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‘व्यक्तित्व-विकास एवं शिक्षा’ पर परिचर्चा

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भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति, दिल्ली प्रान्त (अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना की प्रान्तीय इकाई)  के तत्त्वावधान में होनेवाली मासिक परिचर्चा के अंतर्गत इस बार ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, शनिवार, कलियुगाब्द 5116, तदनुसार दिनांक 31 मई, 2014 ईसवी को ‘व्यक्तित्व-विकास एवं शिक्षा’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी. परिचर्चा में शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति के राष्ट्रीय संयोजक एवं शिक्षा-संस्कृति उत्थान न्यास के अध्यक्ष तथा विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षण-संस्थान के पूर्व राष्ट्रीय महामंत्री श्री दीनानाथ बत्रा, मुख्य वक्ता और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र के उपाचार्य डॉ. सन्तोष कुमार शुक्ल विशिष्ट वक्ता के रूप में उपस्थित थे. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रतिकुलपति और भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति, दिल्ली प्रान्त के अध्यक्ष प्रो. कपिल कपूर ने परिचर्चा की अध्यक्षता की . इस अवसर पर अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन-सचिव श्री बालमुकुन्द पाण्डेय का भी सान्निध्य प्राप्त हुआ .

Itihas sankalan

इस अवसर पर विषय-प्रवर्तन करते हुए डॉ. सन्तोष कुमार शुक्ल ने कहा कि व्यक्तित्व का विकास शिक्षा से ही सम्भव है. व्यक्ति के गुणों एवं नित्य धर्म की उत्पत्ति शिक्षा से ही सम्भव होती है. किन्तु आजकल शिक्षा का अर्थ ‘पर्सनैलिटी डेवलपमेंट’ हो गया है और मूल ध्येय ओझल हो गया है. शिक्षा के विकास का मापन बाह्य आवरण से ही किया जा रहा है. शिक्षा मात्रा विषय तक ही सीमित रह गई है और कुशलता की कोई पूछ नहीं रह गई है. अतः श्रद्धा, आचार, सत्य, उदारता आदि गुणों से ही व्यक्तित्व का विकास करके शिक्षा का विकास सम्भव है.

मुख्य वक्ता श्री दीनानाथ बत्रा जी ने ‘बुद्धिजीवी, बुद्धिधर्मी’ और ‘बुद्धिमान’ शब्दों की व्याख्या करते हुए विषय को प्रारम्भ किया. उन्होंने कहा कि जो शिक्षक स्वतन्त्र चिन्तन करता है, वही वास्तव में शिक्षा देता है, जिसका आधार धर्म और ज्ञान होता है. शिक्षा समग्र जीवन के लिये होनी चाहिये – ऐसा स्वामी विवेकानन्द का कथन है. उन्होंने बताया कि गाँधी जी कायिक, मानसिक एवं वाचिक- सभी प्रकार के विकासों को ही सम्पूर्ण विकास मानते थे. किन्तु आज का भारतीय जीवन विडम्बनापूर्ण हो गया है. जबकि शिक्षा जीवन को पूर्ण बनाती है, अहंकार को छोड़कर उदारता की ओर ले जाती है, अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है. उन्होंने बताया कि काम-क्रोधादि से मुक्ति के लिये यमनियमादि योग सीखकर दीर्घायुष्य पाया जा सकता है और मन के विपरीत वेगों को नियन्त्रित किया जा सकता है. मन को एकाग्रचित्त करना, शरीर को साधना आवश्यक है. श्री बत्रा ने कहा कि आत्मा का शुद्धिकरण, आत्मवत्सर्वभूतेषु का भाव ही अंतःविकास है, जिससे हमारे अन्दर सर्वगुणसंपन्नता आती है.

इस अवसर पर अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन-सचिव श्री बालमुकुन्द पाण्डेय ने कहा कि प्राचीन भारतीय शिक्षा का ध्येय ‘सा विद्या या विमुक्तये’ नष्ट हो गया है और उसके स्थान पर ‘सा विद्या या नियुक्तये’ हावी हो गया है. शिक्षा का प्रयोजन ‘विद्या ददाति विनयम् विनयादयाति पात्रात्वाम्’ गौण होता जा रहा है.

प्रो. कपिल कपूर ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि हमारे आचार-विचार तो अच्छे हैं, पर समाज को देखें तो शिक्षा की कमी पता चलती है. उन्होंने कहा कि शिक्षा का ध्येय सफल व्यक्ति बनाना है, पर यह केवल आर्थिक रूप में रह गया है. उसी व्यक्ति को सफल कहा जा रहा है जो आर्थिक दृष्टि से संपन्न हैं. शोषण, लूट, पर्यावरण-ह्रास पढ़े-लिखे लोगों ने ही किया है, क्योंकि वहाँ मूल्य की बात ही नहीं है. श्री कपूर ने कहा कि यह विडम्बना ही है कि आज देश में जो पढ़ा-लिखा है, वही वास्तव में अनपढ़ है. उसे न परिवार, न समाज, न परम्पराओं या मूल्यों का ज्ञान है.

इससे पूर्व गत 25 मई को दिवंगत हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और भारतीय इतिहास संकलन समिति, उत्तरप्रदेश के संरक्षक श्री अनन्त रामचन्द्र गोखले (1918-2014) को श्रद्धांजलि समर्पित की गयी. परिचर्चा का संचालन और धन्यवाद-ज्ञापन भारतीय अखिल भारतीय इतिहास योजना समिति के महामंत्री श्री अरुण पाण्डेय ने किया.

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