शिक्षा शोषण मुक्त व समरस समाज की सृष्टि करने वाली हो – डॉ. मोहन भागवत जी Reviewed by Momizat on . आगरा (विसंकें). शनिवार 20 अगस्त को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ब्रजप्रांत द्वारा आयोजित महाविद्यालीय व विश्वविद्यालीय शिक्षक सम्मेलन आगरा (विसंकें). शनिवार 20 अगस्त को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ब्रजप्रांत द्वारा आयोजित महाविद्यालीय व विश्वविद्यालीय शिक्षक सम्मेलन Rating: 0
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    शिक्षा शोषण मुक्त व समरस समाज की सृष्टि करने वाली हो – डॉ. मोहन भागवत जी

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    IMG_5370आगरा (विसंकें). शनिवार 20 अगस्त को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ब्रजप्रांत द्वारा आयोजित महाविद्यालीय व विश्वविद्यालीय शिक्षक सम्मेलन में सहभागिता की. सम्मेलन के प्रथम सत्र में समूचे ब्रजप्रांत के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, तकनीकी व प्रौद्यौगिकी और प्रबंधकीय शिक्षण संस्थाओं के करीब एक हजार से अधिक शिक्षकगण, कुलपति, कुलसचिवों ने मुक्त चर्चा में भाग लेते हुए मंच के समक्ष अपने विचारों व प्रश्नों को रखा.

    शिक्षक बंधुओं को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि वर्तमान शिक्षण पद्धति की व्यवस्था ठीक होनी चाहिए, तब काम ठीक होगा. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार भात पकाने के लिए पानी और भाप की आवश्यकता होती है, केवल धूप से काम नहीं चलता. उसी प्रकार व्यवस्था बनानी है या बदलनी है तो पहले स्वयं को बदलना पडे़गा और उसका माध्यम बनेगी, हमारी मजबूत इच्छाशक्ति. मनुष्य यह मानता है कि मैं जो कहता हूं या करता हूं, वह उत्तम है और मैं कभी गलती नहीं करूंगा. मनुष्य का यह मानना ही पहले अपने दुःख और बाद में समाज के दुःख का कारण बन जाता है.

    उन्होंने कहा कि आज देश की शिक्षा व्यवस्था सौ प्रतिशत ठीक, ऐसा हम भी नहीं मानते और जो शिक्षा नीति बनाते हैं, वह भी इस बात से सहमत हैं कि व्यवस्था का पुनर्निरीक्षण होना चाहिए. समाजवाद, पूंजीवादी व्यवस्था को हमने देखा. लेकिन, देश में कोई परिवर्तन नहीं आया. व्यवस्था से कुछ नहीं बदला, क्यों ना व्यक्ति से शुरू करें. संघ ने प्रयोग किया व्यक्ति और व्यक्तित्व को बदलने का. संघ के इस प्रयोग से परिवर्तन दिखाई दिया कि लोग जात-पात के भेद को भुलाकर एक सूत्र में बंधे और धीरे-धीरे समाज जागृति की ओर अग्रसर हुआ.

    IMG_5280करीब एक हजार से अधिक शिक्षक बंधुओं को संबोधित करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि गलती अंग्रेजों व मुगलों की नहीं, बल्कि हमारी स्वयं की नादानी है. इसलिए समाज को बदलो व्यवस्था अपने आप बदल जाएगी. व्यवस्था अपने आप नहीं चलती, उसे मनुष्य चलाते हैं, महत्व इस बात का है कि चलाने वाला व्यक्ति कैसा है. शिक्षा के द्वारा शिक्षकों को इस प्रकार का प्रयत्न करना चाहिए कि हमारा राष्ट्र शोषण मुक्त व समरस समाज की सृष्टि करने वाला बने. इजराइल पर पांच बार विदेशी विद्रोहियों ने आक्रमण किया. लेकिन, मातृभूमि की रक्षा का संकल्प लिए वहां के निवासियों ने ना केवल विद्रोहियों को परास्त किया, बल्कि पांचों युद्व में विजय के साथ अपनी सीमा का विस्तार भी किया. उन्होंने कहा कि इजराइल निवासियों की दृढ़ इच्छाशक्ति ने रेगिस्तान वाले देश को आनंदवन बना दिया.

    मुक्त चर्चा के दौरान सम्मेलन में उपस्थित शिक्षक बंधुओं द्वारा वर्तमान शिक्षा प्रणाली में व्याप्त व्यवसायिकता व अन्य विकृतियों को सुनने के बाद सरसंघचालक जी ने कहा कि उनकी बात को वह केंद्रीय शिक्षा मंत्री तक पहुंचा देंगे और उनसे आग्रह करेंगे कि वह वर्तमान शिक्षा पद्धिति में व्याप्त बुराईयों को दूर करने का प्रयास करें. शिक्षकों से कहा कि संघ शाखा चलाता है और स्वयंसेवकों का निर्माण करता है. आगे चलकर स्वयंसेवक समाज में व्याप्त विकृतियों को दूर करने का कार्य करते हैं. उन्होंने शिक्षकों से कहा कि वह शिक्षा मंत्री को सीधे पत्र लिखकर अपनी समस्याएं बताएं और वह शिक्षा मंत्री से पूछेंगे कि आगरा से कितने शिक्षकों के पत्र आए.

    शिक्षक सम्मेलन में मंच पर क्षेत्र संघचालक दर्शन लाल अरोड़ा जी, प्रांत संघचालक जगदीश जी, जीएलए विवि के कुलपति दुर्ग सिंह चौहान जी उपस्थित रहे.

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