ध धर्म को मज़बूती के साथ पुनर्जीवित किया गया है. विश्व के कई देशों से नए भिक्षुओं को प्रशिक्षण के लिए भारत भेजा गया है. इस प्रकार बौद्ध धर्म तमाम झंझावातों से उबरते हुये आज सनातनी संस्कृति के राजदूत के रूप में विश्व भर मे अपनी पताका फहरा रहा है.

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