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शिक्षा का निजीकरण नहीं सामाजीकरण जरूरी-भागवत

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Shikshavidon se paricharcha nav srijan shivirहरिद्वार. 30 नवंबर (मीडिया सेंटर). आज शिक्षा का निजीकरण और सरकारीकरण की बजाय उसका सामाजीकरण होना आवश्यक है. निजीकरण करना व्यापारीकरण की तरह है और इसके चलते शिक्षा आम आदमी से दूर हो रही है. शिक्षा प्राचीनकाल में सामाजिक जिम्मेदारी होती थी. शिक्षा व्यवस्था में सरकार का हस्तक्षेप भी उचित नहीं हां इसके उन्नयन के लिए सरकार अपने  स्तर पर जरूर मदद कर सकती है लेकिन उसका उस पर किसी प्रकार का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए.

यह कहना है राष्टीय स्वयंसेवक संघ के परमपूजनीय सरसंघचालक मोहन भागवत का. श्री भागवत आज यहां पतंजलि योगपीठ फेज टू में आयोजित तीन दिवसीय नवसृजन शिविर के समापन सत्र के ठीक पहले आयोजित एक परिचर्चा सत्र में विश्वविद्यालय, महाविद्यालय के संचालको एवं शिक्षाविदों से बातचीत कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि शिक्षा सस्ती, महंगी नहीं होती बल्कि अमूल्य होती है इसका कोई मूल्य नहीं होता. गुरुकुल शिक्षा पद्धति इसका उदाहरण है जिसमें गुरू सिर्फ शिक्षा देने की चिंता करता था और समाज उसकी आजीविका का ध्यान रखता था. उन्होंने कहा कि भावनात्मक रूप  से विद्यार्थियों को अपने समाज से जोड़ने के लिए कम से कम प्राथमिक स्तर की शिक्षा उनकी मातृभाशा में देनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि संस्कार का किताबों या पाठ्यक्रम में होना उतना जरूरी नहीं जितना कि शिक्षक में होना क्योंकि शिक्षक से संस्कार सीधे विद्यार्थियों में जाता है. इसलिए शिक्षक सिर्फ वेतनभोगी शिक्षक न रहे वह संस्कार वाला हो इसका ध्यान रखना जरूरी है. उन्होंने कहा कि दुनिया में फिनलैंड शिक्षा के मामले में सर्वाधिक उच्चता प्राप्त है लेकिन जब उससे पूछा जाता है कि ऐसा वे कैसे कर सके तो उनका एक ही कहना होता है कि हम अपने छात्रों को जीवन संघर्ष के लिए तैयार करते हैं. इसलिए भारत को भी इस विंदु पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक राष्टवाद जैसी कोई चीज नहीं हम तो राष्ट भावना पर ध्यान देते है. हम राष्टवाद को कोई वाद नहीं समझते. हिन्दू राष्टीयता हमारे लिए जीवनप्राण है इसे हम इज्म नहीं बना सकते है. उन्होंने कहा कि आज सिर्फ शिक्षा ही नहीं बल्कि उद्योग, कृषि,पर्यावरण सबका समन्वय बनाकर युगानुकूल माडल खड़ा करना होगा. उन्होंने कहा कि आज दुनिया भारत की ओर बहुत आशा भरी दृष्टि से देख रही है. सरकार पर अवलंबित होने की बजाय हम स्वावलंबी बने समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत करें.

उन्होने इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता बताते हुए कहा कि इतिहास को शायद पुरातत्व में ढूंढेंगे तो नहीं पाओगे. इसे तो सिर्फ इतिहासबोध से ही प्राप्त किया जा सकता है.

कार्यक्रम में क्षेत्र संघचालक दर्शनलाल जी, प्रांत संघचालक चंद्रपाल सिंह नेगी, शिविराधिकारी बहादुर सिंह बिष्ट,सहशिविराधिकारी डा.अनिल गुप्ता, संयुक्त क्षेत्र प्रचार प्रमुख कृपाशंकर जी, प्रांत कार्यवाह लक्ष्मी प्रसाद जायसवाल, प्रांत प्रचारक डा. हरीश, क्षेत्र प्रचारक आलोक जी, भाजपा के राष्टीय सहसंगठन मंत्री शिव प्रकाश आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे.

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