करंट टॉपिक्स

शुद्धता और पूर्णता संस्कृत का वैशिष्ट्य है – सुरेश सोनी

Spread the love

नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी जी ने कहा कि आज का प्रसंग शुभकामना का प्रसंग है, भाषण का प्रसंग नहीं है. कई अवरोध पार करने के पश्चात् चिर प्रतीक्षित इच्छा पूरी होने का आज का शुभ प्रसंग आया है. देवता का पूजन करके संकल्प किया है तो यह पूरा होगा ही होगा. सह सरकार्यवाह दिल्ली में संस्कृत भारती के अंतरराष्ट्रीय कार्यालय भवन के भूमि पूजन कार्यक्रम में उपस्थित कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि संस्कृत की अपनी एक अंतर्निहित शक्ति है. हमारे कारण से उसका पुनरुद्धार होगा ऐसा नहीं है. उसको छोड़ने के कारण हम जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं, संस्कृत को अपनाएंगे तो समस्याओं से मुक्त हो सकेंगे. संस्कृत भाषा के लिए अगर हम कुछ कर रहे हैं तो हम भाषा पर कोई उपकार नहीं कर रहे हैं. बल्कि हमारा अपने ऊपर ही उपकार है.

सह सरकार्यवाह ने कहा कि हमारे यहां जिन ऋषियों ने साक्षात्कार किया. तो उन्होंने कहा कि सबसे पहले अव्यक्त था, अव्यक्त को जब व्यक्त होने की इच्छा हुई तो सबसे पहले स्पंदन होता है. स्पंदन से नाद होता है, नाद यही शब्द ब्रह्म कहा गया है और ये नाद अनंत रूपों में होता है. इसलिए जो भिन्न-भिन्न अव्यक्त ऊर्जाएं हैं, वे भिन्न-भिन्न शब्दों में व्यक्त होती हैं. इसका बहुत गहराई से अध्ययन करके संस्कृत में शब्दों की रचना हुई. इसीलिए ऐसा कहते हैं कि संस्कृत भाषा का वैशिष्ट्य है कि सभी प्रकार के फोनेटिक्स की अभिव्यक्ति के लिए स्वर-व्यंजन चिन्ह बनाए. यही कारण है कि विश्व की कोई भी भाषा अगर संस्कृत में लिखकर बोलेगा तो उस देश के लोगों को लगेगा कि इसका उच्चारण बिल्कुल ठीक है. शुद्धता और पूर्णता संस्कृत का वैशिष्ट्य है.

उन्होंने कहा कि अपने देश में महापुरुषों ने लोक भाषाओं में समय-समय पर धर्म संस्कृति का प्रचार प्रसार तो किया, लेकिन मूल तत्व सातत्य से ही रहे तो उसके लिए संस्कृत का ही सहारा लिया. बौद्ध दर्शन में महायान में वैपुल्य सूत्र संस्कृत में कथित हैं. जैन दर्शन में सर्वमान्य ग्रंथ उमा स्वामी कृत तत्वार्थ सूत्र संस्कृत में है. जैनियों का यह प्रमाणिक ग्रन्थ है और इस ग्रन्थ को संस्कृत में लिखा गया है. सभी भाषाएं रहेंगी, सभी भाषाओं का लोकजीवन में प्रभाव रहेगा. लेकिन यदि सभी भाषाओं का मूल लोप हो गया तो सभी भाषाओं का भी लोप हो जाएगा. और इस कारण संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन, लोक व्यवहार में प्रचलन उसका एक अपना महत्व है. दूसरा यह भी कि संस्कृत की रचना ही ऐसी है कि उसमें किसी की प्रशंसा करना तो बड़ा सरल काम है, लेकिन गालियां देना कठिन होता है. संस्कृत से ही सुसंस्कृत बना, तो इसीलिए विश्व का मूल्य बोध, तत्व ज्ञान है, सब इसके अंदर है. इसका समाज को परिचय हो. इसका भाषा के संदर्भ के अंदर सभी लोगों को विचार करने की आवश्यकता है. इसलिए संस्कृत का प्रचार प्रसार आवश्यक है.

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि नीति आयोग के उपाध्यक्ष अमिताभ कान्त सहित संस्कृत भारती के संगठन मंत्री दिनेश कामत, महामंत्री श्रीश देवपुजारी व अन्य कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे.

Leave a Reply

Your email address will not be published.