वैचारिक योद्धा स्व. परमेश्वरन जी का ध्येय समर्पित जीवन हम सब के लिए प्रेरणादायी है Reviewed by Momizat on . [caption id="attachment_30498" align="alignleft" width="300"] File Photo[/caption] वैचारिक योद्धा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और भारतीय विचार कें [caption id="attachment_30498" align="alignleft" width="300"] File Photo[/caption] वैचारिक योद्धा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और भारतीय विचार कें Rating: 0
    You Are Here: Home » वैचारिक योद्धा स्व. परमेश्वरन जी का ध्येय समर्पित जीवन हम सब के लिए प्रेरणादायी है

    वैचारिक योद्धा स्व. परमेश्वरन जी का ध्येय समर्पित जीवन हम सब के लिए प्रेरणादायी है

    Spread the love

    File Photo

    वैचारिक योद्धा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और भारतीय विचार केंद्र के संस्थापक व निदेशक पी. परमेश्वरन जी का 91 साल की आयु में केरल के पलक्कड़ जिले के ओट्टापलम में 08 फरवरी रात्रि को देहावसान हो गया. परमेश्वरन जी अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे, उनका जीवन ध्येय समर्पित, साधनारत और सादगीपूर्ण था. सन् 1927 में केरल के अलप्पुझा जिले के मुहम्मा में जन्मे परमेश्वरन जी स्कूल में पढ़ाई के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आ गए थे. केरल यूनिवर्सिटी से इतिहास में बी.ए. की परीक्षा में उत्तीर्ण करने बाद उन्होंने अपना सारा जीवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया तथा संघ के प्रचारक बन कर राष्ट्र के पुनर्निर्माण में जुट गए.

    वे अच्छे लेखक, कवि, शोधकर्ता और दूरदर्शी थे. उनका जीवन राष्ट्र के पुनरुत्थान के लिए साधनारत था. परमेश्वरन जी 1967 से लेकर 1971 भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय सचिव और 1971 से लेकर 1977 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे. बाद में 1977 से लेकर 1982 तक नई दिल्ली के दीनदयाल शोध संस्थान के निदेशक रहे. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए आपातकाल के खिलाफ परमेश्वरन ने अखिल भारतीय सत्याग्रह आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया. जिसमें उन्हें गिरफ्तार किया गया और सोलह महीने तक जेल में रखा गया.

    राष्ट्रविरोधी, नकारात्मक और विभाजनकारी विरोधाभासों की पहचान करने की उनमें अंतरदृष्टि थी. वे वामपंथी षड्यंत्रकारी नीतियों को तुरंत पहचान लेते थे, उनके द्वारा फैलाई जा रही विभाजनकारी नीतियों का डटकर मुकाबला करते थे. लोगों में राष्ट्रीय विचारों का प्रवाह हो तथा वामपंथी विचारों का दमन हो और स्वदेशी भावना के साथ लोगों में राष्ट्रीय चेतना का जागरण हो, इसके लिए लगातार प्रयास करते रहते थे.

    राष्ट्रीय विचारों को बढ़ावा देने के लिए परमेश्वरन जी ने सन् 1982 में केरल में भारतीय विचार केंद्र की स्थापना की. इसके बाद अनुसंधान परियोजनाएं, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार, पुस्तकों और पत्रिकाओं के प्रकाशन, आदि का संकलन भी किया.

    एक दार्शनिक तथा विचारक के रूप में परमेश्वरन् जी ने सामाजिक कार्य के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया. उन्होंने रामकृष्ण मिशन से दीक्षा ली थी तथा आदि शंकराचार्य के जन्म स्थान कालडी स्थित अद्वैत आश्रम के संस्थापक स्वामी अगमानन्द के वे शिष्य थे. विश्वधर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द के ऐतिहासिक व्याख्यान के उपलक्ष्य में, वर्ष 1993 में शिकागो में शताब्दी वर्ष मनाया गया, जिसमें परमेश्वरन् जी सहभागी हुए. हिन्दू धर्म के मूल्यों तथा उदात्त सिद्धांतों को जन सामान्य तक प्रसारित करने के अद्भुत कार्य के लिए बड़ा बाजार लाइब्रेरी, कोलकाता द्वारा दिए जाने वाले “भाई जी हनुमान प्रसाद पोद्दार अवार्ड” से सन् 1997 में सम्मानित किया गया. सन् 2000 में नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रबंधकारिणी समिति (सीनेट) के सदस्य थे. माता अमृतानन्दमयी मठ द्वारा सन 2002 में “अमृत कीर्ति पुरस्कार” से पुरस्कृत किये गए. सन् 2004 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित सम्मान “पद्मश्री” से सम्मानित किया गया. वर्ष 2018 में भारत सरकार ने उन्हें “पद्मविभूषण” से सम्मानित किया.

    उन्हें ‘हिंदूइस्म टुडे’ द्वारा प्रतिष्ठित अवार्ड हिन्दू पुनर्जागरण पुरस्कार “हिन्दू ऑफ द इयर 2010” से भी सम्मानित किया गया. पी. परमेश्वरन्जी ने 30 से अधिक पुस्तकें लिखीं हैं और “दिशा बोधाथिन्ते दर्शनम्” पुस्तक के लिए उन्हें केरल साहित्य अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया गया. उनकी पुस्तकों में “Narayana Guru, Prophet of Renaissance”, “Heartbeats of the Hindu Nation”, “Vivekanandanum Prabhudha Keralavum (Edited)”, “Bhagavad Gita- The Nectar of Immortality”. Marx and Vivekananda – a Comparative Study”, and “Viswavijayee Vivekananda” उल्लेखनीय हैं.

    माननीय परमेश्वरन् जी कहा करते थे, “अभावग्रस्त लोगों की सेवा करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है. इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपना जीवन समर्पित करना है. ऐसे समर्पण की नित्य साधना करनी होगी. ऐसे समर्पण का भाव अपने भीतर विद्यमान दिव्यत्व की अनुभूति से प्रगट होता है. सारे समर्पित कार्य का स्रोत अपने हृदय की प्रेरणा होती है.”

    परमेश्वरन् जी आज हमारे बीच नहीं हैं. किन्तु उनके विचार, उनका मार्गदर्शन, उनका कार्य, उनके साहित्य तथा उनका आदर्श हमारे मन-मस्तिष्क-हृदय को सदैव जाग्रत रखेगा, हमें सतत प्रेरित करता रहेगा. विवेकानन्द केन्द्र अपने कार्यकर्ताओं और शुभचिंतकों की ओर से परमेश्वरन् जी के परलोक गमन पर श्रद्धांजलि अर्पित करता है.

    संघ के वरिष्ठ प्रचारक (पद्म विभूषण) स्व. श्री परमेश्वरन जी को आरएसएस सरसंघचालक और सरकार्यवाह जी की श्रद्धांजलि –

    स्व. श्री परमेश्वरन जी के देहावसान की वार्ता मन में एक जेष्ठ परामर्शदाता व प्रेरक के वियोग की दुःखद रिक्तता छोड़ गई. ज्ञान तथा कर्म दोनों क्षेत्रों में उनके पराक्रम ने अपने प्रिय संघ कार्य का पथ प्रशस्त किया.
    उनके भतीजे श्री प्रतीश तथा उनके परिवार को यह वियोग जितना कलेशकारी, उतना ही ‘भारतीय विचार केंद्रम – केरल’, तथा ‘विवेकानंद केंद्र – कन्याकुमारी’ को उनका अभिभावक खोने की वेदना है. संघ स्वयंसेवकों के बृहत कार्यविश्व की यह बहुत बड़ी क्षति हुई है.
    परंतु इस शोक का संवरण कर ध्येयपथ पर अबाध गति से आगे बढ़ने का कर्तव्य हम सब को निभाना ही है. स्व. श्री परमेश्वरन जी का ध्येय समर्पित, ज्ञान साधनारत, संघ शरण तथा स्नेहमय, सादगीपूर्ण जीवन ही उस पथ पर हमारे लिए प्रकाश व प्रेरणा बनेगा.
    उनकी पवित्र स्मृति में मैं अपनी व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पण करता हूं व दिवंगत जीव की उत्तम गति के लिए प्रार्थना करता हूं.

    उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी श्रद्धांजलि अर्पित की थी.

    •  
    •  
    •  
    •  
    •  

    About The Author

    Number of Entries : 6857

    Leave a Comment

    हमारे न्यूज़लेटर के लिए साइन अप करें

    VSK Bharat नवीनतम समाचार के बारे में सूचित करने के लिए अभी सदस्यता लें

    Scroll to top